Posts

Showing posts from June, 2026

जन-जन के संत भाग - 3

Image
जन-जन के संत    भाग - 3 ग्राम सदगुवां धन्य है 12 दिसम्बर वर्ष 1981, सर्दी के मौसम में रात्रि का समय था। माँ गर्भावस्था में पूरा-पूरा पेट लिये सो रही थी। अचानक उसे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे किसी दिव्य पुंज ने अँधेरे के द्वार पर दस्तक दी हो, जैसे दशों दिशायें अथाह पुण्य के उदय की बेला के स्वागत को तैयार हो गई हों। चंद ऐसे शुभ संकेतों के मध्य अंततः प्रकृति के नियमानुसार एक घोर पीड़ा के पश्चात् ममतामयी माँ श्रीमती शीलाबाई जैन की कोख से एक स्वस्थ और मनहर बालक ने जन्म लिया। जन्म से पूर्व माँ को तीन महीने पूर्व स्वप्न आने लगे थे कि तीर्थंकर स्वरूप कोई बालक उनकी कोख से जन्म लेने वाला है और यह बालक आगे चलकर कोई ऋद्धिधारी मुनिराज बनने वाला है। स्थान था ग्राम सदगुंवा, जिला दमोह। एक छोटी-सी बस्ती। मात्र एक जैन परिवार। बस्ती में एक छोटा-सा मंदिर जिसमें पूजा अर्चना अभिषेक इसी मनहर बालक के परिवार द्वारा किया जाता था। दादा स्वर्गीय श्री बाबूलाल जी जैन एवं दादी स्वर्गीय श्रीमती इन्द्राणी जैन और माँ शीला बाई और पिता सेठ कन्छेदी लाल जैन जी की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। जन्म के 7 दिवस पूर्व से गाँव म...

जन-जन के संत भाग - 2

Image
जन-जन के संत    भाग - 2  गुरु परिचय पूज्य गुरुदेव विरंजनसागर जी महाराज मेरे गृहस्थ जीवन के बड़े मामा के पुत्र हैं, और मेरे बाल सखा भी। बचपन में गाँव की गलियों में साथ दौड़ लगाई है। खेल-खिलौनों से खेलने वाले दो बालकों में से एक जन-जन का संत बनेगा, इस बात का उस समय किसी को भान नहीं था। नियति, नियम और पूर्व जन्मों के पुण्य का असर गुरुदेव को उस दिशा में ले गया, जहां उनकी जीवन यात्रा को सार्थकता मिलनी थी और मैं विस्मित नेत्रों से इस पावन यात्रा को निहारता रहा। बचपन के दो भाई - दो मित्र, जिनमें से आज एक कृष्ण के समान है, तो दूसरा सुदामा-सम मैं, जो अपने कृष्ण की सतत भक्ति का अभिलाषी है। विचार योग्य है, यह सुदामा उन्हें क्या दे सकता था, जिन्होंने सब कुछ त्याग कर महावीर मुद्रा धारण कर ली हो। कुछ भी तो नहीं था देने को मेरे पास। हमेशा दिया ही है गुरुदेव ने। आशीष, ज्ञान, सम्बल और सदमार्ग जो कि सतत गुरु वचनों से प्राप्त होता आ रहा है। ऐसे में देने को मेरे हृदय के मधुर कोष में एकत्रित कुछ मधुर स्मृतियां शेष थीं, और कुछ टूटे फूटे से भाव, जिनको गुरुदेव का नाम लेकर गुरुदेव पर ही शब्दों में ...

जन-जन के संत भाग - 1

Image
जन-जन के संत    भाग - 1  जन-जन के संत - जनसंत विरंजन सागर अगर खुद में न डूबोगे, तो दर्शन हो नहीं सकता, बिना तप के कभी भी, सोना कंचन हो नहीं सकता । बहुत से संत दुनिया में, हुए हैं और भी होंगे, मगर हर संत दुनिया में विरंजन हो नहीं सकता । ।   डॉ. अखिल जैन आनंद मन की बात... लेखक की कलम से यह पावन कृति ‘जन-जन के संत: जनसंत विरंजनसागर’ समर्पित है, पूज्य गुरुदेव जनसंत विरंजन सागर जी महाराज के श्री चरणों में, जिनके मंगल आशीष से मेरे हृदय कोष में उनके प्रति उमड़ते असीम श्रद्धा के भाव आज शब्द रूप में रूपांतरित होकर आपके समक्ष प्रस्तुत हैं। मैं अपनी कलम को बहुत ही पुण्यशाली समझता हूँ जिसे गुरु महिमा को पिरोने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह कृति मेरे लिए मेरी गुरु भक्ति का एक अंश ही है। मुझे बचपन में चित्रकारी करने का शौक था। रंगों से चित्रकारी करते-करते कब शब्दों में रंग भरने लगा, पता ही नहीं चला। धीरे-धीरे यह आदत हिंदी कविता के प्रतिष्ठित मंचों, टेलीविजन के पर्दों तक ले गई। शब्दों की इस यात्रा ने मुझे मान, सम्मान, यश, अर्थ, प्रतिष्ठा सब प्रदान किया। किन्तु साधु संतो के समक्ष काव्य...

पंचकल्याणक-हिसार (हरियाणा)

Image
  पंचकल्याणक (श्री 1008 भगवान मल्लिनाथ)  (छोटा मन्दिर जी, गांधी चौक) 9 नवम्बर 2017 - 15 नवम्बर 2017 हिसार (हरियाणा) की पावन धरा तर्ज़ - बस्ती-बस्ती, पर्वत-पर्वत गाता जाए बंजारा...... गली-गली और कूचे-कूचे, गाता जाए बंजारा, सब देखो भव्य नज़ारा........ मल्लिनाथ का पंचकल्याणक, सफल हुआ है हमारा, सब देखो भव्य नज़ारा........2 सौधर्म इंद्र और सभी देवगण, हर्षित हुए हैं भारी, सारे नगर ने अहोभाव से, कर ली सब तैयारी। गली-गली और .............. मिथिला नगरी की संरचना, आभा अति मनोहारी, पूजा, हवन और प्रवचन सुन, हर्षित हैं नर-नारी। गली-गली और .............. नगर-नगर से बैण्ड हैं आए, बग्घी शोभाकारी, देव कुबेर के रत्नों की वर्षा, हुई अति सुखकारी। गली-गली और .............. मल्लिनाथ भगवान के अतिशय, मनती रोज़ दीवाली, नगरी की शोभा अनुपम थी, सुरभित क्यारी-क्यारी। गली-गली और .............. मुनि विरंजन सागर जी ने अतिशय पुण्य कमाया, आचार्य श्री विराग सागर को, संघ सहित है बुलाया। गली-गली और .............. संत समागम, धर्म की चर्चा, था अद्भुत ये नजारा, ‘कालिदास संत’ ने ‘धन्ना, ते भगवंता’ उचारा। गली-गली और .........