जन-जन के संत भाग - 10
जन-जन के संत भाग - 10 मुनि दीक्षा जब आत्मा परमात्मा की ओर अग्रसर होती है, तो संत की देह संतत्व के अलावा और कोई वस्तु स्वीकार नही करती। ऐसे में एक हल्की लंगोट का भार भी कहाँ सहन होने वाला था? मन दिगम्बर था ही, तन को दिगम्बर कर सम्पूर्ण धरती और अम्बर में धर्म रथ को आगे बढ़ाना था, और जन्म स्थान सदगुवां के नजदीक दमोह में 18 जनवरी 2016 के दिन गुरु विराग सागर जी ने क्षुल्लक विरंजन सागर जी को मुनि दीक्षा दी। क्षुल्लक से मुनि अवस्था प्राप्त होने पर त्याग तप और धार्मिक क्रियाएं निश्चित रूप से बढ़ने वाली थीं, किन्तु भव्य आत्मा को परमानंद, तो कठिन साधना में ही आता है। स्वर्णिम संयोग की बात यह थी कि यह मुनिदीक्षा पंचकल्याणक के अवसर पर हुई। इस दिन भगवान का दीक्षा कल्याणक का अवसर भी था। अतः भगवान के दीक्षा कल्याणक के अवसर पर पूज्य विरंजनसागर जी महाराज की मुनिदीक्षा सम्पन्न हुई। भोर हुई आकाश को, हुआ नवल आभास सूर्य उदित नभ में हुआ, फैला दिव्य प्रकाश। क्षुल्लक अवस्था में चातुर्मास वर्ष 2006 रोहिणी सेक्टर 3 - दिल्ली वर्ष 2007 शालीमार बाग दिल्ली वर्ष 2008 हांसी हरियाणा वर्ष 2009 शि...