जीवन में संत रूपी जीवन जीएं
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
जीवन में संत रूपी जीवन जीएं
साधक का अर्थ है - साधना करने वाला अर्थात् जिसने अपनी इन्द्रियों व मन को साध लिया है, वह साधक है। इसी साधना से उसमें इतनी सहिष्णुता आ जाती है कि वह समता भाव से हर उपसर्ग व परिषह पर सहज भाव से विजय प्राप्त कर लेता है। कष्ट भी उन्हीं को मिलते हैं जो श्रम करते हैं। अकर्मण्य व्यक्ति कोई श्रम ही नहीं करता तो उसे यह मालूम ही नहीं कि कष्ट किसे कहते हैं और उसे कैसे सहन किया जाता है?
क्या अकर्मण्य व्यक्ति कर्मों की निर्जरा कर पाएगा? कर्म संचित करते रहना और उनकी निर्जरा न कर पाना ही संसार वृद्धि का कारण है। संत अपने जीवन में कष्ट आने पर अपना मानसिक संतुलन बनाए रखते हैं और सहिष्णुता के कारण उन्हें किए गए श्रम का आभास भी नहीं होता।
‘श्रेयांसि बहुविघ्नानि।’
वास्तव में अच्छे कार्यों में विघ्न-बाधाएं भी अधिक आती हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि हमने अच्छे कार्य किए तो उनके परिणामस्वरूप विघ्न-बाधाएं आई। सही बात तो यह है कि कुछ कालावधि के पश्चात् जो कर्म तीव्र रूप लेकर हमें अधिक समय तक कष्ट पहुँचाने वाले थे, वे कर्म अच्छे कार्य के फलस्वरूप समय से पहले उदय में आ गए और मंद रूप में कम समय के हमें कष्ट देकर चले गए।
किसी के कर्मों में सूली पर चढ़ना लिखा था, पर वह देवदर्शन के लिए जा रहा था तो केवल पैर में काँटा लग कर रह गया। यदि हम किसी से कर्ज़ लेते हैं तो उसे चुकाना भी पड़ता है, तभी वह कर्ज़ माफ़ होता है। इसी प्रकार आने वाले कष्टों को समता पूर्वक सहन करके ही हम अपने कर्मों को काट सकते हैं। इससे हमारा आत्म-बल सुदृढ़ बनता है।
जीवन में हमें तीन प्रकार की भावनाओं का अनुभव होता है - सुख, मज़ा और आनन्द। सुख शरीर को मिलता है, मज़ा मन को आता है और आनन्द आत्मा को अनुभव होता है। शरीर का सुख एक छलावा है। इसे सुख नहीं, सुखभास कहते हैं। साधक के जीवन में शरीर व इन्द्रियों के द्वारा कष्ट आते हैं, पर उसकी आत्मा को कोई कष्ट नहीं आता।
साधक महापुरुष अपनी आत्मा के बल पर हर कष्ट को सहन करने की क्षमता रखता है और समतापूर्वक निर्मल परिणाम रखता है। इसी प्रकार श्रावक को भी संत की तरह निर्विकार भाव से संत के समान जीवन जीना चाहिए। उसका जीवन भी आनन्द से ओतप्रोत हो जाएगा।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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