जन-जन के संत भाग - 12
जन-जन के संत भाग - 12 जन्म देनी वाली माँ का किया कल्याण संसार के सारे रिश्तों में माँ से श्रेष्ठ कोई रिश्ता नहीं है। माँ की ममता, त्याग और स्नेह का कोई मूल्य नहीं होता। पर दुनिया में जैन दर्शन ही एकमात्र दर्शन है, जहाँ पुत्र माँ से ऊपर हो जाता है। दरअसल पूज्यता की बात आए, तो मानव व्यक्ति की नहीं, अपितु उसके गुणों की पूजा करता है। साधु परमेष्ठी में उसके मूल गुण पूज्य होते हैं। जैन आगम में मुनि पद आर्यिका माता से बड़ा होता है। चूंकि माँ शीला जी जब गृहस्थ जीवन में थी, तभी उनके पुत्र ने संसार की भौतिक सुविधाओं का त्याग कर जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली थी। ऐसे में एक माँ के दिये गए संस्कारों का ही प्रतिफल है कि पुत्र ने संतत्व धारण कर जग में नाम रोशन किया। संसार नश्वर है, और आत्म तत्त्व अजर-अमर। पुत्र के संसार विमुख होने के बाद माँ का मन संसार मे कहाँ ठहरने वाला था। मां के मन से भावों की सरिता उस सागर में विलय करना चाहती थी, जिस सागर को संसार विरंजनसागर कहने लगा था। माँ ने अपने गृहस्थ जीवन के पुत्र और आज के संत श्रेष्ठ से निवेदन किया कि मुझे भी अपनी आत्मा का कल्याण करना है। अंततः ...