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जन-जन के संत भाग - 27

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  जन-जन के संत  भाग - 27   राष्ट्रीय संत मुनि तरुण सागर जी के साथ प्रवचन बात वर्ष 2010 की है। जब आप क्षुल्लक अवस्था में थे, आपकी साधना बुन्देलखण्ड के हृदय स्थल सागर में चल रही थी। उसी बीच मँगलगिरि तीर्थ, जो कि सागर में स्थित है, वहाँ अल्प समय के लिए क्रांतिकारी संत मुनि तरुण सागर जी का आगमन हुआ। कड़वे प्रवचनों के लिए प्रसिद्ध मुनि तरुण सागर जी की अलग से खुले मैदान में प्रवचन सभा लगवाई गई। भारी भरकम भीड़ और दूर-दूर से आये श्रावकों के मध्य मुनि तरुण सागर जी की उपदेश सभा मंे उनके मंच से उनके ही साथ उनसे पूर्व आप के प्रवचन हुए। जिसकी सराहना सम्पूर्ण समाज द्वारा की गई। प्रवचन उपरांत मुनि तरुण सागर जी द्वारा भी आपकी सकारात्मक सोच और किये जा रहे कार्यों की खूब प्रशंसा की गई और कहा गया कि समाज और राष्ट्र कल्याण में यूँ ही अग्रसर रहिए। देश को ऐसे संतों की बहुत आवश्यकता है। जग विख्यात मुनि श्री, तरुण सिन्धु जयवंत, सुन वाणी जनसंत की, मुदित हुये श्री संत। लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद सागर (म.प्र.) मो. 91 93009 34766 क्रमशः ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी...

जन-जन के संत भाग - 26

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जन-जन के संत  भाग - 26     क्षु ल्लक सम्मेलन जैनेश्वरी दीक्षा के कुछ नियम होते हैं। यह त्याग और संयम के अनुसार बढ़ते हुए क्रम में गुरु आज्ञा से प्रदान की जाती है। दीक्षा के क्रम निम्न प्रकार से होते हैं। ब्रह्मचारी, क्षुल्लक, ऐलक और मुनि अवस्था। ब्रह्मचारी सफ़ेद धोती और दुपट्टा पहिनते हैं। क्षुल्लक अवस्था मंे लंगोट और एक दुपट्टा की छूट होती है, वहीं ऐलक अवस्था मंे सिर्फ एक लंगोट की छूट और मुनि अवस्था मे पूर्ण दिगम्बर अवस्था का विधान है। इस पद में बिना कोई वस्त्र धारण किए साधु निग्र्रन्थ अवस्था में साधना के मार्ग पर चलते हैं। छुल्लक अवस्था मे साधुओं को आगम के नियमानुसार धर्म के प्रसार-प्रचार के लिए आवागमन में वाहन का प्रयोग करने की कुछ छूट मिल जाती है। इस प्रकार आवश्यकता पड़ने पर वे धर्म प्रसार के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए तीव्र गति से आगमन और प्रस्थान कर सकते हैं। वर्ष 2006 में दिल्ली में बुद्ध विहार में पहली बार क्षुल्लक सम्मेलन का आयोजन गुरुदेव विरंजन सागर जी के नेतृत्व में सम्पन्न हुआ। जिसमें करीब 22 क्षुल्लक साधुओं ने भागीदारी कर धर्म के प्रचार-प्रसार मे...

जन-जन के संत भाग - 25

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  जन-जन के संत  भाग - 25   अमृतसर बाघा बार्डर पर प्रवचन मानव जीवन के सर्वांगीण विकास तथा उत्थान में राष्ट्र और धर्म के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। राष्ट्र जहां हमें स्वतंत्रता की आज़ादी देता है, वहीं धर्म उस आज़ादी को सदमार्ग की राह दिखाता है। अमूमन देखने को मिलता है कि हिंदुस्तान में सभी जाति वर्गों के अलग-अलग संत हंै, जिनका उद्देश्य अपने धर्म व जाति का कल्याण और प्रचार-प्रसार करना होता है, किंतु पूज्य विरंजन सागर जी की सदैव सोच रही है कि राष्ट्र के बिना धर्म की सुरक्षा सम्भव नहीं। यही कारण है आप सदा राष्ट्रीय त्योहारों पर राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्र के योगदान और महत्त्व की बात करते हुए इन पर्वों को भी बहुत उत्साह से मनाते हैं। ऐसे कार्यक्रमों में तिरंगा फहराकर हिन्दुत्व का जयघोष करते हैं। अप्रैल 2013 में कुछ ऐसा ही ऐतिहासिक कार्य करते हुए प्रथम बार किसी जैन संत द्वारा बाघा बार्डर (हिंदुस्तान, पाकिस्तान की सीमा) पर हिंदुस्तान की रक्षा करने वाले सैनिकों को राष्ट्र के नाम उपदेश देकर समाज को संदेश दिया। गुरु जी ने जोर देकर कहा कि जैन संत और जैन धर्म के लिए राष्ट्र सर्वोपर...

जन-जन के संत भाग - 24

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  जन-जन के संत  भाग - 24   महान तपस्वी - चर्या के गहन साधक पूज्य गुरुदेव विरंजन सागर जी दीक्षा के प्रथम पड़ाव से ही कठिन साधना में लीन रहते हैं। गुढ़ा ललितपुर में चातुर्मास के दौरान दिसम्बर की कड़कड़ाती हुई ठंड में ब्रह्मकालीन मुहूर्त में मन्दिर जी की छत पर जाकर एकांत मुद्रा में साधना करते रहते थे। वहीं भीषण गर्मी में तपती दोपहर में आग उगलती लपटों के बीच आपको कई कई बार तेज धूप में साधना करते पाया जाता है। यह आपकी आत्मा के एक कठिन गहन योगी तपस्वी होने के पूर्ण संकेत देता है। इसके साथ ही एक महत्त्वपूर्ण बात यह कि आपको अनुवांशिक रूप से मधुमेह शुगर की बीमारी है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मधुमेह से ग्रसित व्यक्ति को इन्सुलिन की पूर्ति बनाये रखने के लिए बार-बार भोजन की आवश्यकता होती है। अतः ऐसी स्थिति में व्रत या उपवास को पूर्ण रूप से निषेध किया जाता है, किंतु आप महान तपोबल के धारी हैं। पर्वराज पर्युषण में पिछले 9 वर्षों से 10 उपवास एवं प्रत्येक अष्टमी चतुर्दशी पर उपवास का नियम आपके तपोबल को बढ़ाता ह,ै जिसके आगे आपकी बीमारी भी शून्य दिखाई पड़ती है।  जय हो गुरुदेव, धन्य है आपकी ...

जन-जन के संत भाग - 23

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  जन-जन के संत  भाग - 23   जन्मभूमि ग्राम सदगुवां से श्री जी को भव्य नवीनतम जिनालय दमोह में विराजमान करवाया सोच सार्थक हो, तो सफलता खुद आँगन में आकर आमंत्रण देती है। हुआ यूँ कि आपकी जन्मभूमि एक बेहद छोटा-सा गाँव सदगुवां है, जो कि जिला दमोह में स्थित है। जहाँ तीन जैन परिवार निवास किया करते थे। कुल मिलाकर तीन घर- एक आपके गृहस्थ जीवन का और दूसरा आपके गृहस्थ जीवन के चाचा सेठ कस्तूरचंद्र जी जैन का, जो आज भी गाँव मे निवास करते हैं। आपकी दीक्षा के पूर्व ही आपका पूरा परिवार संस्कार धानी जबलपुर में स्थानांतरित हो गया था। ऐसे में गाँव के मंदिर की पूजा-अर्चना, अभिषेक और सुरक्षा एक परिवार पर ही आ गई। बरसात और प्रतिकूल मौसम में मन्दिर तक पहुंचने में गाँव की भूमि अवरोध पैदा करती थी। ऐसे में पूज्य गुरुदेव के मन मे एक सार्थक विचार आया, जो लोगों के लिए किसी स्वर्णिम स्वप्न की तरह था, कि क्यों न गाँव के श्री जी को निकट नगर दमोह में भव्य मंदिर का निर्माण कर विराजमान किया जाए? इसी सकारात्मक सोच के साथ आपने वर्ष 2016 में दमोह में भव्य पंचकल्याणक कराया और सागर रोड पर लाल पत्थरों से भव्य जिनालय...

जन-जन के संत भाग - 22

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  जन-जन के संत  भाग - 22   शिमला के ठिठुरते मौसम में चातुर्मास शिमला शब्द सुनकर ही गिरती बर्फ और ठिठुरते मौसम का एहसास होता है, जहां लोग वर्ष भर मोटे-मोटे स्वेटर व कम्बलों में रहते हैं। वहां सर्दी के मौसम में पहली बार किसी जैन मुनि ने चातुर्मास किया। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। वहाँ जैन समाज कम थी, पर धर्म प्रभावना का लक्ष्य अधिक। गिरती हुई बर्फ में आप सन् 2009 में मुनि विशोकसागर जी महाराज के संघ के साथ चातुर्मास कर एक इतिहास तो रच ही रहे थे, साथ ही देश दुनिया को दिगंबर संतों की तपस्या के बारे में एक संदेश भी दे रहे थे। जैन समाज के अभाव में जैनेतर समाज के लोगों को जैन दर्शन की प्रेरणा देते हुए उनकी कक्षाएँ लेते हुए आपने उन्हें जैन धर्म की महत्ता सिखलाई और तीर्थंकरों की वाणी का जयघोष किया। आपकी मंगल देशना के कारण वहां अलग अलग वर्ग और जाति के लोग णमोकार मंत्र और श्री भक्तामर जी का पाठ कर जैन दर्शन का गुणगान करने लगे। इससे जैन धर्म की प्रभावना तो हुई ही, साथ ही सम्पूर्ण मानव समाज को एक अच्छा संदेश भी गया। यह आपकी स्वर्णिम उपलब्धियों में से एक है। मेरी ही चार पंक्त...

जन-जन के संत भाग - 21

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जन-जन के संत  भाग - 21     पंथ और कंत से पृथक हैं जनसंत- श्वेताम्बर साधु महाश्रमण जी के साथ प्रवचन पूज्य गुरुदेव की सोच हमेशा सर्व धर्म सम भाव की रही है। उन्होंने सभी जाति वर्ग धर्म के लोगों में अहिंसा और सत्य धर्म का जयघोष किया है। तीर्थंकरों की मंगल वाणी को जन-जन में फैलाने की सोच उनकी सदा से है। जैन आगम के पंथ से ऊपर उठकर वे सभी पंथों- चाहे दिगम्बर हो या श्वेताम्बर, के साधुओं, भट्टारकों से बराबर का तालमेल रखते हुए तीर्थंकरों की देशना को प्रसारित करने का पुनीत कार्य करते रहते हैं। इसी तारतम्य में वर्ष 2014 की बात है। देश की राजधानी दिल्ली में आपके श्वेताम्बर साधु आचार्य महाश्रमण जी के साथ एक ही मंच पर प्रवचन हुए। जहां आपने दिगम्बर और श्वेताम्बर समाज को एक साथ सम्बोधित करते हुए जैन समाज के एकीकरण की बात कही। यह आपकी सकारात्मक सोच और जैन धर्म के अनुयाइयों को संगठित करने के पावन उद्देश्य को दर्शाता है। पंथवाद में उलझकर, मत होना कमजोर जैन एकता पर सदा, गुरुवर देते जोर। लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद सागर (म.प्र.) मो. 91 93009 34766 क्रमशः ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरि...

जन-जन के संत भाग - 20

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जन-जन के संत  भाग - 20   शब्दों से परे हैं विराट व्यक्तित्व जिस तरह सैकड़ों सरितायें मिलकर भी सागर की विशालता की बराबरी नहीं कर सकतीं, हज़ारों दीपकों के प्रकाश से दिनकर की रोशनी नहीं नापी जा सकती; ठीक उसी तरह किसी भी कवि-साहित्यकार के शब्दों में इतनी ऊर्जा नहीं कि वे किसी दिगम्बर संत के व्यक्तित्व को प्रकाशित कर सके। एक लेखक जो देखता है, वह लिखता है और जो लिखता है, वह जीता है। मैंने जैन संस्कारों में जन्म ही नहीं लिया, बल्कि जैन दर्शन और दिगम्बर मुद्रा को बेहद करीब से देखा, जाना और अध्ययन किया है। दिगम्बर शब्द ही अपने आप में पूज्य है। किंतु जब बात दिगम्बर संत मुद्रा के उत्तुंग शिखर जनसंत विरंजनसागर जी के व्यक्तित्व पर लेखनी द्वारा शाब्दिक रंग भरने की हो, तो शब्द जैसे भयभीत हो जाते हैं कि कैसे परिभाषित करूँ उस मुद्रा के विराट व्यक्तित्व को, जो श्रेष्ठ ही नहीं बल्कि पूज्यता के शिखर पर है? तीर्थंकरों की मुद्रा को हमने सिर्फ पढ़ा है, किंतु उनका प्रतिबिंब दिगम्बर संतों के रूप में हम साक्षात देख पा रहे हैं। निश्चित ही उस समय तीर्थंकर इसी स्वरूप में रहे होंगे। पूज्य विरंजनसागर जी महाराज...

जन-जन के संत भाग - 19

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  जन-जन के संत  भाग - 19   धर्म के पहले राष्ट्र के प्रति सकारात्मक सोच ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि दिगम्बर जैन संत अथवा पिच्छिका कमंडल धारी मुनिराज सिर्फ जैन आगम की प्रभावना और निज कल्याण के रास्ते पर ही चलते हैं। यह भी कटु सत्य है कि दिगम्बर मुद्रा उन्होंने स्वयं के कल्याण के लिए चुनी है। किंतु, संत निज के साथ-साथ दूसरों के भी कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। पूज्य गुरुदेव विरंजनसागर जी सदा ही धर्म से पहले राष्ट्र सेवा को प्रधानता देते हैं। राष्ट्रीय त्यौहारों को भी उत्साह से मनाने की प्रेरणा देते हैं। राष्ट्रीय पर्वों के अवसर पर मन्दिर जी मे तिरंगा ध्वजारोहण, राष्ट्र के नाम प्रवचन, तिरंगा यात्रा आदि कार्यक्रम के माध्यम से हिंदुस्तान और माँ भारती का जयघोष करते हैं। गुरूदेव सदैव आह्वान करते हैं कि राष्ट्र की सुरक्षा के बिना धर्म सुरक्षित नहीं है। राष्ट्र वासियों के लिए सर्वप्रथम राष्ट्र हित के कार्य होने चाहिएं, फिर कोई अन्य कार्य। इसी तरह पूज्य गुरुदेव अन्य महापुरुषों के जन्मदिन पर अपने उपदेशों में उनका स्मरण कर उनके बताए गए मार्गों पर चलने का आह्वान करते हैं। समाज और राष...

जन-जन के संत भाग - 18

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  जन-जन के संत  भाग - 18 गुरुदेव की अनोखी है मुस्कान’ यह महत्त्वपूर्ण बात भी गुरुदेव के व्यक्तित्व के बखान में सामने आती है कि उनकी मंद मुस्कान में ढेरों रा ज़  छिपे होते हैं। वह हरदम मुस्कुराते रहते हैं। भक्तों से संवाद के समय विनोद भाव से बात करते हैं। प्रवचन और गुरु भक्ति के उपरांत श्रावकों को समझाते हुए खूब हँ सा ते हैं और सबसे कहते हैं - ' चे हरे पर मुस्कान रखो, और काम से काम रखो।' पूज्य गुरुदेव से जुड़े भक्त बताते हैं कि गुरुदेव की नसीहत है कि लोगों को कुछ न दे पाओ तो एक मुस्कान जरूर दे दिया करो। इसी तरह गुरुदेव के समक्ष जब कोई प्रश्न रखा जाए तो हर बात का उत्तर देना वे जरूरी नहीं समझते, कई बार सिर्फ मुस्कुरा देते हैं। भक्त मण्डल सोचता रह जाता है आखिर उनकी मुस्कान में क्या रा ज़  छिपा था। पर जो भी है गुरु की मुस्कान लूटने का जो म ज़ा  है, वह प्रिय कवि मित्र अमित जैन मौलिक के इस छंद में समाहित है.. बेजुबां ज़मीं को लूटने में क्या रखा है भाई, बात तो मज़े की आसमान लूटने में है । लुत्फ ही कहाँ है इत्र की दुकान लूटने में, जो मज़ा सुगंध का बागान लूटने में है । हीरे...

जन-जन के संत भाग - 17

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  जन-जन के संत  भाग - 17 गुरुदेव की न ज़ रों का कमाल पूज्य गुरुदेव से जुड़े भक्तों से यदि संवाद करें, तो एक बात जरूर निकल कर आती है कि गुरुदेव की नजरें कमाल की हैं। एक बार में वे कई-कई भक्तों को देख लेते हैं। प्रवचन सभा मे खचाखच भरी भीड़ में भी उनकी नजर अंतिम पंक्ति के श्रावकों तक रहती है। कोई एक बार भी उनसे मिलकर परिचय दे दे, तो सालों बाद भी उन्हें उस व्यक्ति का नाम याद रहता है। प्रवचन और धर्म सभाओं में वह अपने भक्तों का नाम लेकर चीजें समझाने का प्रयास करते हैं। कई-कई बार सदन में बैठे श्रावक सोचते हैं - एक समय बाद गुरुदेव की सभा में बैठा हूँ, गुरुदेव नहीं पहचाने होंगे। पर अचानक उनके श्री मुख से उस व्यक्ति का नाम सहित संबोधन भक्त के मन को अति प्रसन्नता दे देता है कि पूज्य गुरुदेव को स्मरण रहा और उनके मुख से मेरा नाम निकला। कई बार प्रत्यक्षदर्शियों से ऐसे किस्से सुनने को मिलते रहते हैं कि कोई व्यक्ति हैरान -परेशान उनकी सभा में दूर बैठा हो, तो गुरुदेव उसके चेहरे की उदासी देखकर अपने किसी भक्त से उस व्यक्ति को अपने कक्ष में बुलवाकर उससे संवाद करते हैं। दरअसल व्यक्ति के मन में श्गुरुश...

जन-जन के संत भाग - 16

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  जन-जन के संत  भाग - 16 सृष्टि के प्रति दृष्टि -- एक सकारात्मक विचारधारा चेतन अचेतन, एक इन्द्रिय से लेकर पांच इन्द्रिय तक, सभी इस संसार का हिस्सा हैं। जिसने संसार में जन्म लिया वह संसार को अपने तरीकों से देखता है। किन्तु जो संसार को संसार की नजरों से देखने का अनुभव ले ले, वह संसार से मुक्त होने का मार्ग जान लेता है। बचपन में लेकर आज तक पूज्य गुरुदेव का जितना भी सान्निध्य मिला, एक बात जो उन्हें सबसे पृथक् करती है वह है, उनकी सोच और चीजों को देखने का नजरिया। गुरुदेव हमेशा ही प्रवचन में कहते हैं -  दूसरों को कुछ न दे सको तो एक मुस्कान जरूर दे दिया करना, तुम्हारी मुस्कुराहट से वह भी प्रसन्न हो जाएगा और तुम भी प्रसन्न रहोगे। एक बार एक भक्त ने गुरुदेव से पूछा - आप इतने सरल और सहज क्यों हैं? गुरुदेव मुस्कुराते हुए बोले - जो जितना सरल और सहज होता है, उसका मोक्ष मार्ग उतना आसान हो जाता है। उनकी सामने वाले के प्रति जो सोच होती है, वह अपने आप में सिद्ध दृष्टि लिए होती है। कठिन से कठिन परिस्थितियों और प्रतिकूलताओं पर वह मंद-मंद मुस्काते हैं। जब तक आवश्यक न लगे, बोलते नहीं और आवश्यक ...

जन-जन के संत भाग - 15

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  जन-जन के संत  भाग - 15 शब्द सृजन शिल्पी हैं गुरुदेव उच्च शिक्षा और बड़ी डिग्रियां धारण करने के उपरांत ही प्रबुद्धता और ज्ञान हासिल हो, यह आवश्यक नहीं है। पूज्य गुरुदेव की गृहस्थ अवस्था में शिक्षा भले हायर सैकेण्डरी रही हो। पर धर्म मार्ग पर चलते हुए स्वाध्याय और शास्त्रों के पठन से लौकिक ज्ञानार्जन उच्च स्तरीय रहा है। आपकी विशिष्ट प्रवचन शैली, सम सामयिक विषयों पर गहरी पकड़, शाब्दिक दृष्टिकोण और विषय के पीछे का चिंतन आपके ज्ञान-विज्ञान को बतलाता है। आपने सदैव संतत्व को जीने की कोशिश की है। कठिन चर्या और साधना के साथ-साथ सृजन पथ पर हमेशा श्रेष्ठ दिया है। आपके द्वारा आपकी निजि डायरियों में आपके सजाये शब्दों में एक श्रेष्ठ लेखक एक उत्कृष्ट सृजन शिल्पी की झलक दिखाई दी है। पूज्य गुरुदेव के द्वारा उनकी लिखी डायरियों और प्रवचन को सुनकर उनके भक्तमंडल द्वारा उनकी पांच कृतियों को लिपिबद्ध कराया गया है। जिनके नाम निम्नानुसार हैं। 1. विरंजनवाणी -- पूज्य गुरुदेव के प्रवचन अंशों से तैयार 2. आत्मोत्थान का मार्ग -- पूज्य गुरुदेव के विचारों की कथानात्मक कृति 3. सम्यक् चिंतन -- चिंतन के क्षण 4. ब...

जन-जन के संत भाग - 14

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  जन-जन के संत  भाग - 14 जनसंत होने के कारण संत होना ही अपने आप में महत्वपूर्ण होता है। फिर जनसंत होने का पीछे क्या कारण रहे होंगे ? यह उपाधि किसी दिगम्बर जैन मुनि को क्यों प्रदान की गई होगी ? यह अवगत कराना जरूरी है। बात क्षुल्लक अवस्था की है। जब पूज्य गुरुदेव धर्म प्रभावना के लिए जगह-जगह चातुर्मास कर रहे थे। सम्पूर्ण मानव समाज के प्रति सार्थक और कल्याण की सोच, राष्ट्र के प्रति भक्ति आपको जन-जन के बीच ख्याति दिला रही थी। आपके द्वारा किये गए विशेष प्रयासों से सिर्फ जैन ही नहीं, बल्कि सर्व समाज लाभान्वित होती थी। सबसे अच्छी बात यह थी कि आपके दरवाजे हर व्यक्ति के लिए सामान्य रूप से खुले रहते थे। निज साधना के अतिरिक्त जो अल्प समय शेष था, उसे पूज्य गुरुदेव जन सामान्य के कल्याण की चर्चा में व्यतीत करते थे। यही कारण था कि आपके इन विशेष प्रयासों से आपकी ख्याति बच्चों से लेकर बुजुर्गों में, जैन से लेकर जैनेतर समाज में बढ़ने लगी। आपकी मानव समाज के प्रति इसी सार्थक सोच ने आपको जनसंत की उपाधि प्रदान करा दी, जो सिर्फ आपका नहीं बल्कि संत समाज का भी सम्मान था। यह भी सत्य है कि दिगम्बर मुद्रा ...

जन-जन के संत भाग - 13

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जन-जन के संत  भाग - 13 संत से जनसंत की उपाधि वर्ष 2009 की बात है। आप क्षुल्लक अवस्था में थे। धर्म प्रभावना हेतु भोपाल में विराजमान थे, तभी आपके गृहस्थ जीवन के फूफा जी डॉ आनंद जैन सागर, गौराबाई दिगम्बर जैन मंदिर, कटरा कमेटी के कुछ सदस्यों के साथ सागर समाज के अनुरोध पर आपको सागर ले आये। सागर में पूरे 7 महीने आपने धर्म ध्यान की खूब गंगा बहाई। शुरुआत में जहाँ सिर्फ कुछ गिने चुने लोग आपकी प्रभावना में शामिल थे, वहीं कुछ दिवस बाद ही आपकी साधना, तप, ज्ञान और समाज को जोड़कर चलने की सकारात्मक पहल से आपके पास बहुत भीड़ एकत्रित होने लगी। आपने पद्माकर स्कूल में शहर की सारी समाज को एकत्रित करके एक ऐतिहासिक विधान सम्पन्न कराया। कुछ ही दिनों में जैन समाज के साथ सभी जाति वर्ग के लोग आपके दर्शन को पहुँचने लगे। आपकी प्रेरणा से महावीर जयंती के अवसर पर विशाल शोभा यात्रा निकली, जो सागर के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हुई। इस शोभायात्रा में अपार भीड़ के साथ सभी जाति वर्ग के लोगों ने सम्मिलित होकर आपकी प्रभावना को प्रमाणित किया। आपने उस दौरान जैन मंदिरों के अलावा नगर की सभी शैक्षणिक संस्थाओं, केंद्र...