जीवन का उद्देश्य
जीवन का उद्देश्य
(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)
जीवन का उद्देश्य है आनंद की खोज। आनंद प्राप्ति की विविध विधाएं हैं और उन विधाओं में एक विधा है - साहित्य सृजन।
साहित्य का आधार है - सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्। साहित्य के माध्यम से अमूर्त, अस्पष्ट भावों को मूर्त एवं स्पष्ट करने का प्रयत्न किया जाता है। साहित्य मात्र दर्पण नहीं, वह पारदर्शी भी है। जीवन के नाना रूपों में से जीवन का एक मूल उद्देश्य है - ज्ञान प्राप्त करना। आज देखा जाता है कि बिना ज्ञान के जीवन अधूरा है। ‘आत्मज्ञानेन भोजनम्’ - आत्मा का भोजन ज्ञान है। ज्ञान के माध्यम से ही सम्यक् दर्शन की प्राप्ति होती है, इसलिए हमारे पूर्व आचार्यों ने साहित्य के माध्यम से सब के धर्म मार्ग को प्रकाशमान किया है। यदि आज हमारे आचार्यों ने साहित्य का सृजन न किया होता, तो हमारे पास यह ज्ञान कैसे आता? सत्य का प्रारूपण कैसे होता?
तत्व, अतत्व जो भी आज देखने को मिल रहा है, वह सिर्फ युवा पीढ़ी को समझने के लिए पुस्तक के माध्यम से ही समझा पा रहे हैं। हमारे पूर्व के आचार्य ने लेखन किया कि पंचम काल में छद्मस्थ ज्ञानी जीव होंगे और अल्प ज्ञानी होंगे। उन्हें ज्ञान याद नहीं होगा। तभी उनकी लेखनी साहित्य प्रकाशन व लेखन पर चली और आगम के शास्त्रों को लिखना प्रारंभ हुआ।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
विनम्र निवेदन
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धन्यवाद।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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