जन-जन के संत भाग - 22
जन-जन के संत भाग - 22
शिमला के ठिठुरते मौसम में चातुर्मास
शिमला शब्द सुनकर ही गिरती बर्फ और ठिठुरते मौसम का एहसास होता है, जहां लोग वर्ष भर मोटे-मोटे स्वेटर व कम्बलों में रहते हैं। वहां सर्दी के मौसम में पहली बार किसी जैन मुनि ने चातुर्मास किया। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। वहाँ जैन समाज कम थी, पर धर्म प्रभावना का लक्ष्य अधिक। गिरती हुई बर्फ में आप सन् 2009 में मुनि विशोकसागर जी महाराज के संघ के साथ चातुर्मास कर एक इतिहास तो रच ही रहे थे, साथ ही देश दुनिया को दिगंबर संतों की तपस्या के बारे में एक संदेश भी दे रहे थे।
जैन समाज के अभाव में जैनेतर समाज के लोगों को जैन दर्शन की प्रेरणा देते हुए उनकी कक्षाएँ लेते हुए आपने उन्हें जैन धर्म की महत्ता सिखलाई और तीर्थंकरों की वाणी का जयघोष किया। आपकी मंगल देशना के कारण वहां अलग अलग वर्ग और जाति के लोग णमोकार मंत्र और श्री भक्तामर जी का पाठ कर जैन दर्शन का गुणगान करने लगे। इससे जैन धर्म की प्रभावना तो हुई ही, साथ ही सम्पूर्ण मानव समाज को एक अच्छा संदेश भी गया। यह आपकी स्वर्णिम उपलब्धियों में से एक है। मेरी ही चार पंक्तियों में...
बड़ी सर्दी है ठिठुरन है, गजब की बर्फबारी है,
न पूछो रात कल की, किस तरह हमने गुजारी है।
यहाँ पर कम्बलों में, स्वेटरों में देह कँपती है,
वहाँ देखो दिसम्बर पर, दिगम्बर भेष भारी है।
लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद
सागर (म.प्र.)
मो. 91 93009 34766
क्रमशः
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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