जन-जन के संत भाग - 20
जन-जन के संत भाग - 20 शब्दों से परे हैं विराट व्यक्तित्व जिस तरह सैकड़ों सरितायें मिलकर भी सागर की विशालता की बराबरी नहीं कर सकतीं, हज़ारों दीपकों के प्रकाश से दिनकर की रोशनी नहीं नापी जा सकती; ठीक उसी तरह किसी भी कवि-साहित्यकार के शब्दों में इतनी ऊर्जा नहीं कि वे किसी दिगम्बर संत के व्यक्तित्व को प्रकाशित कर सके। एक लेखक जो देखता है, वह लिखता है और जो लिखता है, वह जीता है। मैंने जैन संस्कारों में जन्म ही नहीं लिया, बल्कि जैन दर्शन और दिगम्बर मुद्रा को बेहद करीब से देखा, जाना और अध्ययन किया है। दिगम्बर शब्द ही अपने आप में पूज्य है। किंतु जब बात दिगम्बर संत मुद्रा के उत्तुंग शिखर जनसंत विरंजनसागर जी के व्यक्तित्व पर लेखनी द्वारा शाब्दिक रंग भरने की हो, तो शब्द जैसे भयभीत हो जाते हैं कि कैसे परिभाषित करूँ उस मुद्रा के विराट व्यक्तित्व को, जो श्रेष्ठ ही नहीं बल्कि पूज्यता के शिखर पर है? तीर्थंकरों की मुद्रा को हमने सिर्फ पढ़ा है, किंतु उनका प्रतिबिंब दिगम्बर संतों के रूप में हम साक्षात देख पा रहे हैं। निश्चित ही उस समय तीर्थंकर इसी स्वरूप में रहे होंगे। पूज्य विरंजनसागर जी महाराज...