समय से समयसार पाओ
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
समय से समयसार पाओ
जीवन में समय देंगे तो समयसार मिलेगा।
समयसार अर्थात् आत्मा का सार प्राप्त करना है और परमात्म-पद प्राप्त करना है तो सबसे पहले हमें संत-समागम करना होगा। संत के द्वार पर जाकर, उनके चरणों के निकट बैठ कर ही हम आत्मा का सार पा सकते हैं।
जैसे किसी रोग का उपचार करने के लिए हम चिकित्सक के पास जाते हैं, कानून को जानने के लिए Law College के Professor के पास जाते हैं, उसी प्रकार अपने जीवन को सुधारने के लिए, आचरण को संभालने के लिए, विचारों में पवित्रता लाने के लिए, तिर्यंच से तीर्थंकर बनने के लिए, इंसान से भगवान बनने के लिए हमें संतों का समागम करना होगा।
संत हमें उसी मोक्ष-मार्ग पर चलने का उपदेश देते हैं जिस पर वे स्वयं चल रहे है। अतः केवल उपदेश सुनने से हम मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकते। हमें उनके उपदेशों का अक्षरशः पालन करने से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है।
उपदेश सुनने वाले तीन प्रकार के श्रोता होते हैं -
श्रोता, सरोता और सोता।
असली श्रोता वे होते हैं, जो संत के उपदेश को ध्यान से सुनते हैं, चिंतन, मनन और मंथन करते हैं।
सरोता ध्यान से सुनते हैं और सरोते की तरह उनकी बात को काटने, उसमें त्रुटियाँ निकालने का काम करते हैं। उनका काम ही यही है कि बात के टुकड़े-टुकड़े कर के हवा में उछालना।
सोता का काम केवल धर्मसभा में आकर सोने का होता है। वे न ध्यान से सुनते हैं और जब सुनते ही नहीं तो उपदेश की अच्छाई-बुराई करने की आवश्यकता भी उन्हें नहीं होती। संत की वाणी को वे ग्रहण ही नहीं कर पाते।
संत तुम्हें जगाने आए हैं, मोह-निद्रा में तो तुम पहले से ही सोए हुए हो। अतः जागो और संत-समागम का लाभ उठाओ। संत और सैनिक का काम है - सदा जागते रहना और जगाते रहना। सैनिक बाहरी शत्रुओं से देश की रक्षा करता है और संत कर्म-शत्रु से मनुष्य को सावधान करता है।
‘मोह नींद के जोर, जगवासी घूमे सदा।
कर्म चोर चहुँ ओर सरवस लूटे सुध नहीं।’
संत कहते हैं कि तुम मोह की नींद में मग्न हो और तुम्हें सुध ही नहीं है कि ये कर्म-शत्रु तुम्हारी सर्वस्व रत्नत्रय रूपी निधि को लूटकर ले जा रहे हैं। अभी भी संसार के चौरासी के चक्कर में घूमने से बच सकते हो। समय रहते अपनी अमूल्य निधि की रक्षा कर लो। समय रहते समयसार को समझ लो, जान लो और अपने आचरण में उतार लो।
संतों का सान्निध्य ही मनुष्य को नर से नारायण बनाता है।
सत्संगति वह गंगाजल है जो पतित से पतित मानव को भी पावन बना देता है। सत्संगति वर्षा की उस रिमझिम फुहार की तरह है जो उजड़े हुए जीवन में बसंत ला सकती है। मैनासुंदरी ने गुरु आज्ञा से सिद्धचक्र का विधान किया तो श्रीपाल सहित 700 कोढ़ियों का कुष्ठ रोग दूर कर दिया। उनके अन्दर जीने की नई आशा का संचार हो गया। जीवन में ऐसे गुरुओं की संगति बहुत आवश्यक है।
कुसंगति हमें दुर्गति में ले जाती है और संतों की संगति हमें सुगति प्रदान करती है। अतः आप संतो की संगति में अपना समय लगाओ और संत आपको समयसार देंगे। समय का सदुपयोग करने से ही जीवन उपयोगी व पावन बन सकता है।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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