श्रद्धाः साधना का साध्य

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

श्रद्धाः साधना का साध्य

महानुभावों! श्रद्धा के बिना सिद्धि संभव नहीं है। धर्म के मर्म को समझने के लिए श्रद्धा की सबसे अधिक आवश्यकता है। धर्म-मंदिर तक पहुँचने के लिए श्रद्धा प्रथम सीढ़ी है। श्रद्धा साधन है अपने साध्य को पाने के लिये। संशय के हिंडोले में डोलता मन शाश्वत सत्ता के मधुर स्वर सुन ही नहीं सकता।

अखंड श्रद्धा ही तुम्हारे व्यक्तित्व को खंडित होने से बचा सकती है। भगवान महावीर कहते हैं कि सम्यक् दर्शन की इमारत श्रद्धा की नींव पर ही खड़ी होती है। श्रद्धा का दूसरा नाम समर्पण है और बिना समर्पण के मोक्ष-मार्ग के प्रति प्रेम भाव नहीं बन सकता क्योंकि तर्क तोड़ता है और समर्पण जोड़ता है। तर्क की आँख से विज्ञान का जन्म होता है और श्रद्धा की दृष्टि से धर्म का जन्म होता है। श्रद्धा की नज़रों में तर्क विक्षिप्त है और तर्क की दृष्टि में श्रद्धा अंधी है। वास्तव में तर्क तो खोपड़ी की खुजलाहट मात्र है और बुद्धि ही इसका आधार है लेकिन श्रद्धा यथार्थ पर टिकी हुई है क्योंकि यह परमार्थ से जोड़ती है। समर्पण ही यथार्थ है क्योंकि यह समग्रता से किया जाता है।

मुझे एक घटना याद आ गई। कन्छेदीलाल का विवाह हुआ। उसकी पत्नी सुन्दर तो थी पर साक्षर नहीं थी। बस! अपने हस्ताक्षर करना जानती थी। कन्छेदीलाल के मन में बहुत इच्छा होती थी कि उसकी पत्नी भी ओरों की तरह उसे पत्र लिखे। जब भी पत्नी अपने मायके जाती तो कन्छेदीलाल उस के पत्र की प्रतीक्षा करता पर अंत में उसे निराशा ही हाथ लगती। उस का मन पीड़ा से भर जाता, गहरी टीस उठती पर मन मसोस कर रह जाता।

एक बार जब वह मायके जाने लगी तो कन्छेदीलाल ने उसे पत्र लिखने को कहा। पत्नी ने उत्तर दिया कि हे प्राणनाथ! मैं पत्र लिखना चाहती हूँ। मै भी चाहती हूँ कि तुम्हें प्यार भरा सुंदर सा पत्र लिखूं पर एक तो मुझे अच्छी तरह पत्र लिखना नहीं आता और दूसरे मुझे यह समझ में नहीं आता कि शुरू कहाँ से करूँ और अंत कैसे करूँ।

कन्छेदीलाल ने कहा कि बस! इतनी सी बात है! यह तो एकदम सरल है, मैं बता देता हूँ। सुनो! पत्र के प्रारंभ में लिखना - प्राणों से प्यारे ............ और अंत में लिखना - तुम्हारे चरणों की दासी। पत्नी ने कहा कि ठीक है। मैं समझ गई। पीहर से पत्नी ने पत्र लिखा लेकिन थोड़ी सी भूल हो गई। उसने शुरू में लिख दिया - चरणों के दास ............ और अंत में लिख दिया - प्राणों की प्यासी। इस घटना से तुम क्या समझते हो कि तुम्हारी पत्नी का तुम्हारे प्रति सच्चा समर्पण है। नहीं! इस भ्रम में मत रहना। पति-पत्नी में एक दूसरे के प्रति पूर्ण समर्पण होता तो जीवन में संघर्ष ही क्यों होते?

समग्र समर्पण नहीं है इसीलिए तुम्हारे दाम्पत्य जीवन में, पारिवारिक जीवन में संघर्ष चल रहे हैं। श्रद्धा और समर्पण केवल धर्म के लिए ही उपयोगी नहीं है, वरन् सुखी सामाजिक जीवन व दाम्पत्य जीवन के लिए भी उपयोगी व अनिवार्य अंग है।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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