प्रकाश के साथ चार कदम

प्रकाश के साथ चार कदम

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)

एक व्यक्ति शिखर जी की यात्रा पर निकला। उसने शिखर जी के बारे में यह सुन रखा था कि यह एक विशाल पर्वत है। 27 किलोमीटर की यात्रा है। 9 किलोमीटर चढ़ने, 9 किलोमीटर की वंदना और 9 किलोमीटर वापिस आना होता है। इस पर्वत का कण-कण पवित्र है, जहां से जैनों के 20 तीर्थंकर भगवान मोक्ष गए हैं। यहां हजारों यात्री दर्शन करने आते हैं। इस पर्वत की वंदना वही कर सकता है, जिसका मन पवित्र है, साफ़ है। पापी जीव पर्वत पर नहीं चढ़ पाता। जो भाव सहित वंदना कर लेता है, वह पशु गति और नरक गति में नहीं जाता।

लोगों ने पहले ही बता दिया था कि पर्वत विशाल है। अर्धरात्रि में चढ़ना प्रारम्भ करोगे, तो सूर्य उदय होते-होते पहली टोंक पर पहुंच जाते हैं। मन में उत्कट जिज्ञासा और प्रभु के दर्शन की प्यास लेकर वह भी चला। वह शिखर जी पहुँच कर मंदिर के मैनेजर से मिला। छड़ी, लालटेन इत्यादि चढ़ाई के साधन एकत्रित किये। रात को भी जल्दी उठ गया और लालटेन लेकर कुछ सोचने लगा। उसने पहली बार लालटेन देखी थी। वह क्या जाने कि इसका क्या प्रयोजन है।

वह जलती हुई लालटेन लिए प्रवेश द्वार पर बैठा था। तभी उसके पास से एक यात्री निकला। उसके पास लालटेन नहीं थी। सौभाग्य से वह उसका परिचित मित्र निकल आया। उसने कहा - अरे! आप यहाँ क्यों बैठे हो? वंदना को नहीं गए।

मित्र ने कहा - कैसे जाऊँ? मैं तो यहां आकर धोखा खा गया। यहाँ के मैनेजर ने मुझे धोखे से इतने ऊँचे पहाड़ पर चढ़ने के लिए यह छोटी-सी लालटेन पकड़ा दी। यह पर्वत तो बहुत विशाल है और अंधकार भी बहुत घना है। इसका प्रकाश केवल चार कदम तक रास्ता दिखाता है। मैं कैसे यात्रा शुरू करूँ?

मित्र ने कहा - डरो मत, घबराओ मत। थोड़ा अपनी बुद्धि का प्रयोग करो। आप यात्रा शुरू तो करो। हाथ में लालटेन लेकर आगे चलो। जितने कदम तुम आगे चलते जाओगे, प्रकाश भी उतने कदम साथ-साथ चलने लगेगा। चार-चार कदम करके ही 27 किलोमीटर का मार्ग तय हो जाएगा। तुम मेरे साथ चलो।

दोनों मित्र साथ-साथ चले और वह लालटेन का प्रकाश भी उनके साथ-साथ चलने लगा। इस प्रकार एक-एक कदम चलने से उनकी यात्रा पूर्ण हो गई।

ओऽम् शांति सर्व शांति!!

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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