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मन चंगा तो कठौती में गंगा

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज मन चंगा तो कठौती में गंगा जिसका मन विशुद्ध है, उसके घर में गंगा है और जिसका जीवन पवित्र है, उसका जीवन एक मंदिर है। जिसका मन मलिन है, उसके द्वारा किया गया जप, तप, दया-दान, दीक्षा-शिक्षा आदि समस्त धार्मिक क्रियाएँ निष्फल हैं। धर्म का आधार मन की पवित्रता है। जिसका मन निर्मल हो वह व्यक्ति दुकान में बैठा हो या मकान में, देश में हो या विदेश में, अकेले में या भीड़ में, हर स्थान उसके लिए तीर्थस्थल बन जाता है। ‘‘न्हाए धोए क्या हुआ जो मन मैल न जाए। मीन सदा जल में रहे, धोए बास न जाए।’’ भक्त रैदास का जीवन प्रामाणिक और पवित्र था। परिवार के भरण पोषण के लिए वे जूते गाँठते थे। आय कम होने पर भी उन्हें संतोष बहुत था। जब भी उन्हें समय मिलता, वे सत्संगति और प्रभु भक्ति करते थे। एक बार गंगा के किनारे भारी मेला लगा। हजारों व्यक्ति दूर-दूर से गंगा-स्नान के लिए आ रहे थे। उसमें एक पण्डित भी था। उसका ज्ञान कम था पर अहंकार बहुत ज्यादा था। उसके जूते मार्ग में चलते-चलते फट गए थे। ज्यों ही वह रैदास के गाँव से गुजरा, उसने रैदास को जूते गाँठते देखा तो अपने जूते भी ठीक करने को कहा। रैदा...

दृष्टि अपनी अपनी

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज दृष्टि अपनी अपनी इस विश्व में जितने लोग है उतने मत हैं और जितने मत हैं उतनी ही अभिव्यक्तियाँ है क्योंकि इसके पीछे एक मात्र एक दृष्टि की भिन्नता काम करती है। जैसी हमारी दृष्टि होती है वैसे ही हमारे भाव बनते हैं और उसी के अनुरूप हम वस्तु, व्यक्ति तथा परिस्थिति को निहारते हैं। प्रत्येक वस्तु के अनेक पक्ष एवं पहलू होते हैं। एक गाँव में जाने के लिए दस रास्ते होते हैं और एक मकान में प्रवेश पाने के लिये दो दरवाजे हो सकते हैं। अतः स्पष्ट है कि सृष्टि की भिन्नता का कारण दृष्टि है। जैसे किश्ती का रुख बदल देने से किनारे बदल जाते हैं और नजर को बदलने से नजारे बदल जाते हैं, वैसे ही दृष्टि के बदलने से संसार बदल जाता है। किसी निर्जन जंगल में एक संन्यासी ने अपनी छोटी सी कुटिया बना रखी थी। मनुष्य की बस्ती से बहुत दूर होने से स्थान एकान्त एवं शांत था। विभिन्न प्रकार के वृक्षों से युक्त होने के कारण वह स्थान यात्रियों को बहुत आकर्षित करता था। वस्तु या स्थान एक ही होता है किन्तु उसे देखने वाले लोग उसे अनेक दृष्टियों से देखते हैं। जिस प्रकार एक डॉक्टर पैनी छुरी से रोगियों के ...

देर है पर अंधेर नहीं

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज देर है पर अंधेर नहीं प्रत्येक कार्य का फल देर-सवेर निश्चित रूप से प्राप्त होता है अतः कार्य के फल में न संदेह करना चाहिए, न अधीर होना चाहिए। विधेयात्मक चिन्तन आशा रूपी दीप के लिए तेल का कार्य करता है और नकारात्मक चिन्तन हवा बनकर आशा के दीप को बुझा देता है। प्रकृति, समय और धैर्य; ये तीन ऐसे डॉक्टर हैं जो मन को सतत् निर्विकार बनाकर साधना में स्थिर कर देते हैं। कार्य की संपन्नता या सफलता शक्ति की नहीं उत्साह की अपेक्षा रखती है। आस्थावान मन ही उत्साहित रह सकता है। मनुष्य अपने आनन्द का निर्माता स्वयं है। अतः इस प्रकार जीना चाहिए ताकि हम अपनी जिन्दगी को देखकर प्रसन्न हो सकें। एक पौराणिक लोकप्रिय कथा है। कहते हैं कि इस धरती पर जब-जब भी कुछ अच्छा या बुरा होता है तो उसकी चर्चा स्वर्ग में अवश्य होती है। धरती के लोगों के समाचार स्वर्ग तक पहुँचाना और देवताओं के संदेश मनुष्यों को देना, इस कार्य में नारद जी का नाम प्रसिद्ध था। ‘‘नारायण-नारायण’’ कहकर हर स्थान, हर घर में प्रवेश पा लेना नारद मुनि की खासियत थी। एक बार नारद जी स्वर्गलोक से उतरकर धरती पर आ रहे थे। मार्ग मे...

लाज सुधारे काज

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज लाज सुधारे काज लज्जा मन का ऐसा सुन्दरतम भाव है जिससे बिगड़े हुए कार्य भी सुधर जाते हैं। लज्जा सुन्दरता और सद्गुणशीलता का किला है। लज्जा एक ऐसा संकेत है जिसे प्रकृति ने पतिव्रता के सम्मान और सभ्यता का माध्यम बना दिया है। इस धरती पर मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो लज्जित होता है या जिसे लज्जा से रहने की जरूरत है। जो आत्माभिमान से रहता हो और अपने सत्कार्यों से सारे शहर में सम्मानित माना जाता है, वह कभी लज्जा शून्य नहीं हो सकता। लज्जा का आकर्षण सौन्दर्य के आकर्षण से अधिक होता है। लज्जा ने सदैव वीरों को परास्त किया है। जो काल से नहीं डरते वे भी लज्जा की शक्ति के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं करते। एक सेठ के पास अपार धन-सम्पत्ति थी। उदारता, न्यायप्रियता और मृदुभाषिता जैसे अनेक गुणों के कारण नगर में उनकी बहुत इज्जत थी। जिस मार्ग से सेठ गुज़रते थे, उनके स्वागत में लोग हाथ जोड़कर सिर झुकाकर खड़े हो जाते थे। राजा के द्वारा उन्हें ‘‘नगर सेठ’’ की उपाधि प्रदान की गई। जब भी वे सेठानी के साथ चर्चा-वार्ता करते तब एक अभाव का बार-बार जिक्र किया करते थे। कुदरत ने हमें ...

जो ज्ञान मोक्ष-मार्ग की ओर लगा दे, वही सच्चा ज्ञान है

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज जो ज्ञान मोक्ष-मार्ग की ओर लगा दे, वही सच्चा ज्ञान है महानुभावों! जो ज्ञान हमें मोक्ष-मार्ग की ओर लगा दे और कुमार्ग से हटा दे, वही सच्चा ज्ञान है। जो व्यक्ति अपनी आत्मा में ज्ञान का दीपक जला लेते हैं, उनका नर-जन्म सार्थक हो जाता है। मुनि श्री कहते हैं कि सच्चा ज्ञान सुख-प्राप्ति का एकमात्र साधन है। संसार में इसके अतिरिक्त सुख पाने का और कोई माध्यम नहीं हो सकता। सच्चे ज्ञान को संसार में सबसे पवित्र कहा गया है। ज्ञानी व्यक्ति जहाँ भी रहे, उसे सुख व सम्मान की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत अज्ञानी हर स्थान पर दुःखी व तिरस्कृत होता है। ज्ञानी नरक में रहकर भी कर्म-फल भोगता है पर दुःख की अनुभूति करके नहीं बल्कि समता भाव से, लेकिन अज्ञानी व्यक्ति स्वर्ग में रहकर भी ईर्ष्यालु प्रवृत्ति के कारण दुःखी ही रहता है। आगे मुनि श्री ने कहा कि अज्ञान या मिथ्या ज्ञान की उपासना करने वाले अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते जबकि ज्ञानी अपने ज्ञान का आश्रय लेकर क्षण भर में ही कर्मों की जंजीरों को काटने में समर्थ हैं। हित की प्राप्ति और अहित का परिहार करना ही ज्ञान का सर्वोत्तम फ...

निन्दा

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज निन्दा महानुभावों! निन्दा का अर्थ है - दूसरे की बुराई करना। हम दूसरे की बुराई कर रहे हैं तो यह निश्चित मान कर चलो कि अपने बुरे कर्मों को बांध रहे हैं। किसी के प्रति परोक्ष में बुरे वचन कहने से तो अच्छा है कि हम उसके दोष उसके सामने कहें और उसी से कहें। किसी के पीठ पीछे बुराई करना तो माँस भक्षण के समान है। किसी की निन्दा करना ही नहीं, निन्दा सुनना और करने वाले की प्रशंसा करना भी महापाप है क्योंकि इससे कृत, कारित और अनुमोदना का पाप लगता है।  हमारे मन में कषाय उत्पन्न होती है और हम जन्म-जन्म का वैर बाँध लेते हैं जो हमारे संसार परिभ्रमण का कारण बनता है। इसलिए न तो हमें किसी की निन्दा करनी चाहिए और न ही कटु शब्द बोलने चाहिए। इतना ही नहीं, यदि कोई हमसे आकर कहे कि वह व्यक्ति तुम्हारी बुराई कर रहा था तो भी हमें अपने परिणामों में शुद्धता रखनी चाहिए। ऐसी प्रतिक्रिया न दें कि आवेश में आकर तर्क करने लगें कि वह जो कह रहा है, वह सही नहीं हैं या आधार हीन हैं अपितु उसकी बातों को ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए और यदि हमें लगे कि वास्तव में यह बुराई हमारे अन्दर है तो उस पर ...

अच्छे बुरे कर्म ही इंसान को रुलाते हैं

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज अच्छे बुरे कर्म ही इंसान को रुलाते हैं महानुभावों! हम सब सुख चाहते हैं, अपना कल्याण चाहते हैं। लेकिन जब तक अंदर से राग-द्वेष की प्रवृत्ति का त्याग नहीं करेंगे तब तक कल्याण नहीं हो सकता। परस्पर सद्भाव और प्रेम के बिना न तो हम स्वयं सुखी हो सकते हैं और न ही समाज व राष्ट्र की उन्नति हो सकती है। मुनि श्री कहते हैं कि आज समाज में पैदा हुए मतभेदों ने आदमी में आपस में भाईचारे व प्रेम की भावना को भी कम कर दिया है। प्रेम भाव तो मानवता का पहला गुण है जो अन्य किसी योनि में नहीं पाया जाता। इसके बिना मानव जीवन व्यर्थ है। यदि समाज में एकता नहीं होगी तो वह उन्नति नहीं कर सकता।  मुनि श्री ने कौरवों और पांडवों का दृष्टांत सुनाते हुए कहा कि हम जैसे कार्य करेंगे उनका वैसा ही फल अपने साथ लेकर जाएंगे। ये हीरा-मोती, सोना-चांदी, धन-दौलत हमारे साथ जाने वाले नहीं हैं। इसलिए हमें प्रयत्नपूर्वक सदैव नेक रास्ते पर चल कर अपना जन्म सफल बनाना चाहिए।  हम सभी सुख तो चाहते हैं पर कार्य दुःख पाने वाले ही करते हैं। क्या इससे कभी सुख मिलेगा ? जब भी हम पर विपत्ति आती है तो हम कहते ...

श्रद्धाः साधना का साध्य

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज श्रद्धाः साधना का साध्य महानुभावों! श्रद्धा के बिना सिद्धि संभव नहीं है। धर्म के मर्म को समझने के लिए श्रद्धा की सबसे अधिक आवश्यकता है। धर्म-मंदिर तक पहुँचने के लिए श्रद्धा प्रथम सीढ़ी है। श्रद्धा साधन है अपने साध्य को पाने के लिये। संशय के हिंडोले में डोलता मन शाश्वत सत्ता के मधुर स्वर सुन ही नहीं सकता। अखंड श्रद्धा ही तुम्हारे व्यक्तित्व को खंडित होने से बचा सकती है। भगवान महावीर कहते हैं कि सम्यक् दर्शन की इमारत श्रद्धा की नींव पर ही खड़ी होती है। श्रद्धा का दूसरा नाम समर्पण है और बिना समर्पण के मोक्ष-मार्ग के प्रति प्रेम भाव नहीं बन सकता क्योंकि तर्क तोड़ता है और समर्पण जोड़ता है। तर्क की आँख से विज्ञान का जन्म होता है और श्रद्धा की दृष्टि से धर्म का जन्म होता है। श्रद्धा की नज़रों में तर्क विक्षिप्त है और तर्क की दृष्टि में श्रद्धा अंधी है। वास्तव में तर्क तो खोपड़ी की खुजलाहट मात्र है और बुद्धि ही इसका आधार है लेकिन श्रद्धा यथार्थ पर टिकी हुई है क्योंकि यह परमार्थ से जोड़ती है। समर्पण ही यथार्थ है क्योंकि यह समग्रता से किया जाता है। मुझे एक घटना य...

शिक्षण-केन्द्र ज्ञान का मंदिर है

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज शिक्षण-केन्द्र ज्ञान का मंदिर है महानुभावों! शिक्षण केन्द्र ज्ञान का मंदिर है। वहाँ ज्ञान की देवी सरस्वती की उपासना की जाती है। गुरु हमें देवी-देवताओं से जोड़ने वाली अद्भुत शृंखला (कड़ी) है। हमें हज़ारों पुस्तकें पढ़ने से भी उतना ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता, जितना एक शिक्षक के व्यावहारिक जीवन को देखकर हो जाता है। अतएव गुरु और ज्ञान की देवी सरस्वती की उपासना का फल प्राप्त करने के लिए विनय भाव होना एक आवश्यक तत्व है जिससे जीवन में नैतिकता के साथ-साथ आध्यात्मिक क्षेत्र में भी उन्नति होने लगती है। मुनि श्री ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में केवल पुस्तकीय ज्ञान को महत्व न देकर व्यावहारिक पक्ष को सुदृढ़ करने के लिए स्थान देना भी आवश्यक है। शिक्षा की योजना जीवन के उच्च आदर्शों से परिपूर्ण और भारतीय संस्कृति के अनुकूल होनी चाहिए। शुद्धाचरण, आत्म-गौरव, स्वावलम्बन व कर्त्तव्यपरायणता का विवेक जागृत होना चाहिए। इन्हीं गुणों पर भारत का उज्ज्वल भविष्य एवं निर्मल राष्ट्र का उदय निर्भर है। सच तो यह है कि जब तक मनुष्य को पुस्तकीय शिक्षा के साथ-साथ मनुष्यता की शिक्षा नहीं दी...

णमोकार मंत्र जीवन-शोधन का माध्यम है

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज णमोकार मंत्र जीवन-शोधन का माध्यम है महानुभावों! णमोकार मंत्र जीवन-शोधन का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है। इसे जीवन को ऊँचा उठाने के उत्तम माध्यम के रूप में अपनाना चाहिए। णमोकार महामंत्र और आत्म-शुद्धि के संदर्भ में यह कहना आवश्यक है कि कामनाओं, तनाव, दुःख, विकार आदि से मुक्ति णमोकार मंत्र के माध्यम से ही संभव है। हम इसके जाप द्वारा अपनी दुर्बलताओं को दूर कर सकते हैं। णमोकार महामंत्र के भाव स्मरण से प्राणी अपनी आत्मा को परमात्मा बना सकता है। इसलिए जो अपनी आत्मा की उन्नति चाहता है उसे इस मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए। आगे मुनि श्री ने कहा कि णमोकार महामंत्र का बार-बार स्मरण व चिंतन करने से व्यक्ति अपने मन को आत्म-चिंतन में लगा सकता है। जिस प्रकार एक जलता हुआ दीपक सैंकड़ों बुझे हुए दीपक जला सकता है, उसी प्रकार णमोकार महामंत्र एक प्रकाशमान दीपक है जिस के द्वारा हम अपने जीवन रूपी दीपक को रोशन करके आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। मुनि श्री ने कहा कि इस मंत्र में प्रतिरोधात्मक शक्ति उत्पन्न करने की विलक्षण क्षमता है। उसी क्षमता को लोग नमस्कार करते हैं। उसी ...