जन-जन के संत भाग - 13
जन-जन के संत भाग - 13
संत से जनसंत की उपाधि
वर्ष 2009 की बात है। आप क्षुल्लक अवस्था में थे। धर्म प्रभावना हेतु भोपाल में विराजमान थे, तभी आपके गृहस्थ जीवन के फूफा जी डॉ आनंद जैन सागर, गौराबाई दिगम्बर जैन मंदिर, कटरा कमेटी के कुछ सदस्यों के साथ सागर समाज के अनुरोध पर आपको सागर ले आये। सागर में पूरे 7 महीने आपने धर्म ध्यान की खूब गंगा बहाई। शुरुआत में जहाँ सिर्फ कुछ गिने चुने लोग आपकी प्रभावना में शामिल थे, वहीं कुछ दिवस बाद ही आपकी साधना, तप, ज्ञान और समाज को जोड़कर चलने की सकारात्मक पहल से आपके पास बहुत भीड़ एकत्रित होने लगी।
आपने पद्माकर स्कूल में शहर की सारी समाज को एकत्रित करके एक ऐतिहासिक विधान सम्पन्न कराया। कुछ ही दिनों में जैन समाज के साथ सभी जाति वर्ग के लोग आपके दर्शन को पहुँचने लगे। आपकी प्रेरणा से महावीर जयंती के अवसर पर विशाल शोभा यात्रा निकली, जो सागर के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हुई। इस शोभायात्रा में अपार भीड़ के साथ सभी जाति वर्ग के लोगों ने सम्मिलित होकर आपकी प्रभावना को प्रमाणित किया।
आपने उस दौरान जैन मंदिरों के अलावा नगर की सभी शैक्षणिक संस्थाओं, केंद्रीय कारावास और अन्य जगहों पर विशेष प्रवचन कर सभी वर्ग जाति के लोगो में अहिंसा और सत्य धर्म का जयघोष किया। जैन के साथ जन-जन के कल्याण की भावना और सर्व जाति धर्म के मध्य आपकी प्रभावना से बढ़ती हुई अपार लोकप्रियता को देखकर नगर की सारी समाज ने एकजुट होकर बीच चैराहे पर हर्षध्वनि के साथ आपको जनसंत की उपाधि से विभूषित किया, जो सम्पूर्ण जैन संतो में एक अलग और पृथक उपाधि थी।
लोकप्रिय हर वर्ग में, हुए हुए जयवंत
गुरु विरंजन हो गये, भारत के जनसंत ।
लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद
सागर (म.प्र.)
मो. 91 93009 34766
क्रमशः
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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