लाज सुधारे काज
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
लाज सुधारे काज
लज्जा मन का ऐसा सुन्दरतम भाव है जिससे बिगड़े हुए कार्य भी सुधर जाते हैं। लज्जा सुन्दरता और सद्गुणशीलता का किला है। लज्जा एक ऐसा संकेत है जिसे प्रकृति ने पतिव्रता के सम्मान और सभ्यता का माध्यम बना दिया है। इस धरती पर मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो लज्जित होता है या जिसे लज्जा से रहने की जरूरत है। जो आत्माभिमान से रहता हो और अपने सत्कार्यों से सारे शहर में सम्मानित माना जाता है, वह कभी लज्जा शून्य नहीं हो सकता।
लज्जा का आकर्षण सौन्दर्य के आकर्षण से अधिक होता है। लज्जा ने सदैव वीरों को परास्त किया है। जो काल से नहीं डरते वे भी लज्जा की शक्ति के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं करते।
एक सेठ के पास अपार धन-सम्पत्ति थी। उदारता, न्यायप्रियता और मृदुभाषिता जैसे अनेक गुणों के कारण नगर में उनकी बहुत इज्जत थी। जिस मार्ग से सेठ गुज़रते थे, उनके स्वागत में लोग हाथ जोड़कर सिर झुकाकर खड़े हो जाते थे। राजा के द्वारा उन्हें ‘‘नगर सेठ’’ की उपाधि प्रदान की गई। जब भी वे सेठानी के साथ चर्चा-वार्ता करते तब एक अभाव का बार-बार जिक्र किया करते थे। कुदरत ने हमें सब कुछ दिया किन्तु कुलदीपक की कमी रख दी। इस प्रचुर धन-सम्पदा का स्वामी कब हमारे घर में जन्म लेगा। सेठानी हमेशा सेठ को समझाती थी - धैर्य का फल मीठा होता है, इस काम में देर जरूर है पर अंधेर नहीं।
भगवान की कृपा से ढलती उम्र में सेठ के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। सुख-सुविधा और सम्पन्नता भरे वातावरण में पुत्र बड़ा होने लगा। प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करते हुए उसने यौवन की दहलीज पर कदम रखा। कहते हैं कि जो फल अधिक मीठा होता है उसे कीड़ा लगने की संभावना अधिक रहती है। यही बात सेठ के पुत्र के साथ हुई। साधनों की प्रचुरता और अधिक लाड़-प्यार के कारण पुत्र का जीवन अनेक कुव्यसनों का शिकार बन गया। मित्रों की कुसंगति के कारण वह शराब पीने लगा। साथियों के साथ मयखाने में जाकर हँसी-मजाक करना और उनके साथ बैठकर मदिरा पीना यह उसकी रोज की आदत बन गई। कोई भी ग़लत कार्य करते हुए आदमी यही सोचता है कि मैं इतना छिपकर करूँ ताकि किसी को या घर वालों को कुछ पता न लगे। जैसे आग और दुर्गन्ध को छिपाया नहीं जा सकता वैसे ही पाप भी छिपाने से नहीं छिपते।
गाँव के लोग सेठ के पुत्र को जब इस तरह मयखाने में जाते हुए देखते तो उनके भीतर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रिया होती। कुछ लोग सेठ को दोषी ठहराते तो कुछ पुत्र की कुसंगति की निन्दा करते थे। कुछ लोग कहते - नगर में सेठ की कितनी इज्जत है, पुरानी खानदानी प्रतिष्ठा भी है किन्तु पुत्र ने सारी धूल में मिला दी। कुछ लोग सेठ जी को आ कर कहते कि अब भी संभाल लो वर्ना लड़का हाथ से निकल जाएगा।
गाँव के लोगों से ऐसी बातें सुनकर सेठ को गहरा आघात पहुँचा। सिर पर हाथ रखकर सोचने लगे - कितने इन्तजार और चाहत के बाद एक पुत्र का घर में जन्म हुआ और वही मेरी इज्ज़त-आबरू पर यों पानी फेरने लगा। जैसे ही सेठानी को पता लगा, वह फूट-फूट कर रोने लगी और अपने भाग्य को कोसती हुई बोली - इससे तो हम निःसंतान ही रह जाते तो अच्छा था।
सेठ कुछ देर तक बड़े धैर्य के साथ आगे की सोच में डूब गए। पुत्र को रोकने के लिए मुझे क्या करना चाहिए। वे जानते थे कि पुत्र बड़ा हो जाए तो डांट-फटकार से उसे सुधारा नहीं जा सकता। डांटने-डपटने से वह अधिक बिगड़ भी सकता है। अचानक उनके दिमाग में अपने दादा जी द्वारा दी हुई एक सीख याद आई। उन्होंने सोचा कि यह संस्कारी और खानदानी परिवार में पला है। यदि इसकी आँखों में कुछ शर्म या लज्जा होगी तो यह अब भी सुधर सकता है।
कुछ दिन पुत्र का निरीक्षण करते हुए सेठ ने देखा कि उनका बेटा इस समय मित्रों के साथ शराब पीने मयखाने की ओर जा रहा है। वे भी चुपके से उसके पीछे-पीछे चल दिए। लड़का अपने साथियों के साथ हँसी-ठिठोली करता हुआ मयखाने में जाकर बैठ गया। जैसे ही मदिरा की प्याली हाथ में उठाकर उसने मुख पर लगाई तब तक सेठ जी भी वहाँ पहुँच गए। उसी क्षण आमने-सामने पिता पुत्र की नज़रें टकराई।
पुत्र ने अपने समक्ष पिता को देखा और उसकी आँखें शर्म से नीचे झुक गई और उसके हाथ से प्याली छूट गई। उसे इतनी लज्जा महसूस हुई कि उसने अपना चेहरा रूमाल से ढक लिया। यह देखकर सेठ जी चुपचाप पुत्र को बिना कुछ कहे वहाँ से लौट आए। उन्हें विश्वास हो गया कि इसकी आँखों में लज्जा है। अतः यह अपने आप सुधर जाएगा।
पिताजी के जाते ही पुत्र भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। बाहर की लज्जा ने उसके भीतर रहे हुए खानदानी संस्कारों को जगा दिया था। उसे यह सोचकर बड़ी शर्म महसूस हुई कि ‘‘नगर सेठ’’ कहलाने वाले मेरे पिताजी को मेरे कारण आज मयखाने में आना पड़ा। कुसंगति में फँसकर और गलत आदतों का शिकार होकर मैंने उनकी इज्जत मिट्टी में मिला दी। तत्काल उसके मन ने यह दृढ़ संकल्प कर लिया कि आज के बाद कभी भी इस द्वार पर कदम नहीं रखूँगा। वह घर जाकर माता-पिता के चरणों में गिर पड़ा और अपनी ग़लती के लिए माफ़ी माँगने लगा। सेठ और सेठानी ने पुत्र को गले लगाते हुए कहा - ‘‘बेटा, सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो भूला नहीं कहलाता।’’
उस समय सेठ ने अपने दादा जी द्वारा दी गई सीख को दोहराते हुए कहा -
‘‘लाज सुधारे काज’’
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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