कर्म और कर्म-फल
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
कर्म और कर्म-फल
आप पूछते हैं कि महाराज, मैंने तो किसी को दुख नहीं पहुँचाया फिर मुझे यह दुख क्यों झेलना पड़ रहा है?
अरे भाई! यह कर्म सिद्धांत है। हमारे द्वारा कृत, कारित व अनुमोदित किए गए सभी कार्यों का फल अपने समय के अनुसार ही मिलता है। जैसे आज खेत में बीज डालने से आज ही वह वृक्ष नहीं बन जाएगा और उससे फल प्राप्त नहीं होने लगेगा। कुछ कर्मों का तत्काल फल मिलता है और कुछ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के संयोग से अपने समय पर परिपक्व होते हैं।
‘गीता’ में श्रीकृष्ण ने भी यही कहा है कि कर्म करो, फल की इच्छा न करो। जैसा कर्म करोगे, फल भी वैसा ही मिल जाएगा। सती सीता का पालन-पोषण राजमहल में हुआ और राजघराने में ही उसका विवाह हुआ पर कर्मफल के प्रभाव से विवाह के बाद उसे 14 वर्ष तक वनों में भटकना पड़ा।
वन में भी उसका कोई दोष न होते हुए भी रावण की अशोक-वाटिका में कैद में रहना पड़ा। जैसे-तैसे रामचंद्र जी ने उसे वहाँ से छुड़ाया तो भी उसके असाता कर्म का उदय आया और उसे अग्नि परीक्षा देनी पड़ी।
फिर उसने सोचा कि अब तो मैं अयोध्या में राजमहल का सुख भोगूँगी पर वहाँ से भी एक धोबी के कहने पर उसे देश निकाला मिल गया। कृतान्त के साथ चारों धाम की यात्रा के बहाने जंगल में छुड़वा दिया गया। लेकिन सती सीता ने अंत तक अपने धर्म को नहीं छोड़ा।
कृतान्त के हाथ अपने पति श्री राम को यही संदेशा भिजवाया कि जैसे आपने लोगों के कहने पर मुझे छोड़ दिया है, वैसे किसी के कहने पर अपने धर्म को न छोड़ देना।
हवा जब तेज चलती है तो पत्ते टूट जाते हैं,
मुसीबत के दिनों में अच्छे-अच्छे छूट जाते हैं।
वन में ऋषि के आश्रम में आश्रय मिला और लव-कुश का जन्म हुआ पर सीता ने अपने जीवन काल में कभी सुख के क्षण नहीं देखे। हमें सदैव यह याद रखना चाहिए कि साता और असाता जीवन की गाड़ी को चलाने वाले दो पहिए हैं। कभी एक पहिया ऊपर होता है और कभी दूसरा। सब दिन एक समान नहीं होते। गुरु व भगवान को ही अपना मित्र बनाओ। उन्हें दुख में याद करते हो तो सुख में भी याद रखो। वे ही तुम्हें इंसान से भगवान बना सकते हैं।
गुरु की सेवा से तुम्हारे जीवन में साता आ सकती है।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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