अच्छे बुरे कर्म ही इंसान को रुलाते हैं
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
अच्छे बुरे कर्म ही इंसान को रुलाते हैं
महानुभावों! हम सब सुख चाहते हैं, अपना कल्याण चाहते हैं। लेकिन जब तक अंदर से राग-द्वेष की प्रवृत्ति का त्याग नहीं करेंगे तब तक कल्याण नहीं हो सकता। परस्पर सद्भाव और प्रेम के बिना न तो हम स्वयं सुखी हो सकते हैं और न ही समाज व राष्ट्र की उन्नति हो सकती है।
मुनि श्री कहते हैं कि आज समाज में पैदा हुए मतभेदों ने आदमी में आपस में भाईचारे व प्रेम की भावना को भी कम कर दिया है। प्रेम भाव तो मानवता का पहला गुण है जो अन्य किसी योनि में नहीं पाया जाता। इसके बिना मानव जीवन व्यर्थ है। यदि समाज में एकता नहीं होगी तो वह उन्नति नहीं कर सकता।
मुनि श्री ने कौरवों और पांडवों का दृष्टांत सुनाते हुए कहा कि हम जैसे कार्य करेंगे उनका वैसा ही फल अपने साथ लेकर जाएंगे। ये हीरा-मोती, सोना-चांदी, धन-दौलत हमारे साथ जाने वाले नहीं हैं। इसलिए हमें प्रयत्नपूर्वक सदैव नेक रास्ते पर चल कर अपना जन्म सफल बनाना चाहिए।
हम सभी सुख तो चाहते हैं पर कार्य दुःख पाने वाले ही करते हैं। क्या इससे कभी सुख मिलेगा? जब भी हम पर विपत्ति आती है तो हम कहते हैं कि हे भगवान! यह तूने क्या किया? पर वीतरागी भगवान न तो किसी को सुख देते हैं और न ही किसी को दुःख देते हैं। वे तो दयालु हैं, सब पर अपनी करुणा बरसाते हैं।
हमें रुलाने वाले हमारे अच्छे-बुरे कर्म ही हैं। कुछ पिछले जन्मों में संचित किए हुए पाप हैं और शेष जो हम अभी तक इकट्ठे किए जा रहे हैं। जब हम बुरे कर्म करते हैं तो हमें आनन्द आता है और फिर उनका फल हमें नरकों में रो-रो कर भोगना पड़ता है। नरक में एक क्षण में हज़ारों बिच्छुओं के काटने के समान पीड़ा होती है।
अज्ञान व पाप का फल तो नरक है ही, कभी-कभी राजा श्रेणिक जैसे ज्ञानी भी बड़ी ग़लतियों के कारण स्वयं को नरक जाने से नहीं बचा पाते। बस! अन्तर केवल इतना ही है कि वे अपने ज्ञान का आश्रय लेकर शांत भाव से कर्म-फल को भोगते हैं और पुनः उत्तम गति में जन्म ले कर अपना कल्याण कर लेते हैं।
राम के पिता राजा दशरथ का उदाहरण देते हुए मुनि श्री कहते हैं कि दशरथ जैसे महापुरुषों को भी श्रवण कुमार के माता-पिता का उनके पुत्र से वियोग कराने के परिणामस्वरूप पुत्र-वियोग सहन करना पड़ा था। अपनी करनी का फल सबको भुगतना पड़ता है। कर्मों की मार से कोई नहीं बच सकता। बचना है तो बुरे कर्म करने से बचो।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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