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तपस्या और साधना का उत्कृष्ट फल है - समता भाव

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज तपस्या और साधना का उत्कृष्ट फल है - समता भाव तपस्या का अर्थ है - जब शरीर और आत्मा के भेद विज्ञान का दृढ़ निश्चय हो जाए तो आत्मा को शरीर की कैद से आज़ाद करने के लिए शरीर को तपाना।   जैसे दूध को तपाने के लिए पहले पतीले को तपाया जाता है वैसे ही आत्मा को कर्म-बन्धन से मुक्त करने के लिए शरीर को तपाया जाता है। अपनी इन्द्रियों को साध लेना ही साधना कहलाती है। एक होता है - उपसर्ग और एक होता है - परिषह। उपसर्ग एक प्राकृतिक आपदा है जैसे बाढ़ आ जाना या भूकम्प आ जाना। ऐसी विपत्ति का सामना तो हमें करना ही पड़ता है लेकिन परिषह सहन करना तो साधु के मूल गुणों में से एक है। एक साधु साधना के बल पर ही परिषह सहन करता है। जैसे कल आपने देखा कि केश लोच मैं कर रहा था और पीड़ा का भाव आप लोगों के मुख पर झलक रहा था। क्या आपने मेरे मुख पर कोई पीड़ा का भाव देखा ? अरे! हम तो उस समय अपनी आत्मा का चिंतन कर रहे थे कि उसे कैसे इस देह से मुक्त करके सिद्धालय में विराजमान करें ? जब तक साधु समता भाव को ग्रहण नहीं करता तब तक उसकी साधना सफल नहीं हो सकती। एक नवयुवक के सामने अपने भविष्य को बना...

त्रिलोकीनाथ

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज त्रिलोकीनाथ क्या आप त्रिलोकीनाथ बनना चाहते हैं ?   त्रिलोकीनाथ कहते हैं तीनों लोकों के स्वामी को। जिसे लोग मन से अपना सच्चा हितैषी मानते हैं, वही तीनों लोकों का नाथ बन सकता है। शासक केवल शासन कर सकता है लोगों के तन और धन पर। उसे मन से कोई अपना स्वामी नहीं मानता। लेकिन नाथ केवल लोगों के मन में अपना स्थान बनाता है जिसके लिए वे अपना तन और धन स्वयं ही न्योछावर कर देते हैं।  वास्तव में हर आदमी सारी दुनिया पर राज करना चाहता है। अब यह उसकी किस्मत है कि वह कितना राज कर पाता है। कोई व्यक्ति अपने घर पर भी हुकुमत नहीं कर सकता और किसी की हुकुमत अपने सारे खानदान पर चलती है। सत्ता का लाभ मिलना अपने-अपने पुण्य का परिणाम है।  पाप करने के लिए सत्य से परिचित होना आवश्यक नहीं है पर पुण्य करने और उसके फल को छोड़ने के लिए हमें सत्य की गहराइयों की अनुभूति होना अति आवश्यक है। इसके लिए परमात्मा के चरणों का आश्रय लेना होगा। परमात्मा के दिव्य ज्ञान का प्रकाश ही हमारी ज्ञान-ज्योति को प्रकाशित कर सकता है, हमारे हृदय में ज्ञान का दीपक जला सकता है। संसार की चारों गतियों...

मृत्यु को महोत्सव बनाओ

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज मृत्यु को महोत्सव बनाओ अरे भाई! पुण्य है तो पाप है, सुख है तो दुःख है, जन्म है तो मृत्यु है। यह तो एक सिद्धांत है कि जो आया है वह जाएगा भी। चाहे वह रंक हो या राजा, ग़रीब हो या अमीर, करोड़पति हो या रोड़पति, लखपति हो या खाकपति, अरबपति हो या खरबपति, अमरचंद हो या ज्ञानचंद, नेमचंद हो या हेमचंद, धर्मचंद हो या कर्मचंद। सबको उसकी अदालत में पेश होना ही होगा और जब पेश होना ही है तो फिर कायरता क्यों ? हम कायरता से नहीं बल्कि वीरता पूर्वक मरण करेंगे। वीरता पूर्वक तो एक दिन का जीवन भी जीना कहलाता है और कायरता पूर्वक 100 दिन का जीवन भी मरने के समान है। हर व्यक्ति मृत्यु से भयभीत है, मृत्यु से डरता है, मृत्यु के आने पर काँपने लगता है, दौड़ लगा कर उससे बचने के लिए आगे-आगे भागने लगता है। मृत्यु से भय करोगे तो मृत्यु से अभय नहीं हो पाओगे।  रवीन्द्रनाथ टैगोर ने एक कथा लिखी।  कथा बहुत ही रोचक है। एक व्यक्ति लकड़हारा था। रोज़ जंगल में जाता, लकड़ी काटता और अपनी आजीविका चलाता था। रोज़ मृत्यु को पुकारा करता था किंतु जब वह आई तो उससे दूर भागने लगा। मैं अक्सर यही कहा क...

समय से समयसार पाओ

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज समय से समयसार पाओ जीवन में समय देंगे तो समयसार मिलेगा। समयसार अर्थात् आत्मा का सार प्राप्त करना है और परमात्म-पद प्राप्त करना है तो सबसे पहले हमें संत-समागम करना होगा। संत के द्वार पर जाकर, उनके चरणों के निकट बैठ कर ही हम आत्मा का सार पा सकते हैं। जैसे किसी रोग का उपचार करने के लिए हम चिकित्सक के पास जाते हैं, कानून को जानने के लिए Law College के Professor के पास जाते हैं, उसी प्रकार अपने जीवन को सुधारने के लिए, आचरण को संभालने के लिए, विचारों में पवित्रता लाने के लिए, तिर्यंच से तीर्थंकर बनने के लिए, इंसान से भगवान बनने के लिए हमें संतों का समागम करना होगा। संत हमें उसी मोक्ष-मार्ग पर चलने का उपदेश देते हैं जिस पर वे स्वयं चल रहे है। अतः केवल उपदेश सुनने से हम मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकते। हमें उनके उपदेशों का अक्षरशः पालन करने से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है। उपदेश सुनने वाले तीन प्रकार के श्रोता होते हैं - श्रोता, सरोता और सोता। असली श्रोता वे होते हैं, जो संत के उपदेश को ध्यान से सुनते हैं, चिंतन, मनन और मंथन करते हैं।  सरोता ध्यान से सुनते ह...

अध्ययन, परीक्षा और परीक्षा-परिणाम

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज अध्ययन, परीक्षा और परीक्षा-परिणाम यदि हम शाश्वत सुख चाहते हैं तो हमारा अध्ययन भी उसी स्तर का होना चाहिए। अब तक हम पर का चिंतन करते रहे और भौतिक सुखों में ही सुख की खोज करते रहे। अब हम स्व का चिंतन करेंगे और शाश्वत सुख को प्राप्त करेंगे। एक होता है - पहले सुख, बाद में दुःख। वह है - पंच इन्द्रियों के विषय-भोग का सुख। दूसरा है - पहले दुःख, बाद में सुख। वह है - पंच इन्द्रियों के विषय भोग के त्याग का सुख। तीसरा है - पहले भी सुख, बाद में भी सुख। वह है - धर्म की राह पर चल कर निज और पर के ज्ञान का सुख। केवल निज आत्मा का ज्ञान होने से ही अध्ययन की पूर्णता नहीं हो जाती, उसकी परीक्षा में जो सफल होता है वही सच्चा ज्ञानी कहलाता है। कोई मजबूरी वश परीक्षा में असफल हो जाए तो क्या तुम उसे सफल मान लोगे ? नहीं न! परीक्षा में मजबूरी नहीं मजबूती देखी जाती है। कितने घंटे मिलते हैं परीक्षा में ? तीन! हाँ, तुमने तीन घंटे में ही परीक्षा पास करने के लिए स्वयं की योग्यता सिद्ध करनी है। पहला घंटा मिला बचपन का। अरे! अभी तो खेल का मजा लेने दो। दो घंटे बाकी हैं, बहुत समय पड़ा है धर्...

ऊँचा उठना है तो नीचे वाले को देखो

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज ऊँचा उठना है तो नीचे वाले को देखो हर व्यक्ति अपने जीवन को पावन और पुनीत बनाना चाहता है। उसके लिए सबसे पहला कदम है - अपने आचरण और अपने सोचने-विचारने के ढंग को बदलना। हम आज भी पुराने, रूढ़ियों से चलते आ रहे आचरण को अपनाए हुए हैं। उसी के अनुसार सोचते हैं और उसी के अनुसार सबके साथ व्यवहार करते हैं। यदि हम स्वयं को ऊँचाइयों पर पहुँचाना चाहते हैं तो संकीर्ण मानसिकता को छोड़कर आत्म-हित का चिंतन करना चाहिए। हमें दूसरे के सुख को देखकर दुःखी नहीं होना है अपितु दूसरे के दुःख को सुख मे परिवर्तित करने का प्रयत्न करना है। यदि हमारे भीतर संवेदना का भाव प्रगट हो जाए तो हम कभी दुःखी नहीं हो सकते। अपनी विचारधारा को बदलो। यदि हमारा पड़ोसी सुखी है तो हमें आनन्द का अनुभव होना चाहिए न कि ईर्ष्या का। प्रत्येक व्यक्ति अपने पुण्य से सुख भोग रहा है और पाप के परिणाम से दुःख पा रहा है।  यदि आप सुख पाना चाहते हैं तो अपने पुण्य को बढ़ाने में लग जाओ ताकि स्वयं भी सुखी रह सको और अपने से निचले स्तर का जीवन जीने वालों को भी धर्म के मार्ग पर चला सको। ये पुण्य-कार्य, पूजा-पाठ तुम्हें इ...

दो बातें जो सदा याद रखें

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज दो बातें जो सदा याद रखें वे दो बातें कौन सी हैं जो तुम्हें सदा याद रखनी चाहिएं। वे हैं - मौत और अपने जीवन का लक्ष्य। हमारे जीवन का लक्ष्य यह नहीं है कि जन्म लिया, कमाया-खाया, धन का उपभोग किया और यमराज का बुलावा आया तो उठ कर चल दिए।  संत विरंजन सागर केवल जीने की कला ही नहीं सिखाते बल्कि मरने की तरकीब भी बताते हैं। सल्लेखना समाधि पूर्वक मरना ही वास्तविक रूप से जीवन को सफल बनाता है। संत तभी तो संत बन पाते हैं क्योंकि वे एक क्षण के लिए भी मृत्यु का विस्मरण नहीं करते। उन्हें मालूम है कि धन-वैभव तो संसार में ही मिला था और यहीं छोड़ कर जाना है।  तो साथ क्या जाएगा ? बस! उसी के चिंतन में, धर्म ध्यान में ही लीन रहते हैं और अपने जीवन को अर्थ प्रदान करते हैं। अरे! जन्म का समय तो शायद फिर भी मालूम हो जाए पर क्या मरण का समय निश्चित है ? यमराज तो किसी भी समय तुम्हारे दरवाज़े पर दस्तक दे सकता है। यह तो निश्चित है न! कि जिसने जन्म लिया है उसका मरण तो अवश्य होगा। एक सेठ ने यमराज से दोस्ती कर ली कि तुम आने से पहले मुझे सूचित कर देना और निश्चिन्त हो कर भोगोपभोग म...

कर्म और कर्म-फल

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज कर्म और कर्म-फल आप पूछते हैं कि महाराज, मैंने तो किसी को दुख नहीं पहुँचाया फिर मुझे यह दुख क्यों झेलना पड़ रहा है ?   अरे भाई! यह कर्म सिद्धांत है। हमारे द्वारा कृत, कारित व अनुमोदित किए गए सभी कार्यों का फल अपने समय के अनुसार ही मिलता है। जैसे आज खेत में बीज डालने से आज ही वह वृक्ष नहीं बन जाएगा और उससे फल प्राप्त नहीं होने लगेगा। कुछ कर्मों का तत्काल फल मिलता है और कुछ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के संयोग से अपने समय पर परिपक्व होते हैं। ‘गीता’ में श्रीकृष्ण ने भी यही कहा है कि कर्म करो, फल की इच्छा न करो। जैसा कर्म करोगे, फल भी वैसा ही मिल जाएगा। सती सीता का पालन-पोषण राजमहल में हुआ और राजघराने में ही उसका विवाह हुआ पर कर्मफल के प्रभाव से विवाह के बाद उसे 14 वर्ष तक वनों में भटकना पड़ा। वन में भी उसका कोई दोष न होते हुए भी रावण की अशोक-वाटिका में कैद में रहना पड़ा। जैसे-तैसे रामचंद्र जी ने उसे वहाँ से छुड़ाया तो भी उसके असाता कर्म का उदय आया और उसे अग्नि परीक्षा देनी पड़ी।  फिर उसने सोचा कि अब तो मैं अयोध्या में राजमहल का सुख भोगूँगी पर वहाँ ...

जीवन में संत रूपी जीवन जीएं

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज जीवन में संत रूपी जीवन जीएं साधक का अर्थ है - साधना करने वाला अर्थात् जिसने अपनी इन्द्रियों व मन को साध लिया है, वह साधक है। इसी साधना से उसमें इतनी सहिष्णुता आ जाती है कि वह समता भाव से हर उपसर्ग व परिषह पर सहज भाव से विजय प्राप्त कर लेता है। कष्ट भी उन्हीं को मिलते हैं जो श्रम करते हैं। अकर्मण्य व्यक्ति कोई श्रम ही नहीं करता तो उसे यह मालूम ही नहीं कि कष्ट किसे कहते हैं और उसे कैसे सहन किया जाता है ? क्या अकर्मण्य व्यक्ति कर्मों की निर्जरा कर पाएगा ? कर्म संचित करते रहना और उनकी निर्जरा न कर पाना ही संसार वृद्धि का कारण है। संत अपने जीवन में कष्ट आने पर अपना मानसिक संतुलन बनाए रखते हैं और सहिष्णुता के कारण उन्हें किए गए श्रम का आभास भी नहीं होता। ‘श्रेयांसि बहुविघ्नानि।’ वास्तव में अच्छे कार्यों में विघ्न-बाधाएं भी अधिक आती हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि हमने अच्छे कार्य किए तो उनके परिणामस्वरूप विघ्न-बाधाएं आई। सही बात तो यह है कि कुछ कालावधि के पश्चात् जो कर्म तीव्र रूप लेकर हमें अधिक समय तक कष्ट पहुँचाने वाले थे, वे कर्म अच्छे कार्य के फलस्वरूप समय ...

भावनाः संसार-वृद्धि का कारण

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज भावनाः संसार-वृद्धि का कारण हमारे जीवन की कहानी विसंगतियों से भरी हुई है जो हमारे चारों ओर तनावपूर्ण वातावरण के निर्माण का कारण बनती है। हम ऐसे वातावरण में अपना जीवन व्यतीत करने के लिए विवश हो गए हैं लेकिन जीवन में समस्याओं से पूर्णतया मुक्त होना भी सम्भव नहीं है। हमें इन सारी समस्याओं के बीच में रहकर ही आनन्द की अनुभूति और शान्ति की प्राप्ति करने के लिए प्रशस्त जीवनयापन की साधना करनी होगी। हमारी गौरवशाली भारतीय संस्कृति का इतिहास शांति प्रदान करने वाली नाना प्रकार की सूक्तियों और नीति वाक्यों से भरा हुआ है। ये सूत्र वाक्य केवल सुनने के लिए नहीं हैं अपितु हमें उन आदर्शों पर चलने की प्रेरणा देते हैं ताकि हमारा जीवन भी तनावमुक्त हो सके। महापुरुषों ने स्वयं अपने अनुभव से हमें इन नीतियों का ज्ञान दिया और अपने आचरण से हमारे समक्ष आदर्श स्थापित किया है। उन्होंने अपने जीवन का भी उत्कर्ष किया है और हमें भी पग-पग पर ऐसे सदाचरण के लिए प्रेरित करते हैं। वास्तव में जीवन का निर्माण करना हमारे ही हाथ में है। एक मकड़ी पतले-पतले तन्तुओं से अपने लिए ऐसा महल तैयार करती है...

सच्चे भक्त की पहचान विभक्त के समय होती है

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज   सच्चे भक्त की पहचान विभक्त के समय होती है श्रद्धा के बिना भक्ति नहीं और भक्ति के बिना मुक्ति नहीं। एक सामान्य सा काम भी श्रद्धा और विश्वास के बिना नहीं हो सकता चाहे वह व्यापार हो, गृहस्थी चलाने का काम हो, बस में सफर करना हो या मोक्ष मार्ग पर चलना हो।  चाहे किसी बंधन में ही क्यों न बंधना हो, विश्वास के बल पर ही हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। चाहे वह विवाह का बंधन हो या मुक्ति प्राप्त करने के लिए दीक्षा का। ऐसा ही उदाहरण महाराज चन्द्रगुप्त ने प्रस्तुत किया जब वे आचार्य भद्रबाहु के शिष्य बने। कहा जाता है कि - पानी पीओ छान कर और गुरु बनाओ जान कर। महाराज चन्द्रगुप्त ने आचार्य भद्रबाहु को अपना गुरु स्वीकार किया। उन के प्रति सम्पूर्ण श्रद्धा से समर्पित हो गए और अपना कल्याण कर लिया। एक बार आचार्य भद्रबाहु अपने 24000 शिष्यों के साथ उत्तर भारत में विहार कर रहे थे तो चलते-चलते वे एक गांव में पहुँचे। वहां एक सूखे वृक्ष पर एक कौआ बैठा हुआ था और काँव-काँव कर रहा था। शिष्यों को कुछ अजीब सा लगा तो उन्होंने अपने गुरु से इस का कारण पूछा। गुरु ने अपने ...