जन-जन के संत भाग - 19
जन-जन के संत भाग - 19
धर्म के पहले राष्ट्र के प्रति सकारात्मक सोच
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि दिगम्बर जैन संत अथवा पिच्छिका कमंडल धारी मुनिराज सिर्फ जैन आगम की प्रभावना और निज कल्याण के रास्ते पर ही चलते हैं। यह भी कटु सत्य है कि दिगम्बर मुद्रा उन्होंने स्वयं के कल्याण के लिए चुनी है। किंतु, संत निज के साथ-साथ दूसरों के भी कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। पूज्य गुरुदेव विरंजनसागर जी सदा ही धर्म से पहले राष्ट्र सेवा को प्रधानता देते हैं। राष्ट्रीय त्यौहारों को भी उत्साह से मनाने की प्रेरणा देते हैं। राष्ट्रीय पर्वों के अवसर पर मन्दिर जी मे तिरंगा ध्वजारोहण, राष्ट्र के नाम प्रवचन, तिरंगा यात्रा आदि कार्यक्रम के माध्यम से हिंदुस्तान और माँ भारती का जयघोष करते हैं।
गुरूदेव सदैव आह्वान करते हैं कि राष्ट्र की सुरक्षा के बिना धर्म सुरक्षित नहीं है। राष्ट्र वासियों के लिए सर्वप्रथम राष्ट्र हित के कार्य होने चाहिएं, फिर कोई अन्य कार्य। इसी तरह पूज्य गुरुदेव अन्य महापुरुषों के जन्मदिन पर अपने उपदेशों में उनका स्मरण कर उनके बताए गए मार्गों पर चलने का आह्वान करते हैं। समाज और राष्ट्र के प्रति गुरुदेव की यही पुनीत सोच उन्हें विशेष बनाती है और उनके जनसंत होने के पीछे की विचारधारा पर मुहर लगाती है। पुनः कवि अमित जैन मौलिक की पंक्तियाँ गुरुदेव के चिंतन परिभाषित करती हैं कि..
सबको अपना बनाने, वाला फन ज़रूरी है,
मन अगर जीतना है, साफ मन ज़रूरी है।
हमसे जिंदा है धर्म, धर्म से हैं हम जिंदा,
और दोनों के लिए, यह वतन ज़रूरी है।
सागर (म.प्र.)
मो. 91 93009 34766
क्रमशः
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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