जन-जन के संत भाग - 65
जन-जन के संत भाग - 65 संघ के मोती क्षुल्लक श्री 105 विसौम्य सागर जी (वर्तमान में मुनि श्री 108 विसौम्य सागर जी ) संत परम्परा के स्वर्णिम हस्ताक्षर जिनकी वाणी में साक्षात् मां शारदे का और जिनके अक्षर अक्षर में माँ जिनवाणी की देशना विहित है। जो कि आगम और चर्या के दैदीप्यमान दिनकर के मानिंद अहिंसा सत्य धर्म का आलोक करते हुए गुरु परंपरा के सतत निर्वहन में अग्रसर रहते हैं। आगम और शास्त्रमत चर्चा करने पर ही आपके अथाह ज्ञान का पता लग जाता है। और आपकी प्रवचन शैली, तथ्यात्मक विषय की बारीक जानकारी शास्त्रों के अभिमत आपको सहज कंठस्थ हैं। सुबह से शाम तक लगातार कक्षाओं के माध्यम से श्रावकों को आगम की शिक्षा देने में विशेष पारंगिकता है आपको। आप एक आदर्श कवि भी हैं। साथ ही कविता की प्रस्तुति में आपका मधुर कंठ आपके कवित्व को और भी निखारता है। त्वरित संवाद और विषयों पर त्वरित लेखन और कविता की कंठस्थ प्रस्तुति आपको विशेष बनाती है। आप आचार्य गुरुदेव विरागसागर जी के गृहस्थ जीवन के भांजे हैं। आपका गृहस्थ जीवन का पूरा परिवार पूर्ण रूप से धार्मिक है। बाल्य अवस्था से ही परिवार ...