अभिनय या अनुभव

अभिनय या अनुभव

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)

अभिनय पर विराम लगा लो तो अनुभव होने में देर नहीं लगती।

हमारी जिंदगी की यात्रा कई अच्छी-बुरी घटनाओं का समूह है। ये घटनाएं जीवन में एक चक्र की भांति नीचे से ऊपर व ऊपर से नीचे घूमती रहती हैं।

घटनाएं घटने पर हमारा उन घटनाओं से जुड़ना ही अभिनय कहलाता है। हम जैसे हैं नहीं और वैसा हम बन कर दिखाएं, यही अभिनय कुशलता का प्रमाण है। जैसे रामलीला दिखाई जाती है, तो कोई राम बनता है, कोई लक्ष्मण तो कोई सीता। इनका अनुभव से कोई संबंध नहीं है। ये सभी अभिनय के पात्र हैं। सिनेमा देखते समय हमें ऐसा लगता है कि जैसे सामने दिखाई देने वाला दृश्य साक्षात् उनके जीवन में घट रहा हो लेकिन वह केवल अभिनय होता है और सच्चा अभिनय वही है, जो वास्तविक लगे, पर वहाँ पात्र को सत्य का अनुभव नहीं होता।

अभिनय जीवन को ऊँचाइयों पर नहीं ले जा सकता। वह हमें पथभ्रष्ट बना देता है, जबकि अनुभव हमारे जीवन को सही पथ दिखाता है।

हमारी उपयोग पूर्वक की गई क्रिया हमें अभिनय से ऊपर उठाती है और हमारा अभिनय हमें सुप्त दशा में ले जाता है। मंदिर में बैठकर यदि हम घर-दुकान का विचार कर रहे हैं और घर में बैठकर मंदिर की बातें कर रहे हैं तो यह अभिनय ही है। हमारा जीवन अभिनय से भरा पड़ा है। आश्चर्य तो यह है कि हम अभिनय को ही अभिनव समझते हैं और अनुभवहीन होकर अपना सारा वक्त गुज़ार देते हैं।

सम्यक् क्रिया से अनुभव प्राप्त होता है और मिथ्या क्रियाओं में ही अभिनय है। बस! सही उपयोग की आवश्यकता है। जब हम कार्य के प्रति जागृत होते हैं तो हमें समुचित विवेक रहता है। कार्य करते समय हमारा चित्त उसी कार्य की दिशा में एकाग्रचित रहता है। एकाग्रचित होते ही हमारे सारे अभिनय अनुभव में बदल जाते हैं। अनुभव हमारे जीवन की आंतरिक दशा की अभिव्यक्ति है।

अनुभव की पूंजी हमारी जिंदगी का अनमोल ख़ज़ाना है। जब तक हम जीवन के समस्त अनुभवों से अभिभूत नहीं होंगे, तब तक जिंदगी का अंतिम पड़ाव नसीब नहीं होगा। जिस व्यक्ति के पास जितने ज्यादा अनुभव होंगे, उस का जीवन उतना ही उच्च होगा। अनुभवहीन जीवन केवल कर्मफल के आश्रित रहता है। कार्य में अनुपयोगी क्रियाएँ न तो कार्य को उत्तम बनाती हैं और न ही कोई नई संवेदना निर्मित करती हैं।

हमें जिन प्रक्रियाओं का अनुभव हो जाता है, वे क्रियाएँ हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन जाती हैं। अनुभव वह है जो कभी व्यर्थ नहीं जाता और न उसे हम कभी भूल सकते हैं, जबकि अभिनय व्यर्थ की क्रिया है और वह एक समय के बाद भूलने योग्य हो जाती है। अनुभव ज्ञान की वह पराकाष्ठा है, वह अलौकिक प्रकाश है, जो अज्ञान के अंधेरे को एक पल में चीर डालता है।

अनुभव नए-नए आविष्कारों का जन्मदाता है। अभिनय हमारे समय को बर्बाद करता है। अंदर से हमारे दृढ़ इच्छा और ठोस व्यक्तित्व का प्रमाण तो अनुभव ही देता है। अनुभवी व्यक्ति किसी के शब्दों पर तुरन्त विश्वास नहीं करता। उसे स्वयं ही अपने ऊपर इतना विश्वास होता है कि उसे दूसरे के उपदेश की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। यदि हम प्रतिदिन एक क्रिया का सही अनुभव प्राप्त करें, तो हमारे पास कई अनुभव इकट्ठे हो सकते हैं। 

परमात्मा का केवलज्ञान भी उनके कई जन्मों के अनुभवों का पुंज है। अतः हम सभी अपने अनुभवों को अर्जित करने पर अधिक ध्यान दें। तभी हमारे जीवन की सफलता है।

ओऽम् शांति सर्व शांति!!

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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