तपस्या और साधना का उत्कृष्ट फल है - समता भाव
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
तपस्या और साधना का उत्कृष्ट फल है - समता भाव
तपस्या का अर्थ है - जब शरीर और आत्मा के भेद विज्ञान का दृढ़ निश्चय हो जाए तो आत्मा को शरीर की कैद से आज़ाद करने के लिए शरीर को तपाना।
जैसे दूध को तपाने के लिए पहले पतीले को तपाया जाता है वैसे ही आत्मा को कर्म-बन्धन से मुक्त करने के लिए शरीर को तपाया जाता है। अपनी इन्द्रियों को साध लेना ही साधना कहलाती है। एक होता है - उपसर्ग और एक होता है - परिषह।
उपसर्ग एक प्राकृतिक आपदा है जैसे बाढ़ आ जाना या भूकम्प आ जाना। ऐसी विपत्ति का सामना तो हमें करना ही पड़ता है लेकिन परिषह सहन करना तो साधु के मूल गुणों में से एक है।
एक साधु साधना के बल पर ही परिषह सहन करता है। जैसे कल आपने देखा कि केश लोच मैं कर रहा था और पीड़ा का भाव आप लोगों के मुख पर झलक रहा था। क्या आपने मेरे मुख पर कोई पीड़ा का भाव देखा?
अरे! हम तो उस समय अपनी आत्मा का चिंतन कर रहे थे कि उसे कैसे इस देह से मुक्त करके सिद्धालय में विराजमान करें?
जब तक साधु समता भाव को ग्रहण नहीं करता तब तक उसकी साधना सफल नहीं हो सकती।
एक नवयुवक के सामने अपने भविष्य को बनाने के लिए दो रास्ते थे। उसका एक मन कहता था कि विवाह करके संसार-सागर में डुबकी लगा ले और दूसरा मन कहता था कि यदि इसमें डूब गया तो भव-भवान्तरों तक इससे पार नहीं हो पाएगा। मुझे तो संसार नहीं संन्यास चाहिए जो मुझे संसार-सागर से पार लगा दे।
एक दिन उसने अपने दादा से कहा कि मैं तो संन्यास लेना चाहता हूँ।
हाँ, हाँ, क्यों नहीं? पर इस रास्ते पर बढ़ने से पहले मैं तुम्हें महात्मा जी से मिलवाना चाहता हूँ जो नगर से बाहर आश्रम में रहते हैं।
ठीक है।
वे दोनों दादा और पोता चल पड़े महात्मा जी से मिलने। वहाँ जा कर दादा ने महात्मा जी को दर्शन देने के लिए याचना की। उस समय महात्मा जी आश्रम की ऊपर की मंज़िल पर ध्यान-साधना कर रहे थे। वे नीचे आए, दर्शन दिए और फिर ऊपर चले गए।
दादा ने कहा कि महात्मा जी! आपने तो दर्शन ही दिए हैं, आशीर्वाद तो दिया ही नहीं। महात्मा जी फिर नीचे आए, हाथ उठा कर आशीर्वाद दिया और फिर ऊपर चले गए। दादा ने फिर कहा कि महात्मा जी! आपने आशीर्वाद तो दे दिया, पर हमसे बात तो की ही नहीं। महात्मा जी नीचे आए, उनका कुशल-क्षेम पूछा, दो बातें की और फिर वापिस ऊपर चले गए।
पोता देख रहा था कि दादा बिना बात बार-बार महात्मा जी के ध्यान में विघ्न डाल रहे हैं।
अब तक पोते की सहन शक्ति की सीमा समाप्त हो चुकी थी। दादा ने कहा कि बेटा, चलो घर चलते हैं। पर पोता तो गुस्से से भरा बैठा था। उसने दादा को वहीं पर ही अपशब्द कहने शुरू कर दिए। ‘आपको महात्मा जी से ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए था। उनकी साधना में विघ्न डालते हुए आपको शर्म आनी चाहिए।’ और भी न जाने क्या क्या बोला पोते ने?
दादा ने कुछ नहीं कहा और जब वे घर पहुँचे तो अपनी पत्नी को आवाज़ दी कि सुनती हो, ज़रा एक जलता हुआ दीपक तो लेती आना। पत्नी तुरंत एक जलता हुआ दीपक ले आई। पोते ने कहा कि आपका दिमाग तो ख़राब नहीं हो गया है। वहाँ महात्मा जी को तंग किया और यहाँ दादी को बेमतलब सता रहे हो।
‘नहीं बेटा! मैं तो तुम्हें यह दिखा रहा हूँ कि महात्मा जी जैसा समता भाव आ सकता हो तो साधु बन जाओ और मेरी पत्नी जैसी समर्पण भाव रखने वाली कन्या मिल जाए तो विवाह कर लो। यदि ऐसा नहीं हो पाया तो दोनों व्यर्थ हो जाएंगे।
गृहस्थी में समर्पण भाव नहीं आया तो घर नहीं बसा सकोगे और तपस्या के बाद समता नहीं आई तो ऐसी साधुता भी व्यर्थ हो जाएगी। कषाय का निमित्त पाकर भी जो समता रखता है वही सच्चा साधु होता है।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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