शिक्षण-केन्द्र ज्ञान का मंदिर है
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
शिक्षण-केन्द्र ज्ञान का मंदिर है
महानुभावों! शिक्षण केन्द्र ज्ञान का मंदिर है। वहाँ ज्ञान की देवी सरस्वती की उपासना की जाती है। गुरु हमें देवी-देवताओं से जोड़ने वाली अद्भुत शृंखला (कड़ी) है। हमें हज़ारों पुस्तकें पढ़ने से भी उतना ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता, जितना एक शिक्षक के व्यावहारिक जीवन को देखकर हो जाता है। अतएव गुरु और ज्ञान की देवी सरस्वती की उपासना का फल प्राप्त करने के लिए विनय भाव होना एक आवश्यक तत्व है जिससे जीवन में नैतिकता के साथ-साथ आध्यात्मिक क्षेत्र में भी उन्नति होने लगती है।
मुनि श्री ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में केवल पुस्तकीय ज्ञान को महत्व न देकर व्यावहारिक पक्ष को सुदृढ़ करने के लिए स्थान देना भी आवश्यक है। शिक्षा की योजना जीवन के उच्च आदर्शों से परिपूर्ण और भारतीय संस्कृति के अनुकूल होनी चाहिए। शुद्धाचरण, आत्म-गौरव, स्वावलम्बन व कर्त्तव्यपरायणता का विवेक जागृत होना चाहिए। इन्हीं गुणों पर भारत का उज्ज्वल भविष्य एवं निर्मल राष्ट्र का उदय निर्भर है। सच तो यह है कि जब तक मनुष्य को पुस्तकीय शिक्षा के साथ-साथ मनुष्यता की शिक्षा नहीं दी जाती, तब तक लौकिक शिक्षा का कोई महत्व नहीं है।
वह शिक्षा किस काम की जो मनुष्य को अपने स्वार्थ के घेरे से बाहर न निकलने दे और तत्वज्ञान से वंचित रह कर अंधों की संख्या बढ़ती जाए। यह माना कि लौकिक शिक्षा जीवन की मूलभूत आवश्यकता है पर वास्तव में शिक्षा तभी सफल मानी जा सकती है जब वह मनुष्य को मनुष्यता की ऊँचाई तक ले जाए।
आगे मुनि श्री ने कहा कि आज के शिक्षण केन्द्र अक्षर ज्ञान तो दे सकते हैं पर संस्कार देने में असमर्थ हैं, पंगु हैं। अनुशासनहीन शिक्षा व्यर्थ है। उसी शिक्षा को सफल माना जा सकता है जो व्यसनों से बचाए और सामाजिक मूल्यों व राष्ट्रीय सम्पदा की रक्षा का कारण बने। यदि शिक्षा का प्रभाव इसके विपरीत है तो वह शिक्षा नहीं शिक्षा के नाम पर मज़ाक है। वह शिक्षा कहलाने के योग्य नहीं जो मनुष्य के विचारों में बदलाव न ला सके, उसके चरित्र का निर्माण न कर सके।
आगे मुनि श्री ने वर्तमान शिक्षा-पद्धति पर चर्चा करते हुए कहा कि यद्यपि लौकिक शिक्षा के सभी क्षेत्रों में दक्षता बढ़ रही है, वह अपने उद्देश्य में पूर्णतया सफल हो रही है तथापि चरित्र-निर्माण एवं सुदृढ़ नैतिक जीवन के उत्थान से उसका कोई सरोकार दिखाई नहीं देता। शिक्षा तो उच्च कोटि की है पर शिक्षा प्रणाली को पक्षाघात हो गया है।
वर्तमान शिक्षा-प्रणाली का दोषी शिक्षक नहीं है क्योंकि वह तो तंत्राधीन है, शासन तंत्र के द्वारा शासित किया जाता है। यदि वह अपने कर्त्तव्य को पूरा करने में असमर्थ है या पुरुषार्थ के द्वारा किसी के चरित्र का निर्माण करने में सक्षम नहीं है तो यह उसके वश में नहीं है क्योंकि वह एक ऐसी जंजीर में जकड़ा हुआ है जो दूसरों के द्वारा प्रशासित है।
इसी कारण वह न अपना विकास कर सकता है और न स्वतंत्रता से सोच सकता है। उसके सामने अनेक समस्याएं हैं जिनके कारण वह विद्यार्थी को पूरी स्वतंत्रता से नहीं पढ़ा सकता। स्वतंत्र विचारों के विकास के अभाव में ही यह स्थिति निर्मित हुई है। जब शिक्षक स्वयं ही उन्मुक्त होकर नहीं सोच सकता तो वह दूसरों को क्या सिखा सकता है? इसलिए शिक्षण केन्द्रों को ज्ञान का मंदिर बनाकर उसकी पवित्रता की रक्षा करनी चाहिए।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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