Posts

अब होंगे सपने साकार भाग -5

Image
अब होंगे सपने साकार भाग -5 बच्चों को कार नहीं संस्कार दीजिए   जब हम औरों के काम आते हैं, तो ईश्वर के काफी करीब होते हैं। आप जीवन में इतनी ऊँचाइयाँ अवश्य छू लें कि लोग आपके माता पिता से पूछें कि आपने ऐसे क्या पुण्य किये, जो आपकी इतनी अच्छी संतान हुई। रिश्ते को रिसने मत दीजिये, दूब को हरा रखने के लिए पानी डालना पड़ता है और रिश्तों को मिठास भरा बनाने के लिये प्रेम समर्पित करना होता है। बच्चों को कार नहीं संस्कार दीजिए। इससे आपका गौरव बढ़ेगा और बच्चे बेहतर नागरिक बनेंगे। मंदिर में हम आधा घंटा रहते हैं, पर घर में हम 24 घंटे रहते हैं। अपने धर्म की शुरुआत घर से कीजिए। घर में मंदिर नहीं, घर को ही मंदिर बना लीजिए। हाथ का उपयोग मेंहदी के लिए नहीं, मेहनत के लिए कीजिये। मेंहदी का रंग कुछ दिन में फीका पड़ जाता है, पर मेहनत का रंग जीवन भर परिणाम दिया करता है। जीवन में विपत्ति आना पार्ट ऑफ़ लाइफ है, विपत्ति में भी मुस्कुरा कर शांति से बाहर निकलना आर्ट ऑफ़ लाइफ है। लोग कहते हैं जब कोई अपना दूर चला जाता है, तो तकलीफ़ होती है, परंतु प्रकृति का नियम है ।  सूर्य भी एक समय के बाद अस्त हो जाता...

जन-जन के संत भाग -30

Image
  जन-जन के संत  भाग - 30   आचार्य भगवन विद्यासागर जी महाराज के प्रति अटूट आस्था वर्ष 2016 में आप मुनि अवस्था में अपनी देशना करते हुए बुन्देलखण्ड में थे। तभी महातीर्थ कुंडलपुर में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की देशना चल रही थी। आचार्य भगवन को निकट देख आपने अपने कदम तुरन्त उनके दर्शन को कुंडलपुर की और बढ़ाये और पूर्ण भक्ति भाव से आचार्य भगवन के दर्शन कर उनके साथ पूरे संघ का मंगल आशीष प्राप्त किया। आचार्य भगवन के साथ बिताए चंद समय में आपके द्वारा आगम से जुड़े कुछ प्रश्नों पर आचार्य गुरुदेव द्वारा मुस्काकर उनका उत्तर दिया गया। आचार्य महाराजों के प्रति आपका यह आदर, समर्पण और भक्ति आपको विशेष बनाती है। आचार्य भगवन के प्रति आपकी अटूट आस्था का परिणाम है कि आप सदैव उनकी धर्मदेशना, चर्या से प्रभावित होकर उनके बतलाये मार्ग का अनुसरण करते हैं तथा उनकी जन्म जयंती व विशेष दिवसों को समाज से उत्साहपूर्वक मनवाते हैं।  आचार्यों की वंदना, आदर अरु सत्कार  है विशेषता आपकी, यही सुयश का सार। लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद सागर (म.प्र.) मो. 91 93009 34766 क्रमशः ।। ओऽम् श्...

अब होंगे सपने साकार भाग - 3

Image
अब होंगे सपने साकार भाग - 3 हमेशा गुलाब के फ़ूल की तरह महकिए मानवता की सेवा करने वाले हाथ उतने ही धन्य होते हैं, जितने परमात्मा की प्रार्थना करने वाले होंठ। यदि आप चाहते हैं कि सभी लोग आपको प्यार व सम्मान दें तो आप अपने क्रूर और क्रोधित स्वभाव को सरल और सौम्य बनाएँ। आग से जलते वृक्ष की शाखा पर कोई भी पंछी बैठना पसंद नहीं करता। हमेशा गुलाब के फूल की तरह रहिए जो तब भी खुशबू देता है, जब कोई उसे मसलता है। धीरज मत खोओ, हीनता और हताशा तुम्हें शोभा नहीं देती अपने आत्म विश्वास को बढ़ाओ फिर से प्रयास करो। तुम्हें सफलता अवश्य मिलेगी। मन की शांति को उतना ही मूल्य दीजिये, जितना कि आप अपनी पत्नी और पैसे को देते हैं। मूर्ख और गलत व्यक्ति को दोस्त बनाने की बजाय आपका अकेला रहना ज्यादा फायदेमंद है। गुलाब की तरह सदा इतने प्रसन्न रहिए कि चिंता के काँटे आपको छू भी न पाएँ। कहते है जब कोई अपना दूर चला जाए तो तकलीफ होती है। पर उससे भी ज्यादा तकलीफ तब होती है जब कोई अपना पास रहकर भी दूरियाँ बना लेता है। जब हर वर्ष दीवार पर टँगा पुराना कैलेण्डर उतार कर रख दिया जाता है तो वर्ष बीतने के बाद भी किसी के प्र...

जन-जन के संत भाग - 29

Image
  जन-जन के संत  भाग - 29   सर्वधर्म समभाव सम्मेलन धर्म धरा पर यूँ तो संत बहुत होते हैं, सभी के द्वारा की जा रही धर्म देशना भी निश्चित रूप से समाज का कल्याण करती है, किन्तु जैन समाज के साथ सर्व मानव समाज के कल्याण की सोच और उद्देश्य आपको सर्व संतों में विशिष्ट बनाती है। वर्ष 2006 में डबरा ग्वालियर में समस्त हिन्दू समाज के संतों के साथ सर्व धर्म समभाव का उद्देश्य लेकर एक विशाल सम्मेलन किया गया। जिसमें हिन्दू समाज के विभिन्न संतो के साथ एक ही मंच से आपके विशेष प्रवचन हुए, जिसमे आपने सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण की बात करते हुए अहिंसा और सत्य धर्म का जयघोष किया, जिसकी प्रेरणा से बहुत लोग प्रभावित हुए। सर्व साधारण तक ने जैन दर्शन की महत्त्व को जाना। जिसकी सराहना वहां मौजूद प्रबुद्ध जनमानस और अन्य हिन्दू संगठनों तथा सर्व धर्मों के संतों द्वारा की गई। यह आपकी विशेष सकारात्मक सोच और नवाचार की सुवृत्ति है, जो सदा ही मानव जाति को कल्याण का मार्ग दिखाती है। हुई सभा तो कर लिया, सबने यह स्वीकार    जिन दर्शन है विश्व का, मंगलमय आधार। लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद सागर (म.प्र.) म...

अब होंगे सपने साकार भाग - 2

Image
अब होंगे सपने साकार  भाग - 2   रंगोली दो दिन की होती है रंगोली दो दिन की होती है, फिर भी उसे हम खूब सजाते हैं। ठीक वैसे ही ज़िंदगी भी कुछ वर्षों की है, इसे श्रेष्ठ कर्मों से खूब सजाने की कोशिश कीजिए। केवल धागा लम्बा होने से कोई पतंग आसमान तक नहीं पहुँचती, पतंग को आसमान तक पहुँचाने के लिए उड़ाने का तरीका आना ज़रूरी है। ज्यादा धन होने से ज़िंदगी में खुशियाँ नहीं आती, ज़िंदगी में खुशियाँ भरने के लिए प्रेम और मिठास का रंग तरीके से घोलना जरूरी है। चेहरा देना कुदरत का काम है और चेहरे को रंग देना भी कुदरत का ही काम है, पर जीवन को देखने और जीने का ढंग कैसा हो, यह अपने आप पर है। जीवन ऐसा जिएँ जो औरों को भी इंद्र धनुषी रंग जैसा सुकून दे। रचयिता - परम पूज्य जनसंत उपाध्याय श्री 108 विरंजन सागर जी महाराज क्रमशः ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share कर...

जन-जन के संत भाग - 28

Image
 जन-जन के संत  भाग - 28   विदेशों में भी हैं आपके भक्त संत, सूरज, सरिता और सड़क किसी व्यक्ति विशेष के नहीं होते। जिसने संत की वाणी को समझ लिया, सन्त उसके हैं। पूज्य गुरुदेव की सहजता, सरलता और वाणी की मिठास का प्रभाव है कि जो आपके पास एक बार आया, वह आपसे कभी चाहकर भी दूर नहीं जा पाता। आपका त्याग, तप, संयम और देशना लोगों को आकर्षित करती है। साथ ही आपकी सहजता, सरलता और संवाद की कला आपसे जुड़ने को आमंत्रण देती है। क्षुल्लक अवस्था मे आपने हिंदुस्तान के कोने कोने में जाकर धर्म देशना फैलाई है। साथ ही जैन और अन्य जाति वर्ग के लोगों में तीर्थंकरों की मंगल वाणी का जयघोष किया है। आपकी इस लोकप्रियता के कारण आपके कई अनुयायी भक्त हिंदुस्तान की भूमि से बाहर रहकर भी आपके बताए गए मार्गों पर चलकर जीवन धन्य कर रहे हैं। समय-समय पर स्वदेश प्रवास पर प्रत्यक्ष दर्शन लाभ लेकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। कोरोना काल मे लॉक डाउन और सोशल डिस्टेंस के कड़े नियमो से जहां मन्दिर जी के पट तक बन्द हो गए थे, वहां आपने सोशल नेटवर्क के माध्यम से जूम और अन्य साधनों से देश-विदेश के भक्तों के साथ जुड़कर धर्म देशना क...

अब होंगे सपने साकार भाग -1

Image
अब होंगे सपने साकार भाग -1   ज़िन्दगी एक बाँसुरी है ज़िन्दगी एक बाँसुरी है। उसमें दुःख रूपी छेद तो बहुत सारे हैं, पर जिसको बाँसुरी बजानी आ जाती है, वह उन छेदों में भी मीठा संगीत पैदा कर लेता है। ज़िन्दगी जलेबी की तरह होती है। यह टेढ़ी-मेढ़ी ज़रूर होती है, पर मुस्कान की चाशनी अगर हम लगाते रहेंगे, तो यह भी सबको मधुर लगेगी। ज़िन्दगी एक गजब की परीक्षा है । जब परीक्षा की ज़िंदगी खत्म हो जाती है, तो ज़िंदगी की परीक्षा होनी शुरू हो जाती है। ज़िन्दगी में हर किसी को अहमियत दीजिए। विश्वास रखिए, जो अच्छे होंगे वे आपको सबक देंगे। ज़िंदगी में सदा खुश रहो। गम को भुला दीजिए । न खुद रूठिए, न दूसरों को रूठने का अवसर दीजिए। खुद भी हंसकर जीने की कोशिश कीजिए और दूसरों को भी हंसकर जीना सिखा दीजिये। पानी से कभी तस्वीर नहीं बनती और ख्वाबों से कभी तकदीर नहीं बनती । ज़िंदगी में श्रेष्ठ कर्म करते रहिये, क्योंकि यह जिंदगी बार-बार नहीं मिलती। कभी भी पीपल के पत्तों जैसा मत बनिए जो वक्त आने पर सूखकर गिर जाते हैं। ज़िंदगी में हमेशा मेंहदी के पत्तों की तरह बनिये, जो खुद पिसकर भी दूसरों की ज़िंदगी में रंग भर देते हैं। ...

जन-जन के संत भाग - 27

Image
  जन-जन के संत  भाग - 27   राष्ट्रीय संत मुनि तरुण सागर जी के साथ प्रवचन बात वर्ष 2010 की है। जब आप क्षुल्लक अवस्था में थे, आपकी साधना बुन्देलखण्ड के हृदय स्थल सागर में चल रही थी। उसी बीच मँगलगिरि तीर्थ, जो कि सागर में स्थित है, वहाँ अल्प समय के लिए क्रांतिकारी संत मुनि तरुण सागर जी का आगमन हुआ। कड़वे प्रवचनों के लिए प्रसिद्ध मुनि तरुण सागर जी की अलग से खुले मैदान में प्रवचन सभा लगवाई गई। भारी भरकम भीड़ और दूर-दूर से आये श्रावकों के मध्य मुनि तरुण सागर जी की उपदेश सभा मंे उनके मंच से उनके ही साथ उनसे पूर्व आप के प्रवचन हुए। जिसकी सराहना सम्पूर्ण समाज द्वारा की गई। प्रवचन उपरांत मुनि तरुण सागर जी द्वारा भी आपकी सकारात्मक सोच और किये जा रहे कार्यों की खूब प्रशंसा की गई और कहा गया कि समाज और राष्ट्र कल्याण में यूँ ही अग्रसर रहिए। देश को ऐसे संतों की बहुत आवश्यकता है। जग विख्यात मुनि श्री, तरुण सिन्धु जयवंत, सुन वाणी जनसंत की, मुदित हुये श्री संत। लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद सागर (म.प्र.) मो. 91 93009 34766 क्रमशः ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी...

जन-जन के संत भाग - 26

Image
जन-जन के संत  भाग - 26     क्षु ल्लक सम्मेलन जैनेश्वरी दीक्षा के कुछ नियम होते हैं। यह त्याग और संयम के अनुसार बढ़ते हुए क्रम में गुरु आज्ञा से प्रदान की जाती है। दीक्षा के क्रम निम्न प्रकार से होते हैं। ब्रह्मचारी, क्षुल्लक, ऐलक और मुनि अवस्था। ब्रह्मचारी सफ़ेद धोती और दुपट्टा पहिनते हैं। क्षुल्लक अवस्था मंे लंगोट और एक दुपट्टा की छूट होती है, वहीं ऐलक अवस्था मंे सिर्फ एक लंगोट की छूट और मुनि अवस्था मे पूर्ण दिगम्बर अवस्था का विधान है। इस पद में बिना कोई वस्त्र धारण किए साधु निग्र्रन्थ अवस्था में साधना के मार्ग पर चलते हैं। छुल्लक अवस्था मे साधुओं को आगम के नियमानुसार धर्म के प्रसार-प्रचार के लिए आवागमन में वाहन का प्रयोग करने की कुछ छूट मिल जाती है। इस प्रकार आवश्यकता पड़ने पर वे धर्म प्रसार के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए तीव्र गति से आगमन और प्रस्थान कर सकते हैं। वर्ष 2006 में दिल्ली में बुद्ध विहार में पहली बार क्षुल्लक सम्मेलन का आयोजन गुरुदेव विरंजन सागर जी के नेतृत्व में सम्पन्न हुआ। जिसमें करीब 22 क्षुल्लक साधुओं ने भागीदारी कर धर्म के प्रचार-प्रसार मे...

जन-जन के संत भाग - 25

Image
  जन-जन के संत  भाग - 25   अमृतसर बाघा बार्डर पर प्रवचन मानव जीवन के सर्वांगीण विकास तथा उत्थान में राष्ट्र और धर्म के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। राष्ट्र जहां हमें स्वतंत्रता की आज़ादी देता है, वहीं धर्म उस आज़ादी को सदमार्ग की राह दिखाता है। अमूमन देखने को मिलता है कि हिंदुस्तान में सभी जाति वर्गों के अलग-अलग संत हंै, जिनका उद्देश्य अपने धर्म व जाति का कल्याण और प्रचार-प्रसार करना होता है, किंतु पूज्य विरंजन सागर जी की सदैव सोच रही है कि राष्ट्र के बिना धर्म की सुरक्षा सम्भव नहीं। यही कारण है आप सदा राष्ट्रीय त्योहारों पर राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्र के योगदान और महत्त्व की बात करते हुए इन पर्वों को भी बहुत उत्साह से मनाते हैं। ऐसे कार्यक्रमों में तिरंगा फहराकर हिन्दुत्व का जयघोष करते हैं। अप्रैल 2013 में कुछ ऐसा ही ऐतिहासिक कार्य करते हुए प्रथम बार किसी जैन संत द्वारा बाघा बार्डर (हिंदुस्तान, पाकिस्तान की सीमा) पर हिंदुस्तान की रक्षा करने वाले सैनिकों को राष्ट्र के नाम उपदेश देकर समाज को संदेश दिया। गुरु जी ने जोर देकर कहा कि जैन संत और जैन धर्म के लिए राष्ट्र सर्वोपर...

जन-जन के संत भाग - 24

Image
  जन-जन के संत  भाग - 24   महान तपस्वी - चर्या के गहन साधक पूज्य गुरुदेव विरंजन सागर जी दीक्षा के प्रथम पड़ाव से ही कठिन साधना में लीन रहते हैं। गुढ़ा ललितपुर में चातुर्मास के दौरान दिसम्बर की कड़कड़ाती हुई ठंड में ब्रह्मकालीन मुहूर्त में मन्दिर जी की छत पर जाकर एकांत मुद्रा में साधना करते रहते थे। वहीं भीषण गर्मी में तपती दोपहर में आग उगलती लपटों के बीच आपको कई कई बार तेज धूप में साधना करते पाया जाता है। यह आपकी आत्मा के एक कठिन गहन योगी तपस्वी होने के पूर्ण संकेत देता है। इसके साथ ही एक महत्त्वपूर्ण बात यह कि आपको अनुवांशिक रूप से मधुमेह शुगर की बीमारी है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मधुमेह से ग्रसित व्यक्ति को इन्सुलिन की पूर्ति बनाये रखने के लिए बार-बार भोजन की आवश्यकता होती है। अतः ऐसी स्थिति में व्रत या उपवास को पूर्ण रूप से निषेध किया जाता है, किंतु आप महान तपोबल के धारी हैं। पर्वराज पर्युषण में पिछले 9 वर्षों से 10 उपवास एवं प्रत्येक अष्टमी चतुर्दशी पर उपवास का नियम आपके तपोबल को बढ़ाता ह,ै जिसके आगे आपकी बीमारी भी शून्य दिखाई पड़ती है।  जय हो गुरुदेव, धन्य है आपकी ...

जन-जन के संत भाग - 23

Image
  जन-जन के संत  भाग - 23   जन्मभूमि ग्राम सदगुवां से श्री जी को भव्य नवीनतम जिनालय दमोह में विराजमान करवाया सोच सार्थक हो, तो सफलता खुद आँगन में आकर आमंत्रण देती है। हुआ यूँ कि आपकी जन्मभूमि एक बेहद छोटा-सा गाँव सदगुवां है, जो कि जिला दमोह में स्थित है। जहाँ तीन जैन परिवार निवास किया करते थे। कुल मिलाकर तीन घर- एक आपके गृहस्थ जीवन का और दूसरा आपके गृहस्थ जीवन के चाचा सेठ कस्तूरचंद्र जी जैन का, जो आज भी गाँव मे निवास करते हैं। आपकी दीक्षा के पूर्व ही आपका पूरा परिवार संस्कार धानी जबलपुर में स्थानांतरित हो गया था। ऐसे में गाँव के मंदिर की पूजा-अर्चना, अभिषेक और सुरक्षा एक परिवार पर ही आ गई। बरसात और प्रतिकूल मौसम में मन्दिर तक पहुंचने में गाँव की भूमि अवरोध पैदा करती थी। ऐसे में पूज्य गुरुदेव के मन मे एक सार्थक विचार आया, जो लोगों के लिए किसी स्वर्णिम स्वप्न की तरह था, कि क्यों न गाँव के श्री जी को निकट नगर दमोह में भव्य मंदिर का निर्माण कर विराजमान किया जाए? इसी सकारात्मक सोच के साथ आपने वर्ष 2016 में दमोह में भव्य पंचकल्याणक कराया और सागर रोड पर लाल पत्थरों से भव्य जिनालय...

जन-जन के संत भाग - 22

Image
  जन-जन के संत  भाग - 22   शिमला के ठिठुरते मौसम में चातुर्मास शिमला शब्द सुनकर ही गिरती बर्फ और ठिठुरते मौसम का एहसास होता है, जहां लोग वर्ष भर मोटे-मोटे स्वेटर व कम्बलों में रहते हैं। वहां सर्दी के मौसम में पहली बार किसी जैन मुनि ने चातुर्मास किया। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। वहाँ जैन समाज कम थी, पर धर्म प्रभावना का लक्ष्य अधिक। गिरती हुई बर्फ में आप सन् 2009 में मुनि विशोकसागर जी महाराज के संघ के साथ चातुर्मास कर एक इतिहास तो रच ही रहे थे, साथ ही देश दुनिया को दिगंबर संतों की तपस्या के बारे में एक संदेश भी दे रहे थे। जैन समाज के अभाव में जैनेतर समाज के लोगों को जैन दर्शन की प्रेरणा देते हुए उनकी कक्षाएँ लेते हुए आपने उन्हें जैन धर्म की महत्ता सिखलाई और तीर्थंकरों की वाणी का जयघोष किया। आपकी मंगल देशना के कारण वहां अलग अलग वर्ग और जाति के लोग णमोकार मंत्र और श्री भक्तामर जी का पाठ कर जैन दर्शन का गुणगान करने लगे। इससे जैन धर्म की प्रभावना तो हुई ही, साथ ही सम्पूर्ण मानव समाज को एक अच्छा संदेश भी गया। यह आपकी स्वर्णिम उपलब्धियों में से एक है। मेरी ही चार पंक्त...

जन-जन के संत भाग - 21

Image
जन-जन के संत  भाग - 21     पंथ और कंत से पृथक हैं जनसंत- श्वेताम्बर साधु महाश्रमण जी के साथ प्रवचन पूज्य गुरुदेव की सोच हमेशा सर्व धर्म सम भाव की रही है। उन्होंने सभी जाति वर्ग धर्म के लोगों में अहिंसा और सत्य धर्म का जयघोष किया है। तीर्थंकरों की मंगल वाणी को जन-जन में फैलाने की सोच उनकी सदा से है। जैन आगम के पंथ से ऊपर उठकर वे सभी पंथों- चाहे दिगम्बर हो या श्वेताम्बर, के साधुओं, भट्टारकों से बराबर का तालमेल रखते हुए तीर्थंकरों की देशना को प्रसारित करने का पुनीत कार्य करते रहते हैं। इसी तारतम्य में वर्ष 2014 की बात है। देश की राजधानी दिल्ली में आपके श्वेताम्बर साधु आचार्य महाश्रमण जी के साथ एक ही मंच पर प्रवचन हुए। जहां आपने दिगम्बर और श्वेताम्बर समाज को एक साथ सम्बोधित करते हुए जैन समाज के एकीकरण की बात कही। यह आपकी सकारात्मक सोच और जैन धर्म के अनुयाइयों को संगठित करने के पावन उद्देश्य को दर्शाता है। पंथवाद में उलझकर, मत होना कमजोर जैन एकता पर सदा, गुरुवर देते जोर। लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद सागर (म.प्र.) मो. 91 93009 34766 क्रमशः ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरि...

जन-जन के संत भाग - 20

Image
जन-जन के संत  भाग - 20   शब्दों से परे हैं विराट व्यक्तित्व जिस तरह सैकड़ों सरितायें मिलकर भी सागर की विशालता की बराबरी नहीं कर सकतीं, हज़ारों दीपकों के प्रकाश से दिनकर की रोशनी नहीं नापी जा सकती; ठीक उसी तरह किसी भी कवि-साहित्यकार के शब्दों में इतनी ऊर्जा नहीं कि वे किसी दिगम्बर संत के व्यक्तित्व को प्रकाशित कर सके। एक लेखक जो देखता है, वह लिखता है और जो लिखता है, वह जीता है। मैंने जैन संस्कारों में जन्म ही नहीं लिया, बल्कि जैन दर्शन और दिगम्बर मुद्रा को बेहद करीब से देखा, जाना और अध्ययन किया है। दिगम्बर शब्द ही अपने आप में पूज्य है। किंतु जब बात दिगम्बर संत मुद्रा के उत्तुंग शिखर जनसंत विरंजनसागर जी के व्यक्तित्व पर लेखनी द्वारा शाब्दिक रंग भरने की हो, तो शब्द जैसे भयभीत हो जाते हैं कि कैसे परिभाषित करूँ उस मुद्रा के विराट व्यक्तित्व को, जो श्रेष्ठ ही नहीं बल्कि पूज्यता के शिखर पर है? तीर्थंकरों की मुद्रा को हमने सिर्फ पढ़ा है, किंतु उनका प्रतिबिंब दिगम्बर संतों के रूप में हम साक्षात देख पा रहे हैं। निश्चित ही उस समय तीर्थंकर इसी स्वरूप में रहे होंगे। पूज्य विरंजनसागर जी महाराज...