जन-जन के संत भाग - 4
जन-जन के संत भाग - 4 जनसंत विरंजन सागर का गृहस्थ जीवन अपने गृहस्थ जीवन में कुल चार भाई और दो बहिनों के साथ आप घर में सबसे छोटे थे। आपके पिता जी की रेलवे स्टेशन पर एक छोटी-सी किराने की दुकान और आटा चक्की का व्यवसाय था। आपकी बाल्यावस्था गाँव में ही परिवार और ग्रामीण परिवेश में पूरी हुई। परिवार में अत्यधिक लाड़ प्यार के कारण परिवार जन आपको श्बल्लूश् नाम से पुकारने लगे। शिक्षा और मनोरंजन के बड़े साधन गाँव में उपलब्ध नहीं थे। एक ही शासकीय शाला गाँव में थी, जहां आपकी शिक्षा पूर्ण होनी थी। शाला में प्रवेश के समय संबंधित कागजों पर श्कमलेशश् नाम लिखवाया गया। कहते हैं कि पूत के पाँव पालने में ही नजर आने लगते हैं। बालक कमलेश (बल्लू) शिक्षा के प्रारंभिक पड़ाव से ही पूर्ण तन्मयता से शिक्षा ग्रहण करते हुए अध्यापकों द्वारा प्रशंसा प्राप्त करने लगा था। शान्त स्वभावी, गंभीर व्यक्तित्व लिए नन्हीं-सी उम्र का बालक सभी भाई-बहिनों के बीच रहकर भी बिल्कुल अलग था। गाँव में खेल के साधन उपलब्ध नहीं थे। ऐसे में बालक बल्लू उम्र के अगले सोपानों पर कदम रखते हुए आध्यात्मिक प्रवृत्ति को धारण कर ध...