मृत्यु को महोत्सव बनाओ

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

मृत्यु को महोत्सव बनाओ

अरे भाई! पुण्य है तो पाप है, सुख है तो दुःख है, जन्म है तो मृत्यु है। यह तो एक सिद्धांत है कि जो आया है वह जाएगा भी। चाहे वह रंक हो या राजा, ग़रीब हो या अमीर, करोड़पति हो या रोड़पति, लखपति हो या खाकपति, अरबपति हो या खरबपति, अमरचंद हो या ज्ञानचंद, नेमचंद हो या हेमचंद, धर्मचंद हो या कर्मचंद। सबको उसकी अदालत में पेश होना ही होगा और जब पेश होना ही है तो फिर कायरता क्यों? हम कायरता से नहीं बल्कि वीरता पूर्वक मरण करेंगे। वीरता पूर्वक तो एक दिन का जीवन भी जीना कहलाता है और कायरता पूर्वक 100 दिन का जीवन भी मरने के समान है।

हर व्यक्ति मृत्यु से भयभीत है, मृत्यु से डरता है, मृत्यु के आने पर काँपने लगता है, दौड़ लगा कर उससे बचने के लिए आगे-आगे भागने लगता है। मृत्यु से भय करोगे तो मृत्यु से अभय नहीं हो पाओगे। 

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने एक कथा लिखी। 

कथा बहुत ही रोचक है। एक व्यक्ति लकड़हारा था। रोज़ जंगल में जाता, लकड़ी काटता और अपनी आजीविका चलाता था। रोज़ मृत्यु को पुकारा करता था किंतु जब वह आई तो उससे दूर भागने लगा।

मैं अक्सर यही कहा करता हूँ कि मृत्यु को भुलाकर नहीं बुलाकर जीओ, मृत्यु को बिसरा कर नहीं स्वीकार करके जीओ, मृत्यु से डरकर नहीं लड़ कर जीओ, मृत्यु से भाग कर नहीं दौड़ कर पकड़ना सीखो। 

मेरे प्यारे बंधुओं, जिन्हें अपने जीवन में मृत्यु का बोध हो जाता है, वे इंसान से महंत बन जाते हैं। 

धन्य हैं वे गजकुमार, सुकौशल मुनि, सुकुमाल मुनि, पाँचों पाण्डव, पार्श्वनाथ भगवान, यशोधर मुनि, अकम्पनाचार्य जिन्होंने उपसर्गों को जीत कर मृत्यु का स्वागत किया। वे मृत्यु को आमंत्रित करते हैं, उसका आह्नान करते हैं।

धन्य हैं आदिनाथ भगवान जिन्होंने नीलांजना की मृत्यु को देखा और महलों से जंगल की ओर निकल पड़े। एक व्यक्ति ऐसा जिसने अपने जीवन में एक बार अर्थी देखी थी और वह घर परिवार को छोड़ कर वन की ओर चल पड़ा लेकिन मुझे बहुत हंसी आती है तुम लोगों पर कि तुम्हारे सामने से रोज़ अर्थियां निकलती हैं, मुर्दे जलाए जाते हैं और फिर भी मृत्यु से डरते हो।

मृत्यु को महोत्सव बनाओ और महोत्सव मनाओ।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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