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सयानो की सीख

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सयानो की सीख (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) जो न माने सयानो की सीख, लेय टुकनिया मांगे भीख। एक बार एक गुरु और शिष्य एक गाँव की ओर जा रहे थे कि मार्ग में उनके पुण्य से उन्हें एक ऐसा अद्भुत गाँव मिला जहाँ प्रत्येक वस्तु दो पैसे में मिलती थी। शिष्य दो-दो पैसे देकर गाँव से अनेक प्रकार की वस्तुएं ले आया। दोनों ने मिलकर स्वादिष्ट भोजन किया। भोजन के उपरांत गुरु दूसरे गाँव में चलने को तैयार हुए, तभी शिष्य ने कहा कि गुरु जी! आप इसी गाँव में रुकिए। यहां अच्छा-अच्छा भोजन मिलता है। अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं है। व्यर्थ क्यों परेशान होते हो? शिष्य लोभी था। रसना इंद्रिय का दास था। उसने अनेक प्रकार से गुरु को रोकने का प्रयास किया परंतु गुरु रुके नहीं और जंगल की ओर चले गए तथा शिष्य वहीं रह गया। एक दिन गाँव की देवी अचानक नाराज हो गई। ग्राम पुरोहित ने बताया कि देवी को खुश करने के लिए राज्य के सबसे मोटे व्यक्ति की बलि चढ़ाने का निर्णय किया गया है। शिष्य भी इन दिनों काफी मोटा हो गया था। आखिर पड़ा-पड़ा खाने वाला मोटा नहीं होगा तो और क्या होगा? राजा के आदमी मोटे आदमी की तलाश में निकल...

स्नेह की दौलत

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स्नेह की दौलत (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) स्नेह के बिना सुखी जीवन जीना बहुत मुश्किल है। आज आधुनिक युग का दौर है। बच्चों के लिए कंप्यूटर का युग है। माता-पिता बैलगाड़ी के युग के हो चुके हैं। आज का युवा जितनी दूर दृष्टि वाला है, उतने उसके माता-पिता नहीं हैं। वर्तमान में नौजवान पीढ़ी बुद्धि के अभाव से व्यथित नहीं, बल्कि बुद्धि की अधिकता के कारण उसके होने वाले दुरुपयोग से व्यथित है। आज की पीढ़ी महंगाई से नहीं, अत्यधिक लालसा और अहंकार से दुःखी है। यह पीढ़ीगत संघर्ष माता-पिता के कारण उनकी स्वतंत्रता में बाधा आने से हो रहा है। सास बहू का स्वभाव बदलना चाहती है, लेकिन उसे पहले स्वयं को उनके अनुसार बदलना होगा। वर्तमान में कृतज्ञता का स्थान कृतघ्नता ने ले लिया है। माता-पिता की डांट-फटकार तो याद रहती है, लेकिन उसके कारण पर वैचारिक मंथन नहीं किया जाता। दुनिया की किसी भी मां से यदि कहा जाए कि तूने अपनी संतान के लिए जितना संघर्ष किया है, वह एक कागज़ पर लिख दे, तो वह कागज कोरा ही वापस कर देगी। उस कागज़ पर केवल मां के आँसुओं की कुछ बूंदे ही होंगी। वह कहेगी कि संतान के लिए तो वह बहु...

आप अपने को पहचानें

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आप अपने को पहचानें (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) एक शेरनी जो गर्भवती थी, जंगल में जा रही थी। अचानक बिजली चमकने लगी और तूफान उठने लगे। वह भयभीत होकर भागने लगी, एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर कूदने लगी। उसको लांघने लगी तो उसके गर्भ का बच्चा नीचे गिर गया। नीचे भेड़ें बैठी हुई थी। वह बच्चा भी उनमें शामिल हो गया और भेड़ों का मालिक उनके साथ शेरनी के बच्चे को भी हाँक कर अपने साथ ले गया। वह प्रतिदिन भेड़ों के साथ उसे जंगल में चराने ले जाता और वापस ले आता। शेरनी का बच्चा भी अपने आप को भेड़ ही मानने लगा, उनकी तरह रहने लगा, वैसी ही क्रियाएं करने लगा। उनके सामने मिमियाने लगा। उनके समान एक दूसरे को धक्का मार कर घसीट कर चलने लगा। वह अपने स्वभाव को, अपनी शक्ति को भूल गया। वह भेड़ के समान सभी हरकतें करने लगा था। एक दिन एक शेर की दृष्टि उस पर पड़ गई। उसने कसकर दहाड़ मारी। सभी भेड़ें भय से काँपने लगी और वहाँ से भागने लगी। वह शेरनी का बच्चा भी उनके पीछे भागने लगा। वह भी कांपने लगा था। शेर आगे आ गया और उसने शेरनी के बच्चे से कहा - कहाँ भागते हो, बच्चा! तुम कहाँ फंस गए इन रागी-द्वेषियों के बीच ...

संकल्प शक्ति

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संकल्प शक्ति (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) यह कथानक है विजय सेठ और विजया सेठानी का। एक युवा विजय सेठ अपने माता-पिता के साथ प्रतिदिन मंदिर जाता था और संतों का उपदेश सुनता था। उनके उपदेश से प्रभावित होकर उसने ‘शुक्ल पक्ष’ में ब्रह्मचर्य पालन का संकल्प कर लिया। यह जीवन पर्यंत का नियम था। युवक की शादी हुई। शादी की प्रथम रात्रि नवविवाहित जोड़े अनेक कल्पनाएं करते हैं। सुखाभास के कल्पना लोक में डूब जाते हैं। घूमने के लिए गांव से, नगर से बाहर जाते हैं, लेकिन यहां तो मामला ही कुछ और था। शादी की प्रथम रात, एकांत कमरा, नववधू अपने दामन में अनेक खुशियाँ संजोए बैठी थी। दुल्हन विजया बार- बार आँखें उठाकर देखती कि पति उसके पास आकर मनुहार करेगा, प्यार की बातें करेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। हुआ तो कुछ और ही। दुल्हन ने साहस बटोरा और स्वयं पति के करीब आई। उसने देखा कि पति की आँखों में आंसू हैं। पूछने पर पता चला कि उन्होंने मुनिराज से माह के शुक्ल पक्ष में ब्रह्मचर्य पूर्वक रहने का नियम लिया है और अब शुक्ल पक्ष ही चल रहा था। पति के इस संकल्प को धैर्यपूर्वक सुनते ही पत्नी ने कहा कि...

जीवन में गति है पर दिशा नहीं

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जीवन में गति है पर दिशा नहीं (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) हम जीवन में सुबह से शाम तक दौड़ रहे हैं, लेकिन जाना कहाँ है, यह हमें मालूम नहीं है। हमारी यह दौड़ हमें कहीं नहीं पहुँचा पाती। जब तक हम अपनी दौड़ की दिशा को नहीं जानेंगे, तब तक हमारी दशा में भी परिवर्तन संभव नहीं है। दशा बदलनी है तो दिशा भी बदलनी होगी। हमें अपने जीवन को एक सही दिशा देनी होगी। जीवन का लक्ष्य निर्धारण करना होगा। स्वयं के बारे में सोचना होगा कि आखिर हम सब यह क्यों कर रहे हैं? हम किसी को दगा देना चाहते हैं या उसे सगा बनाना चाहते हैं। किसी को ऊपर उठाना चाहते हैं या नीचे गिराना चाहते हैं। किसी की निंदा करना चाहते हैं या उपासना करना चाहते हैं। किसी को आराध्य बनाना चाहते हैं या सेवक बनाना चाहते हैं। किसी के चरणों में अपना मस्तक झुकाना चाहते हैं या अपने चरणों में उसका मस्तक झुकाना चाहते हैं। हमारे जीवन का हेतु क्या है? हम यह सब क्यों करना चाहते हैं? इसे करने से क्या लाभ होगा? लक्ष्यहीन मानव भटकता रहता है। जैसे हवाएं अनंत आकाश में भटकती रहती हैं, बहती रहती हैं, किसी भी सुगंधित या दुर्गंधयुक्त पदार्थ...

अकाल मौत

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अकाल मौत (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) किसी की मौत अकाल मौत कब बनती है? क्यों बनती है? किसकी और कैसे बनती है? किसकी नहीं बनती और इसे टालने के क्या उपाय हैं? जन्म के साथ मौत का और मौत के साथ जन्म का संबंध ऐसा ही है, जैसे पिता और पुत्र का। जब तक निर्वाण की उपलब्धि नहीं हो जाती, तब तक जन्म और मृत्यु का झंझट लगा ही रहेगा और जब तक मृत्यु का झंझट है, तब तक अकाल मौत का संकट भी बना ही रहेगा। अकाल मौत किसी की कुंडली में या कर्म में नहीं लिखी होती, लेकिन किसकी होगी, कहाँ होगी, कब होगी; यह भी तय नहीं होता। अतः अकाल मौत होनहार घटना नहीं, बल्कि अनहोनी घटना है। हमारा जन्म पाप-पुण्य के भावों के कारण हुए कर्मबन्ध के कारण होता है। जैन दर्शन में शरीर नामकर्म नाम का एक कर्म है, जिसमें शरीर की रचना होती है। यह कर्म जब तक रहेगा, तब तक जन्म-मरण होता ही रहेगा। अतः जन्म-मरण की संतति हमारी इच्छाओं पर निर्भर करती है। जन्म के साथ मरण होना नियति है जैसे सुबह के बाद शाम होना। हमारा जन्म पूर्व कर्मों के कारण होता है और मरण आयु के बंध के कारण होता है। अकाल मौत नाम का कोई कर्म नहीं होता। यह ...

जीवन की गाड़ी

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जीवन की गाड़ी (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) जिस जीवन की गाड़ी में एक पहिया ट्रैक्टर का और एक पहिया साइकिल का हो, तो सोचो कि वह यात्रा कैसे चलेगी? पुण्य और पाप - ये जीवन को चलाने वाले दो तत्व हैं अर्थात् दो पहिए हैं। जीवन की गाड़ी इन्हीं दो पहियों से चलती है। मैं जानना चाहता हूँ कि जिस गाड़ी में एक पहिया ट्रैक्टर का हो और दूसरा पहिया साइकिल का हो तो वह गाड़ी कितने दिन चलेगी, कितनी तेज चलेगी और किस गति से चलेगी? आज हमारे जीवन के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। हमारे जीवन का एक पहिया ट्रैक्टर का है, जिसका नाम है पाप और दूसरा पहिया साइकिल का है, जिसका नाम है पुण्य। हमारे पाप का पहिया बहुत बड़ा है और पुण्य का पहिया कमज़ोर है। अब क्या होगा? या तो पाप के पहिए को छोटा करना पड़ेगा, या पुण्य के पहिए को बड़ा करना पड़ेगा। ज़रूरत है पुण्य के पहिए को बड़ा करने की, ताकि जीवन की यात्रा सुखद व आनंदवर्धक हो सके। कहते हैं कि अच्छे खासे जीव की गाड़ी भी आज खटारा बन कर रह गई है, जिसमें हॉर्न के अलावा सब कुछ बजता है और पहिए के अलावा सब कुछ हिलता है। आज का आदमी पाप को केवल बढ़ा ही नहीं रहा, बल्कि पाप...

भक्तामर काव्य - अक्षरों का अद्भुत चमत्कार

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भक्तामर काव्य - अक्षरों का अद्भुत चमत्कार (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) भक्तामर काव्य की समग्र रचना बहुत प्यारी व कल्याणकारी है। इसके प्रत्येक काव्य की प्रत्येक पंक्ति में अंगोपांग यानी 14 अक्षर हैं। एक काव्य में 46 अक्षर हैं और पूरे काव्य में 2688 अक्षर हैं। इन अक्षरों का एक अद्भुत चमत्कार है, जो आज भी इसका पाठ करने वाले भक्तों को चमत्कृत कर देता है। पहला काव्य, 8वां काव्य, 16वां काव्य, 24वां काव्य, 32वां काव्य, 40वां काव्य और अंतिम 48वां काव्य - सबका आपस में गहरा संबंध है। प्रथम काव्य में ‘स्तुति का संकल्प’ है। आठवें काव्य में ‘आकिंचन’ का बोध कराया गया है। 16वें काव्य में आत्मा को परम शुद्ध कह दिया है कि आत्मा ‘निर्धूम दीपक’ के समान है। 24वें काव्य में ‘अनेकांत के जय घोष’ की घोषणा की है तथा अनेकांत की लोकप्रियता का वर्णन किया गया है। 40वें काव्य में बताया गया है कि अनेकांत सिद्धांत के अनुगामी के समक्ष ‘प्रलयकाल की अग्नि’ भी शांत हो जाती है तथा अंतिम 48वें काव्य में स्पष्ट कर दिया गया है कि ‘जो परमात्मा की भक्ति की माला पहनेगा, तो निश्चित ही वह परमात्मा ...

जिंदगी मजहब के लिए है मज़ाक के लिए नहीं

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जिंदगी मजहब के लिए है मज़ाक के लिए नहीं (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) मज़ाक में जीवन गुजारना आसान है। मज़ाक-मज़ाक में ही जीवन की सारी उम्र समाप्त हो जाती है लेकिन मजहबी जिंदगी जीना बहुत मुश्किल है। दुनिया में लोग आते तो हैं जीने के लिए, लेकिन जीते हैं मरी हुई जिंदगी के समान, जिसमें न रौनक है, न खुशियाँ हैं, न कोई उल्लास नज़र आता है। सब लोग पशुओं की तरह भार जैसी जिंदगी जीते हैं। वे मजहबी जिंदगी नहीं जीते। मजहबी जिंदगी में हमेशा उत्सव है, ख़ुशी है, प्रसन्नता है, जागृति है। मजहबी जीवन फूलों जैसा खिला हुआ जीवन है और सूर्य के समान प्रकाशमान है। जब जीवन में खुशियाँ नहीं होती, तो वह जिंदगी केवल एक मज़ाक बनकर रह जाती है। जिंदगी के साथ मज़ाक करना सरल है क्योंकि मज़ाक करना मूर्खता और अज्ञानता का ही प्रतीक है। संसार अज्ञानियों से भरा हुआ है। केवल एक ज्ञान है जो किसी अवतार से ही अवतरित होता है। यदि जमीन पर तीर्थंकरों के अवतार न हुए होते तो ज्ञान का प्रादुर्भाव कभी नहीं हो सकता था। जिंदगी मज़ाक में जीने के लिए नहीं, मजहब की देहरी पर महकने के लिए है। जिंदगी हमारे लिए एक अमूल्य तोहफा ...