जन-जन के संत भाग - 64
जन-जन के संत भाग - 64 संघ के मोती मुनि श्री 108 विश्वदृग् सागर जी महाराज जैन दर्शन में वैराग्य शब्द का बड़ा महत्त्व है। वैराग्य सांसारिक प्राणी का संसार को असार समझ लेने का बोध है, जिसका संबंध सीधा-सीधा आत्मा से है। जिसने आत्मा के सत्य को समझ लिया, वह इस मिट्टी की देह से ऊपर उस अनंत यात्रा को चुन लेता है, जिसकी सीढ़ियां वैराग्य से शुरू होती हैं। कुछ ऐसा ही आपके निज जीवन में हुआ। आपने भिंड नगर में जन्म लिया किंतु बचपन में ही माता-पिता शांत हो गए, इसलिए आपकी बुआ जी ने बचपन से ही आपका पालन-पोषण किया और शिक्षा का प्रबंध किया। पहले के समय में शिक्षा के अधिक साधन नहीं थे। आठवीं कक्षा उत्तीर्ण कर आप रोजी-रोटी के साधन में जुट गए और एक प्राइवेट संस्था में मुनीमी करने लगे। किंतु गृहस्थ जीवन की मोह माया, संसार का बदलता भौतिक स्वरूप और झूठी दुनिया की कड़वाहट से मन में अकुलाहट होने लगी। उम्र का पड़ाव बढ़ता जा रहा था, पर तृष्णाएं घटती जा रही थीं। दिगम्बर स्वरूप, वीतरागी छवि जब दिमाग में दौड़ने लगे, फिर संसार छूटना तय होता है। ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया और चिंतन स्वाध्याय और सा...