जन-जन के संत भाग - 1
जन-जन के संत भाग - 1 जन-जन के संत - जनसंत विरंजन सागर अगर खुद में न डूबोगे, तो दर्शन हो नहीं सकता, बिना तप के कभी भी, सोना कंचन हो नहीं सकता । बहुत से संत दुनिया में, हुए हैं और भी होंगे, मगर हर संत दुनिया में विरंजन हो नहीं सकता । । डॉ. अखिल जैन आनंद मन की बात... लेखक की कलम से यह पावन कृति ‘जन-जन के संत: जनसंत विरंजनसागर’ समर्पित है, पूज्य गुरुदेव जनसंत विरंजन सागर जी महाराज के श्री चरणों में, जिनके मंगल आशीष से मेरे हृदय कोष में उनके प्रति उमड़ते असीम श्रद्धा के भाव आज शब्द रूप में रूपांतरित होकर आपके समक्ष प्रस्तुत हैं। मैं अपनी कलम को बहुत ही पुण्यशाली समझता हूँ जिसे गुरु महिमा को पिरोने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह कृति मेरे लिए मेरी गुरु भक्ति का एक अंश ही है। मुझे बचपन में चित्रकारी करने का शौक था। रंगों से चित्रकारी करते-करते कब शब्दों में रंग भरने लगा, पता ही नहीं चला। धीरे-धीरे यह आदत हिंदी कविता के प्रतिष्ठित मंचों, टेलीविजन के पर्दों तक ले गई। शब्दों की इस यात्रा ने मुझे मान, सम्मान, यश, अर्थ, प्रतिष्ठा सब प्रदान किया। किन्तु साधु संतो के समक्ष काव्य...