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बिना त्याग के भगवान नहीं बना जा सकता

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बिना त्याग के भगवान नहीं बना जा सकता (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) एक मूर्तिकार पाषाण खंड में अपनी छेनी-हथौड़ी से चोट करता है और अनवरत उसकी यह टंकार, वह चोट पाषाण सहन करता रहता है, जिससे धीरे-धीरे वह पाषाण या शिला एक आकार में आने लगती है। उसने अपने बाहर के अशुद्ध तत्त्व का त्याग कर दिया और वह अपनी शुद्ध अवस्था में आ गई। वह शुद्ध अवस्था उस मूर्तिकार की साधना का अंतिम रूप होता है। एक ज्ञानी, एक दार्शनिक, एक विचारशील व्यक्ति के दृष्टिकोण से उस पाषाण का कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहां उसे कोई न कोई निश्चित आकार दिखाई न दे रहा हो। उसे तो चारों तरफ पाषाण में भगवान की मूर्ति ही दिखाई देती है तथा वह पाषाण भी भगवान बनने के लिए चारों तरफ से कष्टों को सहन करने के लिए तैयार है। यदि पाषाण को मूर्ति में परिवर्तित होना है तो चोट तो सहन करनी ही पड़ेगी। अनेक बार उसे चोट देने के बाद भी वह मूर्ति के रूप में परिणत नहीं होता, क्योंकि उसे स्वयं पर दृढ़ विश्वास नहीं होता। इसलिए मूर्ति रूप में परिवर्तित होने के लिए पाषाण को न जाने अनेक कितने कष्टों को दृढ़ता से सहन करना पड़ता है। उस पाषाण की ...

मनः स्थिति के दो रूप; सुख और दुःख

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मनः स्थिति के दो रूप; सुख और दुःख (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) कुछ लोगों की ऐसी आदत होती है कि जब भी वे किसी से मिलते हैं चाहे वह उससे कोई भी संबंध रखता हो या नहीं, उसके सामने अपनी परेशानियों, अपनी चिंताओं का पिटारा खोल कर बैठ जाते हैं। क्या बताऊँ? मेरी जान को बस मुसीबतें ही मुसीबतें हैं, एक समस्या हल नहीं होती कि दूसरी खड़ी हो जाती है। मैं बहुत दुःखी हूँ। न जाने अब क्या होगा?..... आदि-आदि निराशापूर्ण बातें करने लगते हैं। आखिर यह दुःख, ये चिंताएं क्या हैं? क्यों कोई व्यक्ति दुःखी होता है और परेशानियों में घिरा रहता है। क्या आपने कभी इन सवालों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया है? क्या ये दुःख, परेशानियां भाग्य के खेल हैं? क्या हम इन पर नियंत्रण पा सकते हैं? हम कुछ दिन तो प्रसन्न रहते हैं, लेकिन उसके बाद दुःखी और परेशान रहने लगते हैं। संसार का हर प्राणी दुःखी है। कोई तन से दुःखी, कोई मन से दुःखी और कोई धन से दुःखी। वह किसी न किसी प्रकार से जीवन में दुःखी ही रहता है। हम यह नहीं जानते कि सुख-दुःख तो केवल मनोभावनाएं मात्र हैं। ये हमारी मनःस्थिति के ही दो रूप हैं। हमें ...

भारत पर पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव

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भारत पर पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) संस्कृति से देश का सम्मान होता है, संस्कृति से देश का निर्माण होता है। संस्कृति पर छा जाए सभ्यता किसी देश की, तो उस देश का बहुत अपमान होता है।। जैसा कि आज का विषय है - भारत पर पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव। तो सर्वप्रथम विषय के मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डालते हैं। भारत - यहां पर ‘भारत’ शब्द की व्याख्या करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जहाँ हमने जन्म लिया है और हम सब जिस देश में रहते हैं, वही भारत है और अपनी मातृभूमि से किसे प्यार नहीं होता। सभ्यता का अर्थ होता है - प्राचीन काल से पूर्वजों द्वारा बनाए गए कुछ नियम, जो उस देश के नागरिकों को सभ्य बनाते हैं, दुनिया के सामने सिर ऊँचा करके जीने की कला सिखाते हैं। मनुष्य ने अपने जीवन की विभिन्न अवस्थाओं को नियंत्रित करने के प्रयत्न में यह संपूर्ण जीवन-कला के विकास और उसे संगठित रखने की कला की रचना की है, उसे हम सभ्यता कह सकते हैं। हर विषय के बारे में सोचने के दो तरीके होते हैं - एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक। सकारात्मक दृष्टि से सोचते हुए पश्चिमी सभ्यता की बुराई...

जीवन में समय दें तो समयसार मिलेगा

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जीवन में समय दें तो समयसार मिलेगा (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) यदि हमें परमात्मा के पास जाना है, परमात्मा के पास पहुँचना है, तो हमें सबसे पहले संत समागम में जाना पड़ेगा, संत के द्वार पर पहुँचना पड़ेगा, संत के चरणों में बैठना पड़ेगा, संत के निकट रहना पड़ेगा। जिस प्रकार रोग को ठीक करने के लिए डॉक्टर की शरण में जाना पड़ता है, कानून की लड़ाई लड़ने के लिए वकील के पास जाना पड़ता है, उसी प्रकार जीवन को सुधारने के लिए, आचरण को संभालने के लिए, विचारों में पवित्रता लाने के लिए, तिर्यंच से तीर्थंकर बनने के लिए, इंसान से भगवान बनने के लिए संतों का समागम करना पड़ेगा। संत के उपदेश सुनकर अपने जीवन में उतारने पड़ेंगे। उपदेश सुनने वाले तीन प्रकार के होते हैं - श्रोता, सरोता और सोता। नंबर एक पर श्रोता है अर्थात् जो ध्यान से सुनता है, गुनता है, चिंतन, मनन और मंथन करता है। सरोता सुनता तो है लेकिन फिर काट-काट कर गलतियां निकालता है और सोता तीसरे नंबर का उपदेश सुनने वाला है जो न सुनता है, न गलतियां निकालता है। सभा में आकर केवल सोता ही है। इसलिए जीवन में यदि संतों का समागम मिला है, तो उसका पू...

अभिनय या अनुभव

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अभिनय या अनुभव (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) अभिनय पर विराम लगा लो तो अनुभव होने में देर नहीं लगती। हमारी जिंदगी की यात्रा कई अच्छी-बुरी घटनाओं का समूह है। ये घटनाएं जीवन में एक चक्र की भांति नीचे से ऊपर व ऊपर से नीचे घूमती रहती हैं। घटनाएं घटने पर हमारा उन घटनाओं से जुड़ना ही अभिनय कहलाता है। हम जैसे हैं नहीं और वैसा हम बन कर दिखाएं, यही अभिनय कुशलता का प्रमाण है। जैसे रामलीला दिखाई जाती है, तो कोई राम बनता है, कोई लक्ष्मण तो कोई सीता। इनका अनुभव से कोई संबंध नहीं है। ये सभी अभिनय के पात्र हैं। सिनेमा देखते समय हमें ऐसा लगता है कि जैसे सामने दिखाई देने वाला दृश्य साक्षात् उनके जीवन में घट रहा हो लेकिन वह केवल अभिनय होता है और सच्चा अभिनय वही है, जो वास्तविक लगे, पर वहाँ पात्र को सत्य का अनुभव नहीं होता। अभिनय जीवन को ऊँचाइयों पर नहीं ले जा सकता। वह हमें पथभ्रष्ट बना देता है, जबकि अनुभव हमारे जीवन को सही पथ दिखाता है। हमारी उपयोग पूर्वक की गई क्रिया हमें अभिनय से ऊपर उठाती है और हमारा अभिनय हमें सुप्त दशा में ले जाता है। मंदिर में बैठकर यदि हम घर-दुकान का विचार...

जीवन में चार पत्र आते हैं

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जीवन में चार पत्र आते हैं (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) एक व्यक्ति जिसका नाम भोंदूमल था, वह अपने रास्ते से जा रहा था। अचानक देखता है कि उसके पीछे एक परछाई सी चल रही है। उसने जाना कि वह तो यमराज की परछाई थी। जब उसने यमराज को देखा तो वह डर गया, क्योंकि इस दुनिया में हर व्यक्ति मौत से तो डरता ही है। यमराज ने कहा कि मैं तुम्हें लेने नहीं आया हूँ, मैं तो तुमसे दोस्ती करने आया हूँ। यूँ तो मौत एक इनकम टैक्स ऑफिसर की तरह कहीं भी छापा मार देती है, वह कभी बताकर नहीं आती। इसलिए जीवन में दोस्ती करनी है या मित्रता करनी है तो केवल भगवान से करो। हमेशा उसे अपना मित्र बनाओ जो जीवन भर साथ देने वाला है। जब यमराज ने भोंदूमल से दोस्ती का प्रस्ताव किया तो उसने मान लिया और उससे दोस्ती कर ली। भोंदूमल ने कहा कि माना, तुम हमेशा बिना बताए आते हो लेकिन अब तुम्हें दोस्ती का वास्ता है। जब भी आओगे तो मुझे समाचार दे देना। कोई पत्र डाल देना या फोन कर देना। यमराज चला गया। भोंदूमल ने सोचा कि अब क्या धर्म-कर्म करना है, मंदिर जाने का भी क्या फायदा? वह संतों की संगति करना और पूजा पाठ करना, सब कुछ ...

प्रयास करने वाले ही पास होते हैं

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प्रयास करने वाले ही पास होते हैं (परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से) एक विद्यार्थी स्कूल से जब कॉलेज में पढ़ने जाता है तो परीक्षा के समय पास होने के लिए इतना पढ़ने का प्रयास करता है कि दिन-रात एक कर देता है, तब कहीं जाकर वह पास होने का सर्टिफिकेट ले पाता है। यदि प्रयास करने पर भी वह पास नहीं हो पाता तो यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। लेकिन जितने विद्यार्थी ईमानदारी से पढ़ कर पास होते हैं, वे सभी अपने अथक प्रयास के कारण ही होते हैं। यह तो लौकिक शिक्षा की बात है लेकिन जीवन की परीक्षा में पास होने के लिए प्रयास करना अत्यन्त कठिन है। 50-60 वर्ष या 80 वर्ष की उम्र को पा लेना ही जीवन में सफल होने का प्रयास करना नहीं कहलाता। वास्तविक जीवन तो वह है जिसमें अहिंसा का पालन हो, हिंसा का त्याग हो, जीव दया का पालन हो और अपरिग्रह का भाव सदा बना रहे। ऐसा जीवन ही जिंदगी में सफल होने का सार्थक प्रयास माना जाता है। ऐसे महान लोग ही अपने जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण होकर अपने वास्तविक निवास अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करते हैं। प्रयास से ही हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है। सच्चे मन से किया...

आत्मा का चिंतन क्या है

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज आत्मा का चिंतन क्या है महानुभावों! आत्मा कोई मूर्त वस्तु नहीं है, कोई व्यक्ति नहीं है। वह अपने अन्दर छिपी हुई एक चिन्मय शक्ति है। आत्मा का लक्षण है - ज्ञान। ज्ञान की उपासना आत्मा की उपासना है। ज्ञानी की सेवा आत्मा की सेवा है। ज्ञान का प्रचार आत्मा की प्रभावना है। मुनि ने कहा कि आत्मा का लक्षण है - दर्शन। दर्शन अर्थात् शुद्ध विश्वास, अपनी शक्तियों का विश्वास, अपनी शुद्धता और पवित्रता का विश्वास। आप तुच्छ या शुद्र नहीं, महान हैं। आपके भीतर सम्पूर्ण ईश्वरीय शक्ति निहित है। उसका ज्ञान करो और इस पर विश्वास करो। मेरे भीतर छिपा है भगवान, तू मनवा काहे बना नादान। सिद्ध बुद्ध निर्मल निर्लेपी, अब इसको पहचान।। रत्न छिपा माटी के भीतर, मूरख अब तो जान। तेरे भीतर छिपा है भगवान, तू मनवा काहे बना नादान।। आत्मा का लक्षण है - चारित्र, सम्पूर्ण वीतरागता। धर्मस्ति करणं चारित्रं। समस्त कर्मों से, कषायों से, विभावों से खाली हो जाना ही चारित्र है। अपने आप में विचरण करना ही चरण अर्थात् संयम है। इसलिए चारित्र को चरण कहा है। चरण ही व्यवहार में आचरण बन जाता है। आत्म-गुणों का आचरण कर...

धर्म का तिरस्कार करके धन नहीं कमाया जा सकता

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मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज धर्म का तिरस्कार करके धन नहीं कमाया जा सकता महानुभावों! धर्म का तिरस्कार करके धन नहीं कमाया जा सकता। चार पुरुषार्थों का क्रम है - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। पहले धर्म कमाया जाता है, फिर अर्थ अर्थात् धन। धर्म पुरुषार्थ के अभाव में अर्थ पुरुषार्थ करना अन्याय है, काम पुरुषार्थ व्यभिचार है और मोक्ष पुरुषार्थ तो कल्पना जन्य ही है। तीनों पुरुषार्थों की सिद्धि-प्रसिद्धि के लिए धर्म पुरुषार्थ श्रेष्ठ और ज्येष्ठ है। मुनि श्री ने कहा कि धर्म से धन का विकास होता है। धन तो मात्र साधन है। वह चाहे तो अपने सदुपयोग से कर्त्ता को धर्म की ओर प्रेरित कर सकता है और चाहे तो अपने दुरुपयोग से धरातल की गहराइयों में भी धकेल सकता है। इसके विपरीत धर्म का तो केवल सदुपयोग ही होता है। वहाँ दुरुपयोग का कोई स्थान नहीं है। जहाँ धर्म का दुरुपयोग दिखाई देता है, वहाँ छल है, कपट है, ढकोसला है जबकि धर्म का ढकोसले से कोई सम्बन्ध नहीं है। धर्म अपने विकास के साथ-साथ सूर्य और सुमन की तरह समाज का भी निरंतर विकास करता है। संवेदनशीलता को तो गहराता ही है, वात्सल्य-पराग भी भरता है, किन्तु धन अपने विका...