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जन-जन के संत भाग - 40

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  जन-जन के संत  भाग - 40   मान गये भगवान   भगवान आदिनाथ मन्दिर जी में चले गए मार्च 2022, बात बड़ा मलहरा जिला छतरपुर की है। भगवान आदिनाथ जी की 9 फीट की सफेद पाषाण की मनमोहक प्रतिमा मन्दिर जी के प्रवेश द्वार से अंदर जानी थी। मन्दिर के ऊपर के तल की जमीन से ऊंचाई प्रतिमा जी के अंदर प्रवेश में बाधा बन रही थी। दस से पंद्रह दिन क्रेन की सहायता से अलग अलग तरीकों से भगवान को मन्दिर के अंदर वेदी तक लाने की भरपूर कोशिश की गई। समाज और क्रेन चालक जब परेशान हो गए, कोई युक्ति नहीं सूझी, तब वहीं विराजमान जनसंत मुनि विरंजन सागर जी से सहायता की गुहार लगाई। मुनि श्री ने रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा कि घबराओ नहीं, एक श्रीफल मूलनायक भगवान को समर्पित करो, उनसे निवेदन करो, फिर कोशिश करो। उनके कहने पर समाज द्वारा भगवान के चरणों मे श्रीफल अर्पित कर पुनः कोशिश की गई और चमत्कार ही हुआ। बहुत आसानी से भगवान की प्रतिमा मन्दिर के दरवाजे से अंदर चली गई। यह दृश्य देखकर पूज्य मुनि विरंजन सागर जी के जयकारों की आवाज से प्रांगण गूंजने लगा। प्रत्यक्षदर्शी इसे गुरुवर का बड़ा चमत्कार मानते हैं। व्यर्थ जत...

अब होंगे सपने साकार भाग -13

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अब होंगे सपने साकार भाग -13 मन की शांति जीवन का मूल मन की शांति जीवन की सबसे बड़ी दौलत है वह समृद्धि व्यर्थ है जिसमें शांति का अमृत न हो। अगर आपकी भूलने की आदत है तो इसका सही उपयोग कीजिए और उन बातों को अवश्य भूल जाइए जो आपके मन को अशांत कर रही है। अशांत मन भूखे तालाब की तरह है जिसमें पानी तो सूख जाता है, पर पीछे मिट्टी की दरारें रह जाती हैं। अपने मन को प्रसन्न रखिये उसमें प्रेम का पानी डालते रहिए, ताकि अंतर्मन का खेत हरा भरा रहे। सफलता चाहिये तो जो पसंद है उसे हासिल कीजिए पर शांति चाहिए तो जो हासिल है उसी को पसंद करना शुरू कर दीजिए। व्यर्थ की चिंता का त्याग कीजिए। विश्वास रखिए जो चोंच देता है वह चुग्गा भी देता है। जो कल देगा वह कल के जीने की व्यवस्था में भी स्वतः सहयोगी बनेगा। दिन की शुरुआत में लगता है जिंदगी में पैसा जरूरी है, पर रात को सोते समय लगता है, जिंदगी में मन की शांति जरूरी है। जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति कीजिए पर तृष्णा के मायाजाल में मत उलझिये अति तृष्णा इंसान को अशांति का अनुयायी बना देती है। हमारा स्वास्थ्य हमारे मन की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है, बुरा मन, बुरे व...

जन-जन के संत भाग - 39

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जन-जन के संत  भाग - 39   गुरुकृपा से खत्म हुआ भक्त और भगवान का वनवास सालों से श्री जी के बन्द पट खुल गए हीरों की नगरी पन्ना में अजयगढ़ एक स्थान है। जहाँ कुछ दिन आपकी प्रभावना हुई थी। वहाँ 14 साल से कुछ कारणों से चिन्तामणि भगवान पार्श्वनाथ जी के पट बन्द थे। दर्शनार्थियों को दुर्भाग्यवश 14 सालों से प्रभु के दर्शन नहीं हो पा रहे थे। शासन प्रशासन और प्रबुद्ध लोगों द्वारा सारे प्रयास किये गए, किन्तु असफलता मिली। तभी समाज के लोग आपके पास गए और पूरी व्यथा सुनाई। आपने आशीष देकर 3 दिवस रुकने को कहा। पूरे 3 दिवस बाद 14 वर्ष से बन्द प्रभु पार्श्वनाथ जी के पट खोले गए और सबको प्रभु के मनोरम स्वरूप के दर्शन का लाभ मिला। यह है गुरु के तप का असर।  जय जय गुरुदेव। इस चमत्कार के प्रत्यक्षदर्शी गुरुभक्त मयंक जैन जी बताते हैं कि 7 वर्ष पूर्व आचार्य विरागसागर जी अजयगढ़ पधारे थे, तब समाज के लोगों ने यह परेशानी आचार्य श्री के सामने रखी थी। आचार्य श्री ने मुस्कुराकर कहा - चिन्ता न करो, आज से 6 वर्ष बाद मेरा एक शिष्य आयेगा और वह मन्दिर के दरवाजे खुलवायेगा। मयंक जी कहते हैं कि कुछ तथाकथित लोग नहीं चा...

अब होंगे सपने साकार भाग -12

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  अब होंगे सपने साकार भाग -12 मुस्कान आमंत्रण कार्ड है   अपने हर दिन हर कार्य की शुरूआत मुस्कान से किया करें। किसी भी कार्य का सकारात्मक परिणाम पाने के लिए मुस्कान गणपति की पूजा के समान है। मुस्कान जीवन के आनंद की आत्मा है। इसी मुस्कान के बल पर राम वनवास का कष्ट झेलने में भी सफल हो गये हैं। जीवन में हर समय मुस्कुराने की आदत डालिए। इस एक आदत से हम अपने गुस्से और खीझ पर विजय प्राप्त करने में सफल होंगे। साथ ही हमारा चेहरा सुंदर होगा और हमारा आभामंडल सकारात्मक होगा। चेहरा देना कुदरत का काम है, पर उसे सुन्दर भाव देना आपके हाथ में है। आप अपने दिलो दिमाग में सदा मुस्कान के फूल खिलाते रहें। आपकी खुशबू औरों के दिल पर राज करेगी। हाथ में खींची भाग्यरेखा में सीधा उलट-फेर तो नहीं किया जा सकता, पर हर पल में मुस्कुराने की मानसिकता विकसित कर ली जाए तो दुर्भाग्य की अंगुली में भी सौभाग्य की अँगूठी पहनाई जा सकती है। हर फोटोग्राफर फोटो खींचने से पहले फोटो की सुन्दरता के लिए एक अनुरोध अवश्य करता है, स्माइल प्लीज, भला जब दो पल मुस्कुराने से फोटो सुन्दर आता है, तो हर पल मुस्कुराने से क्या जीवन...

जन-जन के संत भाग - 38

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जन-जन के संत  भाग - 38   हांसी हरियाणा - धरती के अंदर से श्री जी किये प्रकट कहते हैं - आज के समय में चमत्कार नहीं होते, पर जैन दर्शन और जैन संतों की कठिन साधना तपस्या से अतिशय आज भी देखने को मिलते हैं। वर्ष 2008 में आप मुनि विशोकसागर जी के संघ में थे और हांसी में 56 वर्ष बाद किसी मुनिराज का चातुर्मास हुआ था। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती मंदिर, हांसी, हरियाणा में चातुर्मास कर रहे थे। युवा अवस्था में आपकी तीव्र साधना तपस्या के साथ-साथ सतत उपवास जारी थे। तभी एक रात्रि आपको दिव्य शक्तियों द्वारा स्वप्न दिया गया कि मन्दिर के सामने खाली पड़ी जगह पर धरती के गर्भ में अतिशयकारी श्री जी की प्रतिमा है, और आप श्री जी को नियत समय में प्रकट करें। तब यह बात आपने वहां संघस्थ मुनि श्री और समस्त समाज को बताई। दिव्य शक्तियों के दिये गए समय में आपने वहां खुदाई कराई और धरती के गर्भ से चिन्तामणि भगवान पार्श्वनाथ जी की सफेद पाषाण की अति मनोरम प्रतिमा जी प्रकट हुई। चमत्कार पर चमत्कार तो तब हुआ, जब इस प्रतिमा का देवताओं द्वारा दुग्ध से अभिषेक प्रारंभ हुआ। यह दृश्य जैन धर्म की महिमा के उद्घोष और ...

अब होंगे सपने साकार भाग -11

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अब होंगे सपने साकार भाग -11 प्रेम ही जीवन है प्रेम जीवन का महामंत्र है। परिवार और समाज तो क्या यह पूरी दुनिया को वश में करने की ताकत रखता है। यही वह मंत्र है जिससे अपने तो अपने रहते ही हैं, पराये भी अपने हो जाते हैं। नफरत की दुनिया की बातें करने वाले लोग आतंक को बढ़ावा देते हैं। वही प्रेम का पैगाम देने वाले लोग अहिंसा और विश्व शांति को जीवित रखते हैं। जियो और जीने दो प्रेम का ही विस्तार है। प्रेम इंसानियत का यह पाठ पढ़ाता है कि आप खुद भी प्रेमपूर्वक जियो और सबको भी प्रेम से जीने का अधिकार दो। किसी का जीवन छीनने का पाप कभी मत करो। प्रेम की महिमा अनंत है। इसी प्रेम के वश होकर राम ने शबरी के बेर खाए थे। कृष्ण ने विदुरानी के केले के छिलके ग्रहण किए थे। महावीर ने चंदनबाला के उड़द के बाकले (छिलके) स्वीकार किये थे। नकली धनवानों का परिचय है खोखा और पेटी, असली धनवान तो वही है, जिसके घर में मुस्कुराए बड और बेरी। हो सकता है बिना चीनी की चाय किसी को अच्छी लग सकती है, पर बिना प्रेम का जीवन तो खुद ज़िंदगी को ही नीरस बना देता है। जिसके घर में प्रेम का संचार नहीं, समझो वह घर नहीं, श्मशान है। प्र...

जन-जन के संत भाग - 37

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जन-जन के संत  भाग - 37   गुरु के उपकार या चमत्कार चमत्कार कहें या उपकार, परंतु पूज्य गुरुदेव के पास कठिन त्याग, तपस्या और संयम के कारण एक ऐसी सकारात्मक ऊर्जा है, जो उनके भक्तों की समस्याओं का समाधान कर उन्हें परेशानियों पीड़ा से मुक्ति दिलाती है। सुनने में पढ़ने में थोड़ा आश्चर्य हो सकता है किन्तु पूज्य गुरुदेव के भक्तों के जीवन मे उनके मंगल आशीष से कई समस्याएं हल हुई हैं, जिन्हें भक्त, चमत्कार कहते हैं। चमत्कार हो या गुरु का उपकार, पर जो भी है गुरु की इस कृपा से भक्तों को खुशियां मिली तो अनेकों को नव जीवन। भक्त स्वयं आपबीती बताते हुए प्रसन्न होते हैं। गुरु की महिमा का बखान करते हैं और गुरु के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। वहीं पूज्य गुरुदेव से ये घटनाएं और सीधे शब्दों में कहें, तो चमत्कार पूछने पर वह मुस्करा देते हैं, मौन हो जाते हैं और कहते हैं - सब पार्श्वनाथ जी की कृपा है। वे ही सब करने वाले हैं। मैं तो निमित्त हूँ। उनका मुस्कराहट भरा मौन बहुत कुछ कह जाता है। गुरु कृपा से संभव हुए कुछ समाधान कुछ घटनाओं और गुरु की महिमा को शाब्दिक सौंदर्य देने की कोशिश की है, जो कि पूर्णतः ...

अब होंगे सपने साकार भाग -10

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अब होंगे सपने साकार भाग -10 बुढ़ापा जीवन का अभिशाप नहीं... सुखी बुढ़ापे का एक मंत्र है। दादा बन जाओ, तो दादागिरी छोड़ दो और परदादा बन जाओ, तो दुनियादारी करना छोड़ दो। अगर आप जवान हैं, तो गुस्से को मंद रखो, नहीं तो कैरियर चौपट हो जाएगा और बूढ़े हैं, तो गुस्से को बंद रखो. नहीं तो बुढ़ापा बिगड़ जाएगा। बुढ़ापा जीवन का अभिशाप नहीं अनुभवों की कुंजी है। इसे विषाद नहीं. प्रभु का प्रसाद बनाइए। बचपन में ज्ञानार्जन कीजिए और जवानी में धनार्जन, पर बुढ़ापे को पुण्यार्जन के लिए समर्पित कर दीजिए। बचपन माँ को दिया, जवानी पत्नी को दी और बुढ़ापा पोते-पोतियों को दे देंगे, तो सोचिए अपनी सद्गति की व्यवस्था कब करेंगे। अगर घर में कोई वृद्ध हैं तो उन्हें भार मानने की बजाय भाग्य मानिए, याद रखें बूढ़ा पेड़ फल नहीं देता पर छाया तो ज़रूर देता है। अपने माता-पिता को भाग्य भरोसे मत छोड़िए उनके बुढ़ापे को सुखमय बनाने की कोशिश कीजिए। जब उन्होंने हमें प्रेम से पाला है, तो हम उन्हें विवशता में क्यों पाल रहे हैं। उनकी दुआएँ लीजिए और आने वाली पीढ़ी को संस्कार दीजिए। अनाथालय और अस्पताल में जाकर सेवा करना सरल है। पर घर ...

जन-जन के संत भाग - 36

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  जन-जन के संत  भाग - 36   पाटे पर चरण अंकित हुए दिवस था 8 सितंबर 2022, बुन्देलखण्ड के हृदय स्थल सागर, मध्यप्रदेश चातुर्मास का। पर्यूषण पर्व के दिन चल रहे थे। गुरुदेव की हमेशा की तरह कठिन साधना चल रही थी। पर्यूषण में विगत दस वर्षों से उनके लगातार दस उपवास जारी थे, किन्तु इस वर्ष गुरुदेव का स्वास्थ्य थोड़ा प्रतिकूल रहा। श्रावकों द्वारा बार-बार गुरुदेव से आहार चर्या का निवेदन किया जा रहा था। गुरुदेव अपनी साधना और त्याग के प्रति अडिग थे, पर श्रावकों के अनुरोध पर सिर्फ जल ग्रहण करने की स्वीकृति दे दी। हर्ष के वातावरण में पड़गाहन उपरांत श्रीमति सुषमा गौना के चैके में गए। जल ग्रहण के लिए गुरुदेव जिस चैकी (पटा) पर खड़े थे, उस चैकी पर सफेद दुग्ध की तरलता की भांति गुरु के चरण अंकित हो गए, जिसे श्रद्धालुओं ने दैवीय दुग्ध पाद प्रक्षालन माना। ज्ञात हो कि कोई भी जैन सन्त चैके में प्रवेश करने के पूर्व कमंडल के जल से अच्छी तरह अपने पैरों को धोकर ही चैके में प्रवेश करते हैं। ऐसी स्थिति में यह बात भी श्रावकों के मन में नहीं थी कि गुरुदेव के चरण कोई चूने या सफेद पदार्थ पर पड़े होंगे, जिससे यह ...

अब होंगे सपने साकार भाग - 9

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  अब होंगे सपने साकार भाग - 9 खाने के लिए नहीं जीना स्वाद के लिए खाना अज्ञान है, जीने के लिए खाना बुद्धिमानी है, संयम की रक्षा के लिए खाना साधना है। भोजन करते समय पेट को चौथाई भाग खाली भी रखिए, कम खाइए, गम खाइए और सुखी रहिए। एक बार योगी खाता है। दो बार भोगी खाता है। बार-बार खाने वाला स्वतः रोगी हो जाता है। हम जैसा अन्न खाते हैं, वैसा ही हमारा तन मन होता है । सच्चाई तो यह है कि आप वैसा ही हो, जैसा खाते हो। इंसान के खानपान से ही उसके खानदान का पता चलता है। आहार-विहार, संयमित शयन, जागरण, भोग और योग संयमित हो तो बेहतर रहता है। जो सीमित खाता है, वह ज्यादा जीता है। इसलिए ज्यादा खाकर जल्दी मरने वालों से वह व्यक्ति ज्यादा अच्छा है, जो जीने के लिए खाता है। आहार के चार चरण हैं। उगाना, पकाना, पहले चबाना, फिर पचाना। खेत से लेकर पेट तक होने वाली यह यात्रा अगर स्वस्थ हो, तो व्यक्ति अपना चिकित्सक स्वयं होता है। आहार व्यक्ति के स्वस्थ शरीर पर बहुत प्रभाव डालता है।   रचयिता - परम पूज्य जनसंत उपाध्याय श्री 108 विरंजन सागर जी महाराज क्रमशः ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेव...

जन-जन के संत भाग - 35

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  जन-जन के संत  भाग - 35   कठिन तप के साधक हैं गुरुदेव सागर चातुर्मास की ही बात है। दिनांक 4 सितंबर 2022, धर्मराज पर्यूषण में गुरुदेव का लगातार चौथा उपवास चल रहा था। गुरुदेव अपनी साधना में छत पर बैठे हुए थे, अचानक जोरदार बारिश आ गई। पर बारिश की बूंदें गुरुदेव के त्याग के सामने कहाँ टिकने वाली थी। गिरती झमाझम बारिश में गुरुदेव आसन लगाए अपनी तप मुद्रा में बैठे रहे। लोगों ने कहा - ये मेघ भी गुरु के चरण पखारकर चले गए।  जय हो गुरुदेव आपकी तपस्या!! मेरी ही चार पंक्तियों में... ऋतुएं मौसम हवा घटा जल, भक्त हैं सारे गुरुवर के, नदियों के तट अंबर के पट, नम्र सितारे गुरुवर के। गुरुवर बैठे मन्दिर जी में, अपने तप और संयम  को , मेघों ने खुद झूम झूम कर, चरण पखारे गुरुवर के। लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद सागर (म.प्र.) मो. 91 93009 34766 क्रमशः ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरण...

अब होंगे सपने साकार भाग -8

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अब होंगे सपने साकार भाग -8   इच्छा कम, इच्छा शक्ति बढ़ाएँ कठोर अनुभव और विपदाओं से गुजरे बिना किसी की प्रगति नहीं हो सकती। शिल्पकार की हथौड़ी की चोट सहे बिना कोई भी पत्थर मूरत नहीं बन सकता है। दूसरों की भूलें देखने के लिए दूरबीन का उपयोग करने की बजाय अपनी भूलें देखने के लिए दर्पण का उपयोग कीजिए। दूसरों को सुधारने से पहले खुद को सुधारना ही ज्यादा महान कार्य है। लक्ष्य यदि स्पष्ट नहीं है तो केवल दौड़-धूप मचाने से मंजिल नहीं मिला करती है। दौड़-भाग तो दिनभर कुत्ता भी करता है, पर वह कभी मंजिल तक नहीं पहुँच पाता है। किसी भी असफलता को हम सफलता में इसलिए न बदल पाए, क्योंकि अपनी असफलता का कारण हम शनि, राहु,.केतु की दशा को देते रहे। अगर अपनी कार्य प्रणाली के दोष को देखकर उन्हें हटा देते तो हम कब के सफल हो गए होते। हम कामयाबी के लिए बातें कम कर्मयोग ज्यादा करें। इच्छाएँ कम, इच्छा शक्ति को बढ़ाने की कोशिश ज्यादा करें। संकट में आत्मविश्वास रखिए, साधना में आत्मज्ञान रखिए और सुखों में आत्मसंयम रखिए। सदा याद रखिए कि शरीर श्वास से चलता है, पर जीवन आत्मविश्वास से बनता है। सच्चे मित्र ढाल की तर...

जन-जन के संत भाग - 34

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  जन-जन के संत  भाग - 34   महान योगी हैं गुरुदेव जैन संत की चर्या एक योगी की चर्या है। ब्रह्ममुहूर्त में उठना, सात्विक खान पान, अनुशासित दिन-चर्या और नियत समय पर सोना-जागना एक प्रकार का योग ही है। गुरुदेव विरंजनसागर जी महाराज ने इसी योग रुपी साधना से अपने शरीर को ऐसा साधा कि मधुमेह और पथरी की समस्या होते हुए भी काया पर बीमारियों को हावी नहीं होने दिया। वे अपने कक्ष में प्रातः कठिन योग की मुद्राओं में दिखाई देते हैं। शायद यही कारण है कि वे बीमारियों को हराकर एक निरोगी देह के साथ अपनी संयमित चर्या में जुटे हुए हैं। गुरुदेव की योग साधना योगचार्यों को भी चकित करती है।  नियम साधना ध्यान से, हार गये सब रोग, संयम चर्या योग के, मुनिवर हैं संयोग। लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद सागर (म.प्र.) मो. 91 93009 34766 क्रमशः ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अध...

अब होंगे सपने साकार भाग -7

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अब होंगे सपने साकार भाग -7 नशा जिंदगी का नाश करती है दाँत से आँत तक और दिल से दिमाग तक नुकसान करता है हमारा नशा। यह शुरू तो सामूहिक होता है, पर इसका समापन एकाकी होता है। यदि आपकी गुटखा खाने की आदत है, तो गुटखा में से 'ट ' को हटाइए और एक बार उच्चारण कीजिए, फिर जी करे, तो प्रेम से खाइये।  हम मंदिर में बीड़ी, सिगरेट और गुटखा इसलिए नहीं चढ़ाते क्योंकि वहाँ भगवान की मूर्ति है। फिर अपने भीतर बैठे जीते-जागते भगवान को दिन-प्रतिदिन ये सब क्यों चढ़ा रहे हैं।  हम दुर्गन्ध नहीं, सुगन्ध बनें। अपने सांस्कृतिक पतन को रोकने का प्रयास करें, नीचे के कपड़े ऊपर आते जा रहे हैं और ऊपर के कपड़े नीचे होते जा रहे हैं। नशा धीमा जहर है। ज़हर तो पीने वाले का ही नुकसान करता है पर नशा तो पूरे परिवार का नुकसान करता है यह तत्काल तो सुख देता है। पर इसकी बड़ी महँगी कीमत चुकानी पड़ती है। जैसे एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है , वैसे ही एक बुरी आदत पूरे परिवार को तहस-नहस कर देती है सावधान, आपका एक शौक पूरे परिवार को शोक में डाल सकता है। एक अच्छी आदत आदमी का भाग्य सुधारती है, वहीं बुरी आदत...

जन-जन के संत भाग - 33

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जन-जन के संत  भाग - 33   मूक प्राणियों के प्रति करुणा भाव वैसे तो संत शब्द ही करुणा और वात्सल्य का पर्यायवाची होता है। पूज्य गुरुदेव के हृदय में मूक प्राणियों के प्रति सदैव करुणा का भाव रहा है। अनेक बार गर्मी में विहार (भ्रमणध्यात्रा) के दौरान मूक निर्जीव प्राणियों को कमंडल से जल पिलाते हुए गुरुदेव को देखा गया है। इसी तरह पदयात्रा के दौरान रास्ते में कोई बीमार जानवर मिल जाये, तो गुरुदेव तुरंत रुककर उसे कमंडल से जल पिलाते हुए मंत्र उच्चारण के साथ उसके विधिवत उपचार की व्यवस्था करवाते हैं। गुरुदेव के भक्त बताते हैं कि अनेक बार उनके विहार के समय जीव-जंतु साथ चलते देखे गए हैं। गुरुदेव कहते हैं-  सेवा और वात्सल्य की ज़रूरत इंसान के अलावा इन पशुओं को भी है। जो इंसान इन मूक प्राणियों से स्नेह नहीं करता, असली पशु तो वही है। मूक प्राणियों के लिये, हिय में दया अपार, धन्य आपकी भावना, धन्य आप सरकार। लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद सागर (म.प्र.) मो. 91 93009 34766 क्रमशः ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख ...