परिग्रह

परिग्रह

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)

हे आत्मन्! मन में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि वैराग्य क्या है?

क्या दीक्षा लेना, वस्त्र त्याग करना ही वैराग्य का लक्षण है?

नहीं....।

क्या पर वस्तु से ममत्व का त्याग करना, मन में किसी के प्रति राग भाव न रखना, आसक्ति का पूर्ण रूप से त्याग करना ही वैराग्य है?

मैंने तन-मन से वह वैराग्य को धारण किया, पर हे मन! आज तक तू वैराग्य रूप हुआ ही नहीं। तूने तो अब तक मात्र राग रूप ही परिणमन किया है। तूने तन से वस्त्रों का त्याग किया तो क्या इसलिए कि परिग्रह का संग्रह नहीं करना?

यह तो पाप है। अंश मात्र भी मन में राग भाव न लाना। यह वैराग्य नहीं है। फिर राग को कैसे दूर किया जाए?

क्या केवल राग भाव को दूर करने के लिए हम घर-परिवार छोड़कर आए हैं? क्या केवल परिग्रह छोड़ने की साधना करने आए हैं? नहीं....।

ऐसा परिग्रह तो हम अनंत काल से संग्रह करते आए हैं और छोड़ते आए हैं। हर जन्म में भोग किया और त्याग दिया। पर आज तक मन की इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पाए। फिर आज तक यह भान क्यों नहीं हुआ कि यह मनुष्य पर्याय भी मिली और आपने दीक्षा भी ली, पर मात्र ख्याति-लाभ के लिए!

पूजा अभिषेक के लिए? प्रशंसा पाने के लिए?

नहीं....। ऐसा तो हम अनादि काल से करते आए हैं। आज तक तो राग भाव समाप्त हुआ नहीं, मोह गया नहीं। हमने तो दीक्षा इसलिए ली है कि हे आत्मन्! तू भी परमात्मा बने।

बस! भगवन्! यही प्रार्थना है कि आप हमें पुरुषार्थ करने की शक्ति प्रदान करें।

ओऽम् शांति सर्व शांति!!

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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