दृष्टि अपनी अपनी

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

दृष्टि अपनी अपनी

इस विश्व में जितने लोग है उतने मत हैं और जितने मत हैं उतनी ही अभिव्यक्तियाँ है क्योंकि इसके पीछे एक मात्र एक दृष्टि की भिन्नता काम करती है। जैसी हमारी दृष्टि होती है वैसे ही हमारे भाव बनते हैं और उसी के अनुरूप हम वस्तु, व्यक्ति तथा परिस्थिति को निहारते हैं। प्रत्येक वस्तु के अनेक पक्ष एवं पहलू होते हैं। एक गाँव में जाने के लिए दस रास्ते होते हैं और एक मकान में प्रवेश पाने के लिये दो दरवाजे हो सकते हैं। अतः स्पष्ट है कि सृष्टि की भिन्नता का कारण दृष्टि है।

जैसे किश्ती का रुख बदल देने से किनारे बदल जाते हैं और नजर को बदलने से नजारे बदल जाते हैं, वैसे ही दृष्टि के बदलने से संसार बदल जाता है।

किसी निर्जन जंगल में एक संन्यासी ने अपनी छोटी सी कुटिया बना रखी थी। मनुष्य की बस्ती से बहुत दूर होने से स्थान एकान्त एवं शांत था। विभिन्न प्रकार के वृक्षों से युक्त होने के कारण वह स्थान यात्रियों को बहुत आकर्षित करता था। वस्तु या स्थान एक ही होता है किन्तु उसे देखने वाले लोग उसे अनेक दृष्टियों से देखते हैं। जिस प्रकार एक डॉक्टर पैनी छुरी से रोगियों के रोग के कारणभूत शरीर के सड़े-गले अंगों को हटाकर उन्हें स्वास्थ्य और जीवन प्रदान कर सकता है तो उसी छुरी से कोई हत्यारा आदमी किसी निर्दोष प्राणी को मौत के घाट उतार देता है। एक ही छुरी से एक आदमी सुकर्म करता है, पुण्यार्जन करता है जबकि दूसरा आदमी उसी छुरी से भयानक दुष्कर्म करता है और पाप की गठरी अपने गले में बाँध लेता है।

एक बार रात्रि के सघन अंधकार में कुछ चोर उधर से निकले। उस कुटिया को देखकर उन्होंने आपस में बातचीत की - ‘‘यह कुटिया कितनी अच्छी जगह बनी है, जो दूर से किसी को नजर भी नहीं आती, क्योंकि इसके चारों ओर सघन पेड़ है। चोरी करके यहाँ आकर छिप जाने के लिए और चोरी का माल छिपाकर रखने के लिए यह स्थान कितना उपयुक्त है। लगता है हमारे जैसे किसी चोर ने यह कुटिया यहाँ निर्जन वन प्रदेश में बड़ी चतुराई से बनाई होगी।’’

कुछ समय के बाद उस कुटिया के समीप से एक मनचले युवकों की टोली निकली। उन्होंने उस कुटिया को देखकर विचार किया - ‘‘ओहो! कितना गुप्त और उपयुक्त स्थान है। यहाँ बैठकर जो मर्जी काम करो। न किसी को दिखेगा न पता चलेगा। हो सकता है ऐसे एकान्त और शान्त स्थान पर गुप्तकर्म करने के लिए यह कुटिया बनाई होगी।’’

थोड़ा समय बीता होगा कि कुछ जुआरी लोग भी उसी रास्ते से निकले। अब आप समझ ही गए होंगे कि उन लोगों ने उस कुटिया को देखकर अपने मन में क्या विचार किया होगा? उन्होंने सोचा कि आज हमारे मन की मुराद पूरी हो गई? जुआ खेलने के लिए इससे अधिक उपयुक्त स्थान और कौन सा हो सकता है? यहाँ आकर हमें कौन रोक सकता है?

अब रात्रि का अंतिम प्रहर समाप्त होने को था। ब्रह्म बेला आ पहुँची थी। एक महात्मा उधर से गुजर रहे थे। उन्होंने भी उस कुटिया को देखा तो बहुत प्रसन्न हो गए और विचार करने लगे - ‘‘कितना अच्छा शान्त एवं एकान्त स्थान है। भगवान का ध्यान एवं भजन करने के लिए यह स्थान बहुत उपयोगी है। साधना में अनुकूल क्षेत्र का बड़ा महत्व बताया गया है क्योंकि क्षेत्र का प्रथम प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है। इस बात को ख्याल में रखकर ही इस निर्जन वन में साधना करने हेतु इस कुटिया का निर्माण किया गया होगा।’’

प्रभात हुआ। प्राची से सूर्य की स्वर्ण-किरणें सृष्टि को हेम-जल से आप्लावित करने लगी। सुहावना मौसम था, ठंडी बयार चल रही थी। सुबह-सुबह उस रास्ते से एक कवि सैर करने हेतु निकला। कुटिया का ऐसा मनोरम दृश्य देखकर उसके कंठ से मधुर काव्य-पंक्तियाँ फूट पड़ी -

‘‘शमाएं हज़ार जल कर उजाला न कर सकी। तेरी झलक मिली तो, रोशनी फैल गई।

इस प्रकार उस सुन्दर कुटिया को सभी ने अपनी-अपनी दृष्टि से, निज भावों के अनुसार उसका विचार और आकलन किया। किसी भी वस्तु या स्थान का निर्णय करना आपके हाथ में है। आप अपने भावों को कैसी दिशा प्रदान करते हो इसकी आपको पूर्ण स्वतंत्रता है। यहाँ आप जैसा देखना चाहो वैसा दिखाई देता है। इसलिए कहते हैं -

‘‘दृष्टि अपनी अपनी।।’’


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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