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Showing posts from February, 2024

निंदा पर विजय प्राप्त करें

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निंदा पर विजय प्राप्त करें (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) किसी व्यक्ति ने स्वामी जी से पूछा कि तमाम व्यक्ति आपकी निंदा करते हैं, उन्हें कैसे रोका जाए? स्वामी जी ने उत्तर दिया कि निंदा से संत तो क्या ईश्वर भी नहीं बच सके, फिर हमारी तो बात ही क्या है? यदि मनुष्य अपनी आत्मा को समझ सकता है तो उसे संसार की बातों की परवाह नहीं करनी चाहिए। उपर्युक्त प्रसंग हमें निंदा के विषय में चिंता न करने की प्रेरणा देता है। आज समाज में कर्त्ता कम हैं और निंदक अधिक हैं। ये निंदक हमारा मनोबल क्षीण करना चाहते हैं। हमारे कार्य को सिद्धि तक पहुंचते देखना उन्हें खटकता है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि कोई कार्य प्रारम्भ करने से पहले भीतर से निर्भय बना जाए। उपहास की चिंता न करो। निंदा पर ध्यान न दो, क्योंकि ये ऐसे कारक हैं जो हमारी उन्नति में बाधा उत्पन्न करते हैं। सब दूसरे की अवनति में प्रसन्नता का अनुभव करने लगे हैं। यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। इसे बदलना होगा। निंदा से कोई भी महापुरुष नहीं बच पाया। उनके परलोकगमन के कई वर्षों बाद तक भी विरोधी उनकी निंदा करते रहते हैं। परंतु यदि वे महापु...

मानव धर्म

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मानव धर्म (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) मनुष्य प्रकृति की सबसे अद्वितीय, विशिष्ट एवं अनमोल कृति है। प्रकृति ने हम इंसानों को तरह-तरह के संसाधनों से सुसज्जित किया है। यद्यपि प्रकृति ने सिर्फ हमें ही नहीं, अपितु अन्य जीव जंतुओं को भी बनाया है, किंतु उसने अन्य जीवों से थोड़ा-सा अधिक महत्व मानव जाति को दिया है। उसने हमें चिंतनशील, कल्पनाशील और विकसित मस्तिष्क दिया है। इससे स्पष्ट होता है कि इस देश का नेतृत्व करने वाला आम जनता से अधिक संवेदनशील एवं निर्णयवान होता है ताकि वह अपनी जनता की रक्षा एवं सेवा कर सके। इस प्रकार प्रकृति ने भी इस सृष्टि के संरक्षक के रूप में हम मानवों को बनाया है। इसी कारण मानव जाति को उसने चिंतनशीलता और कल्पना करने की शक्ति दी है। हमें चेतनापूर्ण बनाया है ताकि हम अन्य समस्त असहाय जीवों की रक्षा एवं सेवा कर सकें। आज हमारी मानव जाति के समक्ष अपना मानव धर्म या प्राकृतिक धर्म निभाने का समय आ गया है। वर्तमान में चाहे हम जिस भी धर्म में आस्था रखते हों, उसी कड़ी में मानव धर्म को अवश्य समावेशित करें। अपनी व्यस्त दिनचर्या में से थोड़ा-सा समय और थोड़ा-सा ...

बंधन

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बंधन (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) इस संसार में किसी जीव को बंधन स्वीकार नहीं है। बंधन में उसका दम घुटता है। हर प्राणी को स्वतंत्रता चाहिए। कोई भी बंधन पसंद नहीं करता। पति-पत्नी यद्यपि एक-दूसरे के साथ विवाह के बंधन में बंधते हैं, लेकिन अपने व्यक्तिगत जीवन में वे बंधन पसंद नहीं करते। उन्हें अपने जीवन में निजी स्वतंत्रता चाहिए। यदि यह स्वतंत्रता न मिले, तो शादी का प्रेम-फूल जल्दी ही मुरझा जाता है। पत्नी चाहती है कि पति मेरे अनुसार चले और पत्नी चाहती है कि मेरी भावनाओं का भी सम्मान किया जाए। वे एक दूसरे के मालिक होना चाहते हैं, दास नहीं। विवाह के कुछ समय बाद एक कमरे में उनका दम घुटने लगता है। प्रेम सूली पर चढ़ने लगता है, प्रेम पीड़ा देने लगता है। विवाह का बंधन क्यों पीड़ा देता है? क्योंकि समर्पण अहंकार में बदल गया। प्रेम अधिकार की भाषा बोलने लगा और आकांक्षा वर्चस्व के हाथों में कैद हो गई। सब स्वतंत्रता चाहते हैं। पशु-पक्षी, नर-नारी, देव-देवियां, नारकी सभी स्वतंत्रता चाहते हैं। तोते को पिंजरे में रख कर कितना भी खिलाओ, पर पिंजरा खुलते ही वह उड़ जाएगा। उसे भी बंधन प्रिय...

जीवन का उद्देश्य

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जीवन का उद्देश्य (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) जीवन का उद्देश्य है आनंद की खोज। आनंद प्राप्ति की विविध विधाएं हैं और उन विधाओं में एक विधा है - साहित्य सृजन। साहित्य का आधार है - सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्। साहित्य के माध्यम से अमूर्त, अस्पष्ट भावों को मूर्त एवं स्पष्ट करने का प्रयत्न किया जाता है। साहित्य मात्र दर्पण नहीं, वह पारदर्शी भी है। जीवन के नाना रूपों में से जीवन का एक मूल उद्देश्य है - ज्ञान प्राप्त करना। आज देखा जाता है कि बिना ज्ञान के जीवन अधूरा है। ‘आत्मज्ञानेन भोजनम्’ - आत्मा का भोजन ज्ञान है। ज्ञान के माध्यम से ही सम्यक् दर्शन की प्राप्ति होती है, इसलिए हमारे पूर्व आचार्यों ने साहित्य के माध्यम से सब के धर्म मार्ग को प्रकाशमान किया है। यदि आज हमारे आचार्यों ने साहित्य का सृजन न किया होता, तो हमारे पास यह ज्ञान कैसे आता? सत्य का प्रारूपण कैसे होता? तत्व, अतत्व जो भी आज देखने को मिल रहा है, वह सिर्फ युवा पीढ़ी को समझने के लिए पुस्तक के माध्यम से ही समझा पा रहे हैं। हमारे पूर्व के आचार्य ने लेखन किया कि पंचम काल में छद्मस्थ ज्ञानी जीव होंगे और अल्प ज...

समता और संतोष

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समता और संतोष (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) एक यात्री ने अपने स्थान पर पहुँचने के बाद रिक्शा वाले के हाथ में अपना पर्स सौंपते हुए कहा कि तुम्हारे जितने पैसे बनते हों, इसमें से निकाल लो। वह असमंजस में पड़ गया। उसके जीवन में ऐसा प्रथम मौका था। उसने पर्स में देखा कि उसमें बड़े-बड़े नोट भरे हुए थे। उसने 100 रुपए का नोट निकाला और फिर उसे वापिस पर्स में रखकर दस रुपए का नोट निकाला। यात्री ने पूछा - तुमने 100 रुपए का नोट वापस क्यों रख दिया? उसने कहा - यदि आप मेरे ऊपर विश्वास रखते हैं, तो क्या मैं अपनी सज्जनता, अपना सद्चारित्र नहीं दिखा सकता? यात्री ने उसे गर्व से अपने सीने से लगाया और कहा कि आज देश को ऐसे ही व्यक्तियों की आवश्यकता है और उस यात्री ने उसके हाथ में 100 रुपए का नोट थमा दिया। उस समय दोनों के नयन अश्रुपूरित हुए और रिक्शा वाले ने उसके चरण छूकर उससे विदा ली। वास्तव में ऐसा समता और संतोष का स्वभाव कैसे पाया जा सकता है? प्रतिकूलता में अनुकूलता को अनुभव करना सीखो। संतोषी व्यक्ति को अपना अल्प धन भी अधिक लगता है लेकिन असंतोषी व्यक्ति को अधिक धन भी बहुत कम लगता है। ची...

परिग्रह

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परिग्रह (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) हे आत्मन्! मन में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि वैराग्य क्या है? क्या दीक्षा लेना, वस्त्र त्याग करना ही वैराग्य का लक्षण है? नहीं....। क्या पर वस्तु से ममत्व का त्याग करना, मन में किसी के प्रति राग भाव न रखना, आसक्ति का पूर्ण रूप से त्याग करना ही वैराग्य है? मैंने तन-मन से वह वैराग्य को धारण किया, पर हे मन! आज तक तू वैराग्य रूप हुआ ही नहीं। तूने तो अब तक मात्र राग रूप ही परिणमन किया है। तूने तन से वस्त्रों का त्याग किया तो क्या इसलिए कि परिग्रह का संग्रह नहीं करना? यह तो पाप है। अंश मात्र भी मन में राग भाव न लाना। यह वैराग्य नहीं है। फिर राग को कैसे दूर किया जाए? क्या केवल राग भाव को दूर करने के लिए हम घर-परिवार छोड़कर आए हैं? क्या केवल परिग्रह छोड़ने की साधना करने आए हैं? नहीं....। ऐसा परिग्रह तो हम अनंत काल से संग्रह करते आए हैं और छोड़ते आए हैं। हर जन्म में भोग किया और त्याग दिया। पर आज तक मन की इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पाए। फिर आज तक यह भान क्यों नहीं हुआ कि यह मनुष्य पर्याय भी मिली और आपने दीक्षा भी ली, पर मात्र ख्याति-ल...

सार्थकता

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सार्थकता (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) जीव को मानव जीवन का मिलना एक अत्यंत दुर्लभ अवसर है। धर्म व अध्यात्म से इस अवसर का सदुपयोग करने की शिक्षा और प्रेरणा प्राप्त होती है। मनुष्य के समक्ष सदैव दो विकल्प उपस्थित रहते हैं - सत्य और असत्य के। सत्य की परिणति पुण्य में और असत्य की परिणति पाप में होती है। असत्य ढलान की ओर ले जाता है और सत्य ऊँचाई की ओर। ढलान पर फिसलने का बचाव करने के लिए अधिक श्रम करना पड़ता है, पर ऊँचाई की ओर चढ़ना और भी कठिन है। एक-एक पग ध्यान से आगे बढ़ाना पड़ता है, क्योंकि नीचे गिरने और फिसल जाने का भय होता है। हमें मानव जीवन का सदुपयोग करके उसे सार्थक बनाना है। जिसे अपना अंत सामने दिखता हो, वह संग्रह की प्रवृत्ति से दूर हो जाता है। उसके अंदर का अहंकार लुप्त हो जाता है। उसे सांसारिक पदार्थों से प्रतिष्ठा प्राप्त करने की अपेक्षा अपना जीवन अधिक मूल्यवान लगने लगता है। संसार में जितने पाप हो रहे हैं, उनका मूल कारण यही है कि वह अपनी मृत्यु को भूल गया है। आज वैश्विक महामारी ने पूरे संसार को एक अवसर दिया है अपने अंत को याद रखने का। आज कोई भी नहीं कह सकता क...

आहार दान

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आहार दान (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) 1. जिंदगी में दो काम कर के भूल जाना चाहिए और दो कामों को सदा याद रखना चाहिए। ये सूत्र आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए हैं। 2. दान करके और दूसरे पर उपकार करके भूल जाना चाहिए और मौत एवं भगवान इन दोनों को हमेशा याद रखना चाहिए। 3. आज का आदमी दान करता है तो छपा-छपा कर करता है जबकि पहले दान को छुपा-छुपा कर करते थे। 4. दान दिए बिना सोना नहीं और दान देकर रोना नहीं। 5. दान चार प्रकार का होता है - आहार दान, औषध दान, अभयदान और ज्ञान दान। 6. दान किसको दिया जाता है? सुपात्र को। 7. पात्र कितने प्रकार के होते हैं? पात्र तीन प्रकार के होते हैं - (1) उत्तम (2) मध्य (3) जघन्य। उत्तम - खेत में बीज बोने के समान। मध्य - किनारे में या मेंढ पर बीज बोने के समान। जघन्य - पक्की सड़क पर बीज बोने के समान। जैसे पात्र को दान देंगे, वैसी ही हमारी विशुद्धि होगी और वैसा ही फल मिलेगा। 8. यदि कोई तुम्हारे नगर में त्यागी, व्रती या मुनिराज आ जाएं तो आहार जरूर देना चाहिए, क्योंकि आहार दान में चारों दान समाहित हो जाते हैं। (भरत चक्रवर्ती का उदाहरण) 9. आहार दा...

अहंकार

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अहंकार (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) अहंकार पेट्रोल से ज्यादा ज्वलनशील है। अहंकार को साधारण मत समझना। यह सर्प से ज्यादा भयंकर और पेट्रोल से ज्यादा ज्वलनशील है। किसी से संबंध तोड़ने और मिटाने में अहंकार सबसे आगे रहता है। अहंकार ने मैना सुंदरी के पिता के दिमाग में क्रोध की अग्नि भड़काई। राजा ने शादी का आयोजन तो करवाया, पर अपने अंहकार की पुष्टि के लिए मैना सुंदरी के धर्मज्ञान की प्रशंसा करने के स्थान पर उसकी निंदा की और उसका विवाह एक कोढ़ी राजा श्रीपाल से करवा दिया। अहम बहुत खतरनाक है। अहंकार राई जैसे दुख को पहाड़ बना देता है, अमृत को जहर बना देता है। जिस घर के सदस्य अहंकारी होते हैं या जिस घर में पति अहंकार से युक्त होता है, उस घर में रहने वाले लोगों का जीवन वात्सल्य रहित हो जाता है। वह घर फूल-पत्तियों से रहित ठूंठ वृक्ष के समान है। अहंकारी का भवन रेत के ढेर के समान है, जो बाहर से तो जुड़ा हुआ दिखता है, मगर रेत के कणों की तरह अलग-अलग, बिखरा हुआ रहता है। अहंकार के वृक्ष पर कटुता के फूल-पत्ते जल्दी उग जाते हैं और जब मन में कटुता आती है, तब घर को उजड़ने में देर नहीं लगत...