संकल्प शक्ति

संकल्प शक्ति

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)

यह कथानक है विजय सेठ और विजया सेठानी का।

एक युवा विजय सेठ अपने माता-पिता के साथ प्रतिदिन मंदिर जाता था और संतों का उपदेश सुनता था। उनके उपदेश से प्रभावित होकर उसने ‘शुक्ल पक्ष’ में ब्रह्मचर्य पालन का संकल्प कर लिया। यह जीवन पर्यंत का नियम था। युवक की शादी हुई। शादी की प्रथम रात्रि नवविवाहित जोड़े अनेक कल्पनाएं करते हैं। सुखाभास के कल्पना लोक में डूब जाते हैं। घूमने के लिए गांव से, नगर से बाहर जाते हैं, लेकिन यहां तो मामला ही कुछ और था।

शादी की प्रथम रात, एकांत कमरा, नववधू अपने दामन में अनेक खुशियाँ संजोए बैठी थी। दुल्हन विजया बार- बार आँखें उठाकर देखती कि पति उसके पास आकर मनुहार करेगा, प्यार की बातें करेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। हुआ तो कुछ और ही। दुल्हन ने साहस बटोरा और स्वयं पति के करीब आई। उसने देखा कि पति की आँखों में आंसू हैं। पूछने पर पता चला कि उन्होंने मुनिराज से माह के शुक्ल पक्ष में ब्रह्मचर्य पूर्वक रहने का नियम लिया है और अब शुक्ल पक्ष ही चल रहा था।

पति के इस संकल्प को धैर्यपूर्वक सुनते ही पत्नी ने कहा कि मैंने भी आर्यिका माताजी से ‘कृष्ण पक्ष’ में ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का नियम लिया है। अद्भुत था यह संयोग। दोनों सोच में पड़ गए, लेकिन शीघ्र ही दोनों ने एकदूसरे के मन की बात पढ़ ली। पति ने कहा - यह तो सोने में सुगंध हो गई। मेरे मन की मुराद पूरी हो गई। मैं मन ही मन बेचैन हो रहा था कि न जाने तुम इसे कैसे स्वीकार करोगी?

दोनों को भर यौवन में वासना से पार निर्वासना के परम आनंद की अनुभूति होने लगी और दोनों ही आत्मरमण की साधना में लग गए। उनका यह संकल्प उन्हें भव से पार लगाने वाला और सद्गति प्राप्त करने का सोपान बन गया।

ओऽम् शांति सर्व शांति!!

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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