जन-जन के संत भाग - 26

जन-जन के संत  भाग - 26 

 

क्षुल्लक सम्मेलन

जैनेश्वरी दीक्षा के कुछ नियम होते हैं। यह त्याग और संयम के अनुसार बढ़ते हुए क्रम में गुरु आज्ञा से प्रदान की जाती है। दीक्षा के क्रम निम्न प्रकार से होते हैं। ब्रह्मचारी, क्षुल्लक, ऐलक और मुनि अवस्था।

ब्रह्मचारी सफ़ेद धोती और दुपट्टा पहिनते हैं। क्षुल्लक अवस्था मंे लंगोट और एक दुपट्टा की छूट होती है, वहीं ऐलक अवस्था मंे सिर्फ एक लंगोट की छूट और मुनि अवस्था मे पूर्ण दिगम्बर अवस्था का विधान है। इस पद में बिना कोई वस्त्र धारण किए साधु निग्र्रन्थ अवस्था में साधना के मार्ग पर चलते हैं। छुल्लक अवस्था मे साधुओं को आगम के नियमानुसार धर्म के प्रसार-प्रचार के लिए आवागमन में वाहन का प्रयोग करने की कुछ छूट मिल जाती है। इस प्रकार आवश्यकता पड़ने पर वे धर्म प्रसार के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए तीव्र गति से आगमन और प्रस्थान कर सकते हैं। वर्ष 2006 में दिल्ली में बुद्ध विहार में पहली बार क्षुल्लक सम्मेलन का आयोजन गुरुदेव विरंजन सागर जी के नेतृत्व में सम्पन्न हुआ। जिसमें करीब 22 क्षुल्लक साधुओं ने भागीदारी कर धर्म के प्रचार-प्रसार में योगदान दिया। यह सम्मेलन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण रहा क्योंकि इसके पूर्व आज तक इस तरह का आयोजन कहीं नहीं हुआ था।

अलग.अलग संघ के एक ही अवस्था के साधुओं की एक ही मंच पर उपस्थिति विशेष चर्चा का विषय तो थी ही, साथ ही सारे साधुओं ने एक ही मंच से धर्म ध्यान और जन कल्याण के उपदेश देकर इस स्वर्णिम आयोजन को सम्पन्न किया। यह सम्पूर्ण आयोजन पूज्य विरंजन सागर जी, जो कि उस समय छुल्लक अवस्था मे थे, के नेतृत्व में सानन्द सम्पन्न हुआ। इस सम्पूर्ण आयोजन को आचार्य वर्धमान सागर जी द्वारा विशेष आशीष प्राप्त हुआ व आयोजन की प्रासंगिकता की सर्वत्र प्रशंसा हुई।

 नवाचार आरंभ से, करते आये आप

इसीलिए तो आपका, इतना हुआ प्रताप।

लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद

सागर (म.प्र.)

मो. 91 93009 34766

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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