अब होंगे सपने साकार भाग - 9
अब होंगे सपने साकार भाग - 9
खाने के लिए नहीं जीना
स्वाद के लिए खाना अज्ञान है, जीने के लिए खाना बुद्धिमानी है, संयम की रक्षा के लिए खाना साधना है।
भोजन करते समय पेट को चौथाई भाग खाली भी रखिए, कम खाइए, गम खाइए और सुखी रहिए। एक बार योगी खाता है। दो बार भोगी खाता है। बार-बार खाने वाला स्वतः रोगी हो जाता है।
हम जैसा अन्न खाते हैं, वैसा ही हमारा तन मन होता है। सच्चाई तो यह है कि आप वैसा ही हो, जैसा खाते हो। इंसान के खानपान से ही उसके खानदान का पता चलता है।
आहार-विहार, संयमित शयन, जागरण, भोग और योग संयमित हो तो बेहतर रहता है। जो सीमित खाता है, वह ज्यादा जीता है। इसलिए ज्यादा खाकर जल्दी मरने वालों से वह व्यक्ति ज्यादा अच्छा है, जो जीने के लिए खाता है।
आहार के चार चरण हैं। उगाना, पकाना, पहले चबाना, फिर पचाना। खेत से लेकर पेट तक होने वाली यह यात्रा अगर स्वस्थ हो, तो व्यक्ति अपना चिकित्सक स्वयं होता है। आहार व्यक्ति के स्वस्थ शरीर पर बहुत प्रभाव डालता है।
रचयिता - परम पूज्य जनसंत उपाध्याय श्री 108 विरंजन सागर जी महाराज
क्रमशः
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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