जन-जन के संत भाग - 21
जन-जन के संत भाग - 21
पंथ और कंत से पृथक हैं जनसंत- श्वेताम्बर साधु महाश्रमण जी के साथ प्रवचन
पूज्य गुरुदेव की सोच हमेशा सर्व धर्म सम भाव की रही है। उन्होंने सभी जाति वर्ग धर्म के लोगों में अहिंसा और सत्य धर्म का जयघोष किया है। तीर्थंकरों की मंगल वाणी को जन-जन में फैलाने की सोच उनकी सदा से है। जैन आगम के पंथ से ऊपर उठकर वे सभी पंथों- चाहे दिगम्बर हो या श्वेताम्बर, के साधुओं, भट्टारकों से बराबर का तालमेल रखते हुए तीर्थंकरों की देशना को प्रसारित करने का पुनीत कार्य करते रहते हैं।
इसी तारतम्य में वर्ष 2014 की बात है। देश की राजधानी दिल्ली में आपके श्वेताम्बर साधु आचार्य महाश्रमण जी के साथ एक ही मंच पर प्रवचन हुए। जहां आपने दिगम्बर और श्वेताम्बर समाज को एक साथ सम्बोधित करते हुए जैन समाज के एकीकरण की बात कही। यह आपकी सकारात्मक सोच और जैन धर्म के अनुयाइयों को संगठित करने के पावन उद्देश्य को दर्शाता है।
पंथवाद में उलझकर, मत होना कमजोर
जैन एकता पर सदा, गुरुवर देते जोर।
लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद
सागर (म.प्र.)
मो. 91 93009 34766
क्रमशः
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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