जन-जन के संत भाग - 66
जन-जन के संत भाग - 66 संघ के मोती क्षुल्लिका विशीलाश्री माता जी संसार के समस्त रिश्तों का आकलन करें तो माँ का रिश्ता सारे रिश्तों से बड़ा होता है। माँ किसी व्यक्ति की प्रथम पाठशाला है, जो अपने शिशु को गर्भ में ही संस्कार देना प्रारंभ करती है और बच्चे के जन्म उपरांत उसे चलने से लेकर खाने-पीने की आदत से लेकर शिक्षा, परिवार, समाज, राष्ट्र और अन्य नैतिक धार्मिक संस्कार प्रदान कर उसके भविष्य का निर्धारण करती है। केवल जैन आगम ही दुनिया का एकमात्र दर्शन है जहां व्यक्ति के रिश्तों की नहीं बल्कि आत्मा के स्वभाव, पद और मूल गुणों की पूजा की जाती है। एक पुत्र माँ से ऊपर हो जाये, यह केवल जैन आगम में संभव है। पूज्य माता जी के धर्म-कर्म और मर्म पर अधिक प्रकाश डालने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जिनकी कोख और संस्कारों की बगिया में पूज्य विरंजन सागर जी जैसे संत जन्मे हों वह आत्मा स्वयं प्रभुत्व का अंश है। संसार नश्वर है। राग-द्वेष, मोह और माया आत्मा के कल्याण में बाधक हैं। यह जानकर कि एक पूर्ण उद्देश्य की पूर्णता उपरांत जब पुत्र संसार में ज्ञान की गंगा बहा रहा हो, तो उस गंगा में स्नान कर खु...