सच्चे भक्त की पहचान विभक्त के समय होती है

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

 सच्चे भक्त की पहचान विभक्त के समय होती है

श्रद्धा के बिना भक्ति नहीं और भक्ति के बिना मुक्ति नहीं। एक सामान्य सा काम भी श्रद्धा और विश्वास के बिना नहीं हो सकता चाहे वह व्यापार हो, गृहस्थी चलाने का काम हो, बस में सफर करना हो या मोक्ष मार्ग पर चलना हो। 

चाहे किसी बंधन में ही क्यों न बंधना हो, विश्वास के बल पर ही हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। चाहे वह विवाह का बंधन हो या मुक्ति प्राप्त करने के लिए दीक्षा का।

ऐसा ही उदाहरण महाराज चन्द्रगुप्त ने प्रस्तुत किया जब वे आचार्य भद्रबाहु के शिष्य बने। कहा जाता है कि -

पानी पीओ छान कर और गुरु बनाओ जान कर।

महाराज चन्द्रगुप्त ने आचार्य भद्रबाहु को अपना गुरु स्वीकार किया। उन के प्रति सम्पूर्ण श्रद्धा से समर्पित हो गए और अपना कल्याण कर लिया।

एक बार आचार्य भद्रबाहु अपने 24000 शिष्यों के साथ उत्तर भारत में विहार कर रहे थे तो चलते-चलते वे एक गांव में पहुँचे। वहां एक सूखे वृक्ष पर एक कौआ बैठा हुआ था और काँव-काँव कर रहा था। शिष्यों को कुछ अजीब सा लगा तो उन्होंने अपने गुरु से इस का कारण पूछा। गुरु ने अपने निमित्त ज्ञान से बताया कि इस काँव-काँव का अर्थ है - जाओ-जाओ। यहाँ अकाल पड़ने वाला है।

आचार्य भद्रबाहु ने अपने शिष्यों के साथ दक्षिण की ओर विहार करना प्रारम्भ कर दिया। पर कुछ शिष्यों ने सहमत न होने के कारण या आलस्य के कारण उनका साथ नहीं दिया और अकाल का कष्ट सहन न कर पाने के कारण उन्होंने वस्त्र धारण कर लिए और अपनी सुरक्षा के लिए हाथ में लाठी भी रखना आरम्भ कर दिया। तभी से जैन सम्प्रदाय में अन्य पंथ बनने आरम्भ हो गए।

आचार्य भद्रबाहु 12000 शिष्यों के साथ ही दक्षिण की ओर चल दिए। आज जिस स्थान पर गोम्मटेश्वर बाहुबली की विशाल प्रतिमा खड़ी है उसके सामने वाले चन्द्रगिरी पर्वत पर एक गुफा में रहने लगे। उनका अन्तिम समय निकट था।

उन्होंने अपने शिष्यों को कहा कि यहाँ आहार पानी की व्यवस्था तुम्हारे अनुकूल नहीं है, अतः तुम अन्यत्र नगर या गाँव आदि के निकट चले जाओ और धर्म की प्रभावना करो। मैं तो अपनी अंतिम समाधि सल्लेखना तक इसी गुफा में रहूँगा।

कुछ शिष्य तो आस-पास चले गए पर महाराज चन्द्रगुप्त के मन में अपने गुरु के प्रति इतनी प्रगाढ़ श्रद्धा व भक्ति थी कि उन्होंने अपने गुरु को अकेले नहीं छोड़ा। समय-समय पर वे उनके आहार पानी की व्यवस्था करते और उनकी सेवा करते। उस समय वहाँ दूर दूर तक बस्ती दिखाई नहीं देती थी। पर महाराज चन्द्रगुप्त तन मन से अपने गुरु की सेवा करते रहे। 

एक बार महाराज चन्द्रगुप्त पर्वत से नीचे उतरे आहार करने के लिए, पर संयोगवश वे अपना कमंडल आहार कक्ष में ही भूल गए। पर्वत पर जाकर जब आचार्य भद्रबाहु के चरण धोने के लिए कमंडल से पानी लेने के लिए हाथ बढ़ाया तो देखा कि मैं तो अपना कमंडल नीचे ही भूल आया हूँ।

गुरु से प्रायश्चित मांगा तो गुरु ने कहा कि पुनः नीचे जाओ और अपना कमंडल ले कर आओ।

इतना ऊँचा पर्वत, अभी-अभी चढ़ कर आए थे। अब पुनः नीचे जाना और कमंडल लेकर वापिस आना एक साहस का ही काम था। 

मोक्ष का मार्ग इतना सरल नहीं होता।

एक बार क्षुल्लक श्री विसौम्य सागर जी ने भी अपने प्रवचन में कहा था कि सार चाहिए तो सार को पचाने की शक्ति भी होनी चाहिए। दूध का सार है - घृत। दूध पीने वाले भला घी को कैसे पचा पाएंगे? जो संसार की सुख-सुविधाओं में रह कर मोक्ष पाना चाहते हैं, वे कभी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते।

पर महाराज चन्द्रगुप्त की लगन सच्ची थी और वे तुरंत पर्वत से नीचे उतरे। पर यह क्या? यहाँ जो अभी अभी नगरी दिखाई दे रही थी, जहाँ मैंने आहार किया था, वह सब कहाँ लोप हो गया? यहाँ तो चारों ओर जंगल ही जंगल है। मैं अपना कमंडल कहाँ खोजूं? चलते चलते उन्हें एक वृक्ष के पास अपना कमंडल दिखाई दिया। अरे! यह आहार कक्ष से यहाँ कैसे आ गया?

महाराज चन्द्रगुप्त ने ऊपर जा कर आचार्य भद्रबाहु से इस आश्चर्य का कारण पूछा तो उन्होंने अपने निमित्त ज्ञान से बताया कि नीचे तो उजाड़ ही था। वह तो तुम्हारी गुरु-भक्ति के प्रभाव से देवों ने नगर निर्माण करके तुम्हारे आहार की व्यवस्था बनाई थी।

तो यह है सच्ची गुरु भक्ति का प्रभाव! जो मजबूरी से संसार का त्याग करता है, वह मज़दूर बनता है और जो मज़बूती से त्याग करता है, वह महावीर बनता है।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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