जन-जन के संत भाग - 16
जन-जन के संत भाग - 16
सृष्टि के प्रति दृष्टि -- एक सकारात्मक विचारधारा
चेतन अचेतन, एक इन्द्रिय से लेकर पांच इन्द्रिय तक, सभी इस संसार का हिस्सा हैं। जिसने संसार में जन्म लिया वह संसार को अपने तरीकों से देखता है। किन्तु जो संसार को संसार की नजरों से देखने का अनुभव ले ले, वह संसार से मुक्त होने का मार्ग जान लेता है। बचपन में लेकर आज तक पूज्य गुरुदेव का जितना भी सान्निध्य मिला, एक बात जो उन्हें सबसे पृथक् करती है वह है, उनकी सोच और चीजों को देखने का नजरिया। गुरुदेव हमेशा ही प्रवचन में कहते हैं -
दूसरों को कुछ न दे सको तो एक मुस्कान जरूर दे दिया करना, तुम्हारी मुस्कुराहट से वह भी प्रसन्न हो जाएगा और तुम भी प्रसन्न रहोगे।
एक बार एक भक्त ने गुरुदेव से पूछा - आप इतने सरल और सहज क्यों हैं? गुरुदेव मुस्कुराते हुए बोले - जो जितना सरल और सहज होता है, उसका मोक्ष मार्ग उतना आसान हो जाता है।
उनकी सामने वाले के प्रति जो सोच होती है, वह अपने आप में सिद्ध दृष्टि लिए होती है। कठिन से कठिन परिस्थितियों और प्रतिकूलताओं पर वह मंद-मंद मुस्काते हैं। जब तक आवश्यक न लगे, बोलते नहीं और आवश्यक लगने पर एक पंक्ति में पूरा अर्थ समझा देते हैं। एक साथ कई-कई लोगो से संवाद और एक साथ कई-कई कार्यों को करने की विशेष कला भी गुरुदेव के व्यक्तित्व को प्रखरता प्रदान करती है। पंच कल्याणक और धार्मिक अवसरों-त्यौहारों पर समाज से जुड़े व्यक्तियों को उचित मार्गदर्शन और निर्देशन की निपुणता आपके अंदर सदा से है।
सबसे बड़ी बात यह है - आप किसी भी कार्य को छोटा और व्यर्थ नहीं समझते। प्रवचन हॉल श्रावकों से भरा हो या छोटी जगहों पर श्रावकों की कम भीड़ हो पर आप अपने निज दायित्त्वों का पूर्ण निर्वहन कर एक ही उद्देश्य और पूर्ण ऊर्जा से धर्म प्रभावना में जुटते हैं। आपके समक्ष किसी भी उम्र या किसी भी स्तर का व्यक्ति बैठा हो, उससे पूज्य श्री के संवाद का तरीका स्पष्ट और तर्कपूर्ण होता है। जिसका उद्देश्य सकारात्मक भाव लिए होता है।
सागर जैसी विशालता और चंद्रमा जैसी शीतलता लिए आपका मन जिनेन्द्र देशना की प्रभावना के लिए हमेशा तत्पर रहता है।
धर्म और आध्यात्मिक क्रांति के लिए आप सदा ही नवीन प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं। आपके चातुर्मास में स्थानीय स्तर पर साधर्मी पत्रकारों, अधिवक्ताओं, चिकित्सकों, प्रशासनिक अधिकारियों से अलग से संवाद कर धर्म के मूल तत्त्व की रक्षा और बढ़ोतरी का मंगल भाव आपके अंदर सदा ही दिखाई देता है, जो आपको संत समाज की अग्रिम पंक्ति में महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करता है।
सुख लेना आसान है, गुरु की सीख अनूप
दोनों का आनंद लें, छाँव रहे या धूप।
लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद
सागर (म.प्र.)
मो. 91 93009 34766
क्रमशः
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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