जन-जन के संत भाग - 25

 जन-जन के संत  भाग - 25

 

अमृतसर बाघा बार्डर पर प्रवचन

मानव जीवन के सर्वांगीण विकास तथा उत्थान में राष्ट्र और धर्म के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। राष्ट्र जहां हमें स्वतंत्रता की आज़ादी देता है, वहीं धर्म उस आज़ादी को सदमार्ग की राह दिखाता है। अमूमन देखने को मिलता है कि हिंदुस्तान में सभी जाति वर्गों के अलग-अलग संत हंै, जिनका उद्देश्य अपने धर्म व जाति का कल्याण और प्रचार-प्रसार करना होता है, किंतु पूज्य विरंजन सागर जी की सदैव सोच रही है कि राष्ट्र के बिना धर्म की सुरक्षा सम्भव नहीं। यही कारण है आप सदा राष्ट्रीय त्योहारों पर राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्र के योगदान और महत्त्व की बात करते हुए इन पर्वों को भी बहुत उत्साह से मनाते हैं। ऐसे कार्यक्रमों में तिरंगा फहराकर हिन्दुत्व का जयघोष करते हैं।

अप्रैल 2013 में कुछ ऐसा ही ऐतिहासिक कार्य करते हुए प्रथम बार किसी जैन संत द्वारा बाघा बार्डर (हिंदुस्तान, पाकिस्तान की सीमा) पर हिंदुस्तान की रक्षा करने वाले सैनिकों को राष्ट्र के नाम उपदेश देकर समाज को संदेश दिया। गुरु जी ने जोर देकर कहा कि जैन संत और जैन धर्म के लिए राष्ट्र सर्वोपरि है। सैनिकों ने बहुत उत्साह से गुरुदेव की बात सुनकर राष्ट्र सुरक्षा का संकल्प लिया। उल्लेखनीय है कि ऐसा प्रवचन किसी जैन संत द्वारा सीमा रेखा पर प्रथम बार किया गया।

दिल में आये वहम, कहीं शंकित हो मन,

इस तरह कीजिये, धर्म का निर्वहन।

कौन हो प्राथमिक, धर्म अरु देश में,

राष्ट्र सबसे प्रथम, ऐसे हैं गुरु वचन।

लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद

सागर (म.प्र.)

मो. 91 93009 34766

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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