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नम्रता से प्रभुता

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नम्रता से प्रभुता (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) नम्रता एक ऐसा अनुपम व दुर्लभ सद्गुण है, जिसे हमें अपने जीवन में अवश्य धारण करना चाहिए। नम्रता का अर्थ है कि अपने मन में ऐसे भाव लेकर जीना कि हम सब एक ही परमात्मा की संतान हैं। सभी के अंदर परमात्मा की शक्ति विद्यमान है। तभी हमारे मन में एक दूसरे के प्रति नम्रता के भाव आते हैं। हमारे अंदर का अहंकार समाप्त हो जाता है। फिर हम किसी को पीड़ा नहीं देते, क्योंकि हम जानते हैं कि संसार में सभी प्राणियों के प्रति दया का भाव रखना चाहिए। दया का गुण प्रभु का दिया हुआ है। जब हमारे अंदर ऐसी आत्मिक नम्रता का विकास होता है, तब हमारे अंदर धन-पद-प्रतिष्ठा का अहंकार उत्पन्न नहीं हो सकता। कहा जाता है कि जहां प्रेम है, वहां नम्रता है। क्योंकि प्रेम भाव में कभी क्रोध नहीं आता। जब किसी से प्रेम हो जाता है, तो व्यक्ति उसके सामने कठोर शब्द का उपयोग नहीं करता और न ही अपना अहंकार दिखाता है। हमें भी सभी से ऐसा व्यवहार करना चाहिए, जैसे हम अपने परिचित लोगों से करते हैं। हमें अपने भीतर नम्रता का गुण लाने के लिए धर्मध्यान और अभ्यास करना चाहिए। जब ...

सिद्धों का गुणगान

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सिद्धों का गुणगान (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) हे प्यारी-प्यारी भव्य आत्माओं! हम सभी सिद्धों का गुणगान करने बैठे हैं। जैसे नदी एक है और उसकी धाराएं अनेक हैं, इसी तरह सिद्ध एक है और उनके गुण अनंत हैं। आचार्य समंतभद्र स्वामी कहते हैं कि संसार में अनन्त गुण वालों की कद्र होती है। सिद्ध परमेष्ठी कैसे बने? जिसने संसार भ्रमण में कारण बनने वाले अष्ट कर्म दहन कर दिए, वे सिद्ध परमात्मा बन गए। जैसे-जैसे वह एक-एक कर्म को नष्ट करते हैं, वैसे-वैसे वे अनंत गुणों को धारण करते चले जाते हैं। ऊपर की ओर बढ़ते जाते हैं। हम प्रतिदिन पूजा में पढ़ते हैं - ‘अष्ट कर्म दहनाय अर्घ्यं निर्वपामिति स्वाहा’ । वे अष्ट कर्म हैं - मोहनीय, ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी, अंतराय, आयु, नाम, गोत्र और वेदनीय। सिद्धों के गुण सिद्ध बनने के लिए उन्होंने महान तपस्या करके मोहनीय कर्म के क्षय से सम्यकत्व गुण, ज्ञानावरणी कर्म के क्षय से अनंत ज्ञान गुण, दर्शनावरणी कर्म के क्षय से अनंत दर्शन गुण, अंतराय कर्म के क्षय से अनंत वीर्य गुण, आयु कर्म के क्षय से अवगाहन गुण, नाम कर्म के क्षय से सूक्ष्मत्व गुण, गोत्र कर्म के ...

मौत को सदा याद रखो

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मौत को सदा याद रखो (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) हर पानी की बूंद का मिटना तुम्हारी मौत का सूचक है, हर सूर्य का अस्त होना तुम्हारी मौत का सूचक है, हर फूल का मुरझा जाना तुम्हारी मौत का सूचक है, हर पत्ते का झड़ना तुम्हारी मौत का सूचक है। अपनी मौत को पहचानो। इसलिए मैं कहता हूँ कि अस्थियां बिखरने से पहले अपनी आस्था को जगा लो, अर्थी उठने से पहले जीवन के अर्थ को समझ लो, समय निकलने से पहले समय (आत्मा) को पहचान लो। याद रखना कि सबकी डोली सजना कोई आवश्यक नहीं, लेकिन अर्थी सब की जरूर सजेगी। किसी की बचपन में, किसी की जवानी में और किसी की बुढ़ापे में। मौत तुम्हें जन्म से मरण तक, बचपन से बुढ़ापे तक बहुत दौड़ाती है। लेकिन बुढ़ापे के बाद तुम दौड़ भी नहीं पाते। बुढ़ापे के बाद तो केवल अर्थी ही उठती है, सामान्य व्यक्ति की भी और साधु संत की भी। बस! फर्क इतना ही है कि आपको अर्थी पर लिटा कर ले जाते हैं और साधु को पालकी में बैठा कर ले जाते हैं, क्योंकि आप सोते हुए पैदा हुए थे, सोते-सोते ही जीए और सोते-सोते ही दुनिया से चले गए। संत भले ही सोते हुए पैदा हुए, पर समय से पहले ही वे जाग गए। उन्हो...

ज्ञानी और अज्ञानी

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ज्ञानी और अज्ञानी (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) कबीर रास्ते पर चला आ रहा था अपनी पत्नी और अपने बालक कमाल के साथ। कमाल ने पिता की आँखों में आंसू देखे। कमाल की अम्मा ने कहा - देखो! तुम्हारे बाबा की आँखों में आंसू आ गए हैं। बालक कहता है - मैं तो देख रहा हूं लेकिन मुझे हंसी आ रही है। यही तो फर्क है ज्ञानी और अज्ञानी में! क्या कारण है कि चक्की गेहूं पीस रही है और कबीर की आँखों में आंसू आ गए हैं। कबीर कहते हैं - चलती चाकी देखकर, दिया कबीरा रोय। दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।। बस! संसार में यही दो पाटें हैं - राग और द्वेष के। उनके बीच में फंस कर मनुष्य भव-भ्रमण करता हुआ पिस रहा है और हर जन्म में रो रहा है। लेकिन कमाल कहता है - चलती चकिया देखि के, हंसा कमाल ठठाय। कीले सहारे जो रहा, ताहि काल ना खाए।। जो दाना चलती हुई चक्की में भी कीले के सहारे लगा रहता है, उसका बाल भी बांका नहीं होता। जो दाना कील के बीच में फंस जाता है, वह साबुत बच जाता है। इसी प्रकार राग-द्वेष रूपी चक्की में संयम का सहारा लेने से वह उसके दो पाटों के बीच में नहीं फंस सकता। यह भोग ही संसार में फंसा...

एक अम्मा जो बचपन में ही मर गई

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एक अम्मा जो बचपन में ही मर गई (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) तीन दोस्त आपस में बात कर रहे थे। एक ने कहा मेरे पिताजी 100 साल की आयु में मर गए, तभी दूसरा बोला - अरे! मेरे पिताजी तो 150 साल की आयु में मरे। तभी तीसरा बोला कि मेरी अम्मा तो बचपन में ही मर गई। अब आपको वास्तविक घटना बताते हैं। एक महिला का विवाह हुआ और एक बार घर में चौका लगाया गया। एक मुनिराज का आहार हुआ। आहार के बाद बहू ने उनसे पूछा - महाराज! आप इतनी जल्दी कैसे आ गए? महाराज ने उसका उत्तर देने के स्थान पर बहू से पूछा कि बेटी! आपका जन्म कब हुआ? वह बोली कि महाराज! अभी 2 साल हुए हैं। महाराज ने पूछा - और आपकी सासू मां का जन्म कब हुआ? उसने उनकी आयु 6 माह बताई। महाराज ने फिर पूछा - आपके पतिदेव का जन्म कब हुआ? उसने कहा - अभी 10-15 दिन ही हुए हैं। और आपके ससुर जी का जन्म कब हुआ? उसने कहा - उनका जन्म अभी हुआ ही नहीं। महाराज आहार के पश्चात अपनी तपस्या स्थली अर्थात् वन की ओर गमन कर गए। वहीं पर ससुर जी पलंग पर बैठे थे। उन्होंने जैसे ही सुना उनका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। वह बोले - यह कैसी बहू है? महाराज को कैसे ...

आत्मबल ही जीवन है

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आत्मबल ही जीवन है (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) हमारी अंतरिक्ष शक्ति हमारे आत्मबल की द्योतक है। यह बल जितना मजबूत होगा, हमारी इच्छाशक्ति उतनी अधिक दृढ़ होगी। हमारी कार्य क्षमता बढ़ेगी। विपरीत परिस्थितियों में लिए गए निर्णय सार्थक सिद्ध होंगे। आत्मबल अवसाद को पैदा होने से रोकता है। इससे हम नकारात्मकता के जाल में फंसने से बचते हैं। यदि किसी व्यक्ति का आत्म बल जागृत कर दिया जाए, तो उसमें असंभव को संभव बनाने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है। हमारा इतिहास भी ऐसी अनेक घटनाओं से भरा हुआ है, जिसमें आत्मबल की शक्ति से चमत्कारिक कार्यों को अंजाम दिया गया है। सती सीता की खोज में निकले हनुमान विशाल समुद्र को देखकर हताश हो जाते हैं। उन्हें उसे पार करने की कोई युक्ति नहीं सूझती। वे समुद्र की लहरों के सम्मुख स्वयं को विवश अनुभव करते हैं। लेकिन तभी जामवंत जी उनके आत्मबल को जागृत करते हैं। उन्हें उनकी क्षमताओं से अवगत कराते हैं। हनुमान जी का आत्मबल जागृत हो जाता है। वह ऊंची उड़ान भरते हैं और देखते ही देखते विराट सिंधु को पार कर लेते हैं। आत्मबल के चमत्कार का उदाहरण महाभारत में भी है।...

निष्काम कर्म

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निष्काम कर्म (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) जो लोग निष्काम भाव से कर्म करते हुए अपने जीवन की बागडोर प्रभु के हवाले कर देते हैं, उन्हें विपरीत परिस्थितियां किंचित मात्र भी भयभीत नहीं कर पाती। चलिए एक छोटी सी कथा सुनाते हैं। एक व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ कहीं जा रहा था। रास्ते में वे दोनों एक बड़ी नदी को नाव द्वारा पार कर रहे थे। तभी अचानक तूफान आ गया। वह आदमी निडर था लेकिन उसकी पत्नी बहुत डरी हुई थी। नाव छोटी थी और तूफान भयंकर था। दोनों किसी भी पल डूब सकते थे, लेकिन वह आदमी निश्चल और शांत बैठा था, मानो कुछ नहीं होने वाला। पत्नी ने पूछा - क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा? यह हमारे जीवन का आखिरी क्षण भी हो सकता है। ऐसा नहीं लगता कि हम किनारे सकुशल पहुंच पाएंगे। हमारी मौत निश्चित है। वह आदमी हंसा और एकाएक उसने अपनी कमर के पास खोंसे हुए चाकू को निकाल लिया। औरत बहुत परेशान हो गई। वह चाकू से क्या करेगा? आदमी चाकू को उस औरत के गर्दन के पास ले आया। इतने पास कि चाकू लगभग उसकी गर्दन को छू रहा था। अब उसने अपनी पत्नी से पूछा - क्या तुम्हें डर लग रहा है? पत्नी हंसी और बोली - जब चाक...

अहंकार एक नशा है

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अहंकार एक नशा है (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) अहंकार एक नशा है। अहंकार भक्तों और भगवान के बीच दीवार का काम करता है। अहंकार चर्म रोग की तरह है। जब खुजली आने पर खुजाया जाता है तो वह प्रारंभ में तो अच्छी लगती है परंतु बाद में बहुत कष्ट देती है। अहंकार भी ऐसे ही खुजली के रोग के समान है। यह प्रारंभ में तो अच्छा लगता है, पर बाद में चित्त को बहुत कष्ट देता है। अहंकार ऐसा ही कष्टदायक है, फिर भी अपने अतीत और औकात को मत भूलो। मनुष्य की हैसियत एक मुट्ठी राख से अधिक नहीं है। मदिरा का पान करने से तो मनुष्य मद के नशे में धुत हो जाता है पर अहंकार रूपी मदिरा का पान करने से जो नशा होता है उससे मनुष्य धुत नहीं बल्कि धूर्त और मूर्ख हो जाता है। अहंकार रूपी मदिरा का पान करने से बचो। ओऽम् शांति सर्व शांति!! विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद। -- सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏

प्रकाश के साथ चार कदम

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प्रकाश के साथ चार कदम (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) एक व्यक्ति शिखर जी की यात्रा पर निकला। उसने शिखर जी के बारे में यह सुन रखा था कि यह एक विशाल पर्वत है। 27 किलोमीटर की यात्रा है। 9 किलोमीटर चढ़ने, 9 किलोमीटर की वंदना और 9 किलोमीटर वापिस आना होता है। इस पर्वत का कण-कण पवित्र है, जहां से जैनों के 20 तीर्थंकर भगवान मोक्ष गए हैं। यहां हजारों यात्री दर्शन करने आते हैं। इस पर्वत की वंदना वही कर सकता है, जिसका मन पवित्र है, साफ़ है। पापी जीव पर्वत पर नहीं चढ़ पाता। जो भाव सहित वंदना कर लेता है, वह पशु गति और नरक गति में नहीं जाता। लोगों ने पहले ही बता दिया था कि पर्वत विशाल है। अर्धरात्रि में चढ़ना प्रारम्भ करोगे, तो सूर्य उदय होते-होते पहली टोंक पर पहुंच जाते हैं। मन में उत्कट जिज्ञासा और प्रभु के दर्शन की प्यास लेकर वह भी चला। वह शिखर जी पहुँच कर मंदिर के मैनेजर से मिला। छड़ी, लालटेन इत्यादि चढ़ाई के साधन एकत्रित किये। रात को भी जल्दी उठ गया और लालटेन लेकर कुछ सोचने लगा। उसने पहली बार लालटेन देखी थी। वह क्या जाने कि इसका क्या प्रयोजन है। वह जलती हुई लालटेन लिए प्रवेश द...