बिना त्याग के भगवान नहीं बना जा सकता
बिना त्याग के भगवान नहीं बना जा सकता (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) एक मूर्तिकार पाषाण खंड में अपनी छेनी-हथौड़ी से चोट करता है और अनवरत उसकी यह टंकार, वह चोट पाषाण सहन करता रहता है, जिससे धीरे-धीरे वह पाषाण या शिला एक आकार में आने लगती है। उसने अपने बाहर के अशुद्ध तत्त्व का त्याग कर दिया और वह अपनी शुद्ध अवस्था में आ गई। वह शुद्ध अवस्था उस मूर्तिकार की साधना का अंतिम रूप होता है। एक ज्ञानी, एक दार्शनिक, एक विचारशील व्यक्ति के दृष्टिकोण से उस पाषाण का कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहां उसे कोई न कोई निश्चित आकार दिखाई न दे रहा हो। उसे तो चारों तरफ पाषाण में भगवान की मूर्ति ही दिखाई देती है तथा वह पाषाण भी भगवान बनने के लिए चारों तरफ से कष्टों को सहन करने के लिए तैयार है। यदि पाषाण को मूर्ति में परिवर्तित होना है तो चोट तो सहन करनी ही पड़ेगी। अनेक बार उसे चोट देने के बाद भी वह मूर्ति के रूप में परिणत नहीं होता, क्योंकि उसे स्वयं पर दृढ़ विश्वास नहीं होता। इसलिए मूर्ति रूप में परिवर्तित होने के लिए पाषाण को न जाने अनेक कितने कष्टों को दृढ़ता से सहन करना पड़ता है। उस पाषाण की ...