त्रिलोकीनाथ

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

त्रिलोकीनाथ

क्या आप त्रिलोकीनाथ बनना चाहते हैं? 

त्रिलोकीनाथ कहते हैं तीनों लोकों के स्वामी को। जिसे लोग मन से अपना सच्चा हितैषी मानते हैं, वही तीनों लोकों का नाथ बन सकता है। शासक केवल शासन कर सकता है लोगों के तन और धन पर। उसे मन से कोई अपना स्वामी नहीं मानता। लेकिन नाथ केवल लोगों के मन में अपना स्थान बनाता है जिसके लिए वे अपना तन और धन स्वयं ही न्योछावर कर देते हैं। 

वास्तव में हर आदमी सारी दुनिया पर राज करना चाहता है। अब यह उसकी किस्मत है कि वह कितना राज कर पाता है। कोई व्यक्ति अपने घर पर भी हुकुमत नहीं कर सकता और किसी की हुकुमत अपने सारे खानदान पर चलती है। सत्ता का लाभ मिलना अपने-अपने पुण्य का परिणाम है। 

पाप करने के लिए सत्य से परिचित होना आवश्यक नहीं है पर पुण्य करने और उसके फल को छोड़ने के लिए हमें सत्य की गहराइयों की अनुभूति होना अति आवश्यक है। इसके लिए परमात्मा के चरणों का आश्रय लेना होगा।

परमात्मा के दिव्य ज्ञान का प्रकाश ही हमारी ज्ञान-ज्योति को प्रकाशित कर सकता है, हमारे हृदय में ज्ञान का दीपक जला सकता है। संसार की चारों गतियों में मानव ही एक ऐसा उत्कृष्ट प्राणी है जो अपने पुण्य के बल पर परमात्मा के समान सर्वगुण सम्पन्न बन कर तीनों लोकों का स्वामी बन सकता है।

इसके लिए मानव को अपने ज्ञानचक्षु खोलने होंगे। एक व्यक्ति अपने नेत्र बंद कर ले या वह दृष्टिहीन हो तो उसके सामने चाहे कितने भी दीए जलाकर रख दो, उसके मार्ग में उजाला नहीं हो सकता। उसकी राह में सदा अंधेरा ही बना रहेगा। ठीक इसी प्रकार जब तक मानव अपने भीतर नहीं झांकता और बाहरी पदार्थों व साधनों में उलझा रहता है, तब तक वह उद्विग्न मन से सत्य की खोज नहीं कर सकता। वह बेचैन होकर संसार की भूल-भुलैया में भटक जाता है। लेकिन जो अपने मन में परमात्म-तत्व की खोज करता है, वह असीम शांति प्राप्त करता है।

मुनि श्री कहते हैं कि जो स्वयं को संसार की आग से बचाकर परमात्मा की दिव्य ज्योति से अपने हृदय में ज्ञान का दीपक जला लेता है, स्वयं तप कर अष्ट कर्मों का दहन कर लेता है, सत्य की अनुभूति भी वही प्राप्त कर सकता है। सत्य को प्राप्त करने के लिए तपना पड़ता है, स्वयं को पतंगे की तरह दीपक की ज्वाला में भस्म करना पड़ता है। यदि हम आग के पास जाने से डरते रहेंगे तो सत्य और मिथ्या में कभी अन्तर नहीं कर पाएंगे। 

जब सर्वप्रथम सत्य की अनुभूति होने लगती है तो वह पूर्णतया स्पष्ट दिखाई न देकर धुंधली-सी महसूस होती है। पर धीरे-धीरे उस पर नज़र टिकाए रखने से वह स्पष्ट अनुभव में आने लगती है। सत्य के स्पष्ट होते ही समग्र जीवनधारा स्वयं पर हुकुमत करने दौड़ पड़ती है। फिर एक दिन ऐसा आता है कि हमारा अपने सब कर्मों पर, अपने सम्पूर्ण जीवन पर, अपने तन-मन पर, अपने विचारों पर केवल अपना शासन हो जाता है। 

व्यर्थ के सब क्रिया-कलाप समाप्त हो जाते हैं और हम परम आत्मा बन कर तीनों लोकों के नाथ बन जाते हैं।

यही हर मानव का अंतिम पड़ाव है और परम लक्ष्य है।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

Comments

Popular posts from this blog

स्वतंत्रता दिवस

जीवन में गति है पर दिशा नहीं

प्रभु को प्राप्त करना है