अब होंगे सपने साकार भाग -8
अब होंगे सपने साकार भाग -8
कठोर अनुभव और विपदाओं से गुजरे बिना किसी की प्रगति नहीं हो सकती। शिल्पकार की हथौड़ी की चोट सहे बिना कोई भी पत्थर मूरत नहीं बन सकता है।
दूसरों की भूलें देखने के लिए दूरबीन का उपयोग करने की बजाय अपनी भूलें देखने के लिए दर्पण का उपयोग कीजिए। दूसरों को सुधारने से पहले खुद को सुधारना ही ज्यादा महान कार्य है।
लक्ष्य यदि स्पष्ट नहीं है तो केवल दौड़-धूप मचाने से मंजिल नहीं मिला करती है। दौड़-भाग तो दिनभर कुत्ता भी करता है, पर वह कभी मंजिल तक नहीं पहुँच पाता है।
किसी भी असफलता को हम सफलता में इसलिए न बदल पाए, क्योंकि अपनी असफलता का कारण हम शनि, राहु,.केतु की दशा को देते रहे। अगर अपनी कार्य प्रणाली के दोष को देखकर उन्हें हटा देते तो हम कब के सफल हो गए होते।
हम कामयाबी के लिए बातें कम कर्मयोग ज्यादा करें। इच्छाएँ कम, इच्छा शक्ति को बढ़ाने की कोशिश ज्यादा करें।
संकट में आत्मविश्वास रखिए, साधना में आत्मज्ञान रखिए और सुखों में आत्मसंयम रखिए। सदा याद रखिए कि शरीर श्वास से चलता है, पर जीवन आत्मविश्वास से बनता है।
सच्चे मित्र ढाल की तरह होते हैं, जो सुख में तो पीठ पीछे रहते हैं, पर संकट में बचाने के लिए सामने आ जाते हैं।
अपने नजरिये को सुधार लीजिए। बंद घड़ी भी दो बार तो सही समय दिखाती है।
असफल हो गये हों तो चिंता न करें। असफल होना गुनाह नहीं है, पर सफलता के लिए पुनः प्रयास न करना अवश्य गुनाह है।
निराशा आशा के अधर में झूलने की बजाय प्रभु की सेवा समझकर प्रत्येक कार्य संपादित कीजिए। निष्काम भाव से किया गया प्रत्येक कार्य ईश्वर की पूजा के समान है।
जिन बाधाओं को रोकना मनुष्य के हाथ में होता है। समय रहते उनके दरवाजे बंद कर देना चाहिए।
रचयिता - परम पूज्य जनसंत उपाध्याय श्री 108 विरंजन सागर जी महाराज
क्रमशः
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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