देर है पर अंधेर नहीं

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

देर है पर अंधेर नहीं

प्रत्येक कार्य का फल देर-सवेर निश्चित रूप से प्राप्त होता है अतः कार्य के फल में न संदेह करना चाहिए, न अधीर होना चाहिए। विधेयात्मक चिन्तन आशा रूपी दीप के लिए तेल का कार्य करता है और नकारात्मक चिन्तन हवा बनकर आशा के दीप को बुझा देता है। प्रकृति, समय और धैर्य; ये तीन ऐसे डॉक्टर हैं जो मन को सतत् निर्विकार बनाकर साधना में स्थिर कर देते हैं। कार्य की संपन्नता या सफलता शक्ति की नहीं उत्साह की अपेक्षा रखती है। आस्थावान मन ही उत्साहित रह सकता है।

मनुष्य अपने आनन्द का निर्माता स्वयं है। अतः इस प्रकार जीना चाहिए ताकि हम अपनी जिन्दगी को देखकर प्रसन्न हो सकें।

एक पौराणिक लोकप्रिय कथा है। कहते हैं कि इस धरती पर जब-जब भी कुछ अच्छा या बुरा होता है तो उसकी चर्चा स्वर्ग में अवश्य होती है। धरती के लोगों के समाचार स्वर्ग तक पहुँचाना और देवताओं के संदेश मनुष्यों को देना, इस कार्य में नारद जी का नाम प्रसिद्ध था। ‘‘नारायण-नारायण’’ कहकर हर स्थान, हर घर में प्रवेश पा लेना नारद मुनि की खासियत थी। एक बार नारद जी स्वर्गलोक से उतरकर धरती पर आ रहे थे। मार्ग में उन्होंने एक सघन जंगल में किसी वृक्ष के नीचे एक वृद्ध संन्यासी को ध्यान मग्न देखा। 

वहाँ से थोड़ी दूर पर आगे पहुँचे तो एक वटवृक्ष के नीचे एक युवा संन्यासी को आँखें मूँदकर भगवत् भक्ति में तन्मय देखा। दोनों संन्यासियों की साधना की मन ही मन प्रशंसा करते हुए नारद जी ने श्रद्धापूर्वक उन्हें नमस्कार किया और स्वर्गलोक में विष्णु जी के दरबार में पहुँच गए। नारद जी को इतनी शीघ्रता से आते हुए देखकर विष्णु जी ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा - ‘‘कहो नारद जी! पृथ्वी की कौन सी अनोखी खबर सुनाने आए हो।’’

‘नारायण-नारायण’ कहते हुए नारद जी बोले - ‘‘प्रभु! दो संन्यासियों के दर्शन करके आ रहा हूँ। वे प्रभु भक्ति में इतने मग्न हैं कि लगता है जल्दी ही उनकी साधना से उन्हें बैकुण्ठ मिलने वाला है।’’ विष्णु जी ने कहा - ‘‘नारद जी! यदि तुम उनकी साधना से इतने प्रसन्न हो तो हम भी उन्हें एक मनवांछित वरदान देना चाहते हैं। आप धरती पर जाकर उन दोनों से उनके मन की इच्छा पूछ लेना।’’

प्रभु से वरदान पाकर नारद जी फौरन उस जंगल में पहुँच गए जहाँ वे दोनों संन्यासी प्रभु भक्ति में मग्न थे। नारद जी ने उन दोनों को नमस्कार करके कहा - ‘‘भगवान विष्णु जी आपकी साधना से बहुत प्रसन्न हैं और उन्होंने फरमाया है कि आप उनसे क्या चाहते हैं, यह पूछ कर आना।’’

नारद जी ने पहले वृद्ध संन्यासी से पूछा - ‘‘बताइये, आप विष्णु जी से क्या चाहते हैं?’’ वृद्ध संन्यासी ने कहा - ‘‘मुझे इस संसार की कोई कामना नहीं है। भगवान से पूछकर सिर्फ़ इतना बता देना कि मेरी साधना पूरी होने में और कितनी देर है? क्योंकि मैं तीस जन्मों से निरंतर साधना कर रहा हूँ।’’

इसके बाद ‘नारायण-नारायण’ करते हुए नारद जी युवा संन्यासी के पास पहुँच गए और भगवान विष्णु जी के वरदान की बात बताई। संन्यासी ने मुस्कुराते हुए प्रसन्न मुख से कहा - ‘‘भगवान की मुझ पर अपार कृपा है। उनसे मात्र इतना पूछ लेना कि मुझे उनके चरणों के साक्षात् दर्शन कब होंगे?’’

दोनों के प्रश्न लेकर नारद जी विष्णु जी के दरबार में पहुँच गए और उनसे समाधान लेकर पृथ्वी पर उतर आए। सबसे पहले वे वृद्ध संन्यासी के पास जाकर बोले - ‘‘भगवान कहते हैं कि आप जिस वृक्ष के नीचे बैठकर साधना कर रहे हैं, उस वृक्ष के जितने पत्ते हैं, उतने ही जन्म तुम्हें लगेंगे, तब तुम्हारी साधना पूर्ण होगी।’’

यह सुनकर वह वृद्ध संन्यासी बहुत नाराज हो गया। क्रोध के आवेश में उसने अपना कमण्डल जमीन पर धड़ाम से पटका, पोथी एक तरफ फेंक दी, माला तोड़ डाली और ज़ोर से चिल्लाया - ‘‘भगवान ने भी अन्याय की हद पार कर दी। प्रभु भक्ति करते हुए तीस जन्म हो गए फिर भी कह रहे है, अभी इतने जन्म बाकी हैं जितने पेड़ के पत्ते?’’

नारद जी संन्यासी का विकराल रूप देखकर घबरा गए और वहाँ से सीधे दूसरे संन्यासी के पास आकर बोले - ‘‘भगवान ने आपके लिए संदेशा भेजा है। जिस पेड़ के नीचे तुम साधना कर रहे हो उस पेड़ के जितने पत्ते हैं उतने ही जन्म तुम्हें उनके चरणों के साक्षात् दर्शन करने में लगेंगे।’’

यह सुनकर युवा संन्यासी खुशी में झूमकर कहने लगा - ‘‘हे प्रभो! जितनी मेरी पात्रता नहीं है, उतनी बड़ी खुशी और कृपा आपने मुझ पर की है। यदि धरती के सारे वृक्षों की गिनती की जाए तो उनके पत्तों की संख्या अनगिनत होगी। मेरी साधना के अब इतने ही जन्म शेष हैं जितने पत्ते इस एक वृक्ष पर हैं। यह तो समुद्र जितने मेरे कर्म के सामने मात्र बूँद भर साधना शेष रह गई है।’’ आनन्दित होते हए बड़े आत्मविश्वास के साथ उसने भगवान को बार-बार धन्यवाद दिया और पूर्ण उत्साह के साथ साधना में जुट गया।

नारद जी यह देखकर बहुत प्रभावित हुए और वृद्ध संन्यासी के पास आकर बोले - “महात्मा जी। थोड़ा धैर्य रखिए और अपने मन को आशावादी बनाने के लिए विधेयात्मक चिन्तन कीजिए। विश्वास के साथ इस विचार को दृढ़ कीजिए कि मेरी साधना में ‘‘देर है अंधेर नहीं’’।”

यह सुनकर वृद्ध संन्यासी धैर्य के साथ अपनी साधना में पुनः स्थिर हो गए।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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