अकाल मौत

अकाल मौत

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)

किसी की मौत अकाल मौत कब बनती है? क्यों बनती है? किसकी और कैसे बनती है? किसकी नहीं बनती और इसे टालने के क्या उपाय हैं?

जन्म के साथ मौत का और मौत के साथ जन्म का संबंध ऐसा ही है, जैसे पिता और पुत्र का। जब तक निर्वाण की उपलब्धि नहीं हो जाती, तब तक जन्म और मृत्यु का झंझट लगा ही रहेगा और जब तक मृत्यु का झंझट है, तब तक अकाल मौत का संकट भी बना ही रहेगा। अकाल मौत किसी की कुंडली में या कर्म में नहीं लिखी होती, लेकिन किसकी होगी, कहाँ होगी, कब होगी; यह भी तय नहीं होता। अतः अकाल मौत होनहार घटना नहीं, बल्कि अनहोनी घटना है।

हमारा जन्म पाप-पुण्य के भावों के कारण हुए कर्मबन्ध के कारण होता है। जैन दर्शन में शरीर नामकर्म नाम का एक कर्म है, जिसमें शरीर की रचना होती है। यह कर्म जब तक रहेगा, तब तक जन्म-मरण होता ही रहेगा। अतः जन्म-मरण की संतति हमारी इच्छाओं पर निर्भर करती है। जन्म के साथ मरण होना नियति है जैसे सुबह के बाद शाम होना। हमारा जन्म पूर्व कर्मों के कारण होता है और मरण आयु के बंध के कारण होता है। अकाल मौत नाम का कोई कर्म नहीं होता। यह तो दो कर्मों से मिलकर बना है - असाता वेदनीय कर्म का तीव्र उदय और आयुकर्म का घात होना। यह कर्म कुछ और नहीं, हमारे द्वारा पूर्व में जाने-अनजाने किया गया कोई अपराध है और फल उसकी सजा है।

अतः असाता वेदनीय कर्म का तीव्र उदय और आयु कर्म के घात के कारण अकाल मौत होती है। धरती पर सिर्फ एक प्राणी ही ऐसा है, जिसकी न तो मृत्यु होती है और न ही अकाल मौत होती है। जैनेतर समाज में जिसे अवतार कहा जाता है और जैन दर्शन उसे तीर्थंकर कहते हैं क्योंकि वे मनुष्य जन्म पाकर, मुनि बनकर आठों कर्मों का नाश कर देते हैं। आठों कर्मों में ही एक कर्म है - नामकर्म। अतः नामकर्म यानी बॉडी मेकिंग समाप्त होने से उसका जन्म भी नहीं होता और मरण भी नहीं होता। शेष धरती पर जितने भी साधारण या महापुरुष हैं, उनमें भोगभूमि वाले और भविष्य आयु के बंधक लोगों को छोड़कर सभी की अकाल मृत्यु हो सकती है।

समय और मौत किसी का इंतजार नहीं करते, इसलिए जब असाता वेदनीय तीव्र उदय में आकर फल दे रहा होगा, तो अकाल मौत उसी समय घटित हो जाएगी। जो दुर्घटना, हार्ट अटैक, सामूहिक दुर्घटना या आत्महत्या के रूप में हो सकती है। यदि कोई पाप कई लोगों के साथ मिलकर सामूहिक रूप से किया गया है, तो अकाल मौत भी सामूहिक होगी।

हमारे तीव्र पाप का उदय हो तो अच्छे विचारों को कर के धार्मिक अनुष्ठान व धार्मिक जीवन बनाएँ, जिससे तीव्र पाप कर्म का फल कमज़ोर हो जाएगा और अकाल मौत नहीं हो पाएगी। जिन कार्यों से पाप कर्म नष्ट हो जाएं और पुण्य बढ़ जाएं, वे सब काम अकाल मौत से बचने के उपाय हैं - जैसे मंत्रों का जाप, मंत्रजाप द्वारा हवन करना, धार्मिक अनुष्ठान, ईश्वर की आराधना और अच्छे दया भाव सहित परिणाम करना। अच्छे भाव रखने ही अकाल मौत से बचने के तरीके हैं अर्थात् अहिंसामय जीवन जीएँ और अकाल मौत को टालें।

ओऽम् शांति सर्व शांति!!

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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