भारत पर पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव

भारत पर पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)

संस्कृति से देश का सम्मान होता है,

संस्कृति से देश का निर्माण होता है।

संस्कृति पर छा जाए सभ्यता किसी देश की,

तो उस देश का बहुत अपमान होता है।।

जैसा कि आज का विषय है - भारत पर पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव। तो सर्वप्रथम विषय के मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डालते हैं।

भारत - यहां पर ‘भारत’ शब्द की व्याख्या करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जहाँ हमने जन्म लिया है और हम सब जिस देश में रहते हैं, वही भारत है और अपनी मातृभूमि से किसे प्यार नहीं होता। सभ्यता का अर्थ होता है - प्राचीन काल से पूर्वजों द्वारा बनाए गए कुछ नियम, जो उस देश के नागरिकों को सभ्य बनाते हैं, दुनिया के सामने सिर ऊँचा करके जीने की कला सिखाते हैं। मनुष्य ने अपने जीवन की विभिन्न अवस्थाओं को नियंत्रित करने के प्रयत्न में यह संपूर्ण जीवन-कला के विकास और उसे संगठित रखने की कला की रचना की है, उसे हम सभ्यता कह सकते हैं।

हर विषय के बारे में सोचने के दो तरीके होते हैं - एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक। सकारात्मक दृष्टि से सोचते हुए पश्चिमी सभ्यता की बुराई न बताकर अपनी बुराइयों पर प्रकाश डालिए। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हमारे देश पर अंग्रेजों ने बहुत लंबे समय तक शासन किया है और वे हमारे देश में ही रहते थे। वे यहाँ रहकर अपनी संस्कृति और संस्कारों के अनुसार ही जीए। उन्होंने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए हमारे देश में अपने ढंग से परिवर्तन भी किए। गुरुकुल प्रणाली के स्थान पर इंग्लिश मीडियम स्कूल खोले। धोती-कुर्ता की जगह सूट, टाई और पतलून का इस्तेमाल किया। घोड़े और बैलगाड़ी की जगह रेलगाड़ी, मोटर और हवाई जहाज को स्थान दिया। ये सारी सुविधाएं उनके परिवेश के लिए अनुकूल थी।

देश के आज़ाद होने के बाद अंग्रेज तो यहाँ से चले गए, परंतु अंग्रेजियत को यहीं छोड़ गए और उनके संस्कार हम भारतीयों ने अपना लिए, जो हमारी सभ्यता के विपरीत थे। इसमें गलती अंग्रेजों की या उनकी सभ्यता की नहीं है, गलती तो हमारी है। आज हमारा जन्म तो देसी है परंतु सोच विदेशी है। अगर वे अपने संस्कार व सभ्यता को यहाँ छोड़ भी गए थे तो इन संस्कारों व सभ्यता को हम उनकी अमानत मानकर अभी तक क्यों रखे हुए हैं? हमें तो तत्काल इसकी रजिस्ट्री अंग्रेजों के साथ ही कर देनी चाहिए थी। इसमें दोष पश्चिमी सभ्यता का नहीं, हमारी विवेकहीनता का है।

माना कि इंग्लिश मीडियम स्कूलों को अंग्रेजों ने प्रारंभ किया पर हमें अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। आज हमारे ऊपर कोई दबाव नहीं है कि हम बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाएँ या हिंदी स्कूल में, पर हमने अंग्रेजी को अधिक महत्वपूर्ण बना रखा है। हमें अपने धर्म ग्रंथों की बात समझ में नहीं आती। 14 अगस्त 1949 को हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने के बाद भी क्या हिंदी राष्ट्रभाषा का दर्जा हासिल कर पाई है? क्यों विदेशी भाषा को हम इतना महत्व दे रहे हैं? क्या दुनिया के किसी भी देश में दूसरे देश की भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया गया है?

हमारे देश के नेता अपने देश में भी अंग्रेजी बोलते हैं तथा विदेश में भी अंग्रेजी बोल कर हमारे देश की भाषा का अपमान करते हैं। वास्तव में वैचारिक गुलामी औपनिवेशक गुलामी से अधिक खतरनाक होती है। भाषा एक ऐसा साधन है जिसके माध्यम से विदेशी सोच, पहनावा, रहन-सहन और कह सकते हैं कि पश्चिमी सभ्यता का देश में आयात हो रहा है। अपने सारे दोषों और दुर्गुणों के साथ अंग्रेजी एक ऐसा मीठा ज़हर है, जो पब्लिक स्कूलों के माध्यम से बच्चों के दिमाग में भर जाता है, जिससे वे अपनी भाषा और संस्कृति को भूल कर अंग्रेजियत के रंग में रंग जाते हैं।

विश्व के सारे देशों के नाम वही हैं, जो पहले थे, परंतु हमारे भारत का नाम इंडिया रख दिया गया, जिसके कारण हमारी मातृभाषा स्वतंत्रता के बावजूद आज भी परतंत्र है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा भी है कि -

भीतरी तत्व न झूठी तेजी,

क्यों सखि साजन; नहीं अंग्रेजी।

आज आयुर्वेद का खजाना हमारे पास है, पर नीम का पेटेंट विदेशियों के नाम पर होने के कारण भारतीयों में जागरूकता का अभाव है। हम अपने नुस्खों की जगह विदेशी नुस्खे अपना रहे हैं। आज एड्स जैसी विदेशी बीमारियों को हमने मेहमान बना रखा है। इसमें बीमारी की और पश्चिमी सभ्यता की कोई गलती नहीं है। गलती तो हमारी है जो हम जानकारी के बाद भी बढ़ावा देने वालों का साथ देने में लगे रहते हैं। आज हमारी मानसिकता इतनी गिर गई है कि हम अपने देश के धर्म, रीति-रिवाज, पहनावा और संस्कार आदि को भूलकर पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण कर रहे हैं। वेद और पुराण जिस देश की नींव कहे जाते थे, आज उस देश के वासी नाच, डिस्को और नशाखोरी में खोते चले जा रहे हैं। आज हम छाछ और दही पीने वाले लोगों ने कोल्ड ड्रिंक्स पीना अपना फैशन समझ लिया है।

मुझे बहुत दुःख होता है, जब हम दाल-रोटी और चावल खाने वाले लोग पिज्जा और बर्गर को अधिक स्वादिष्ट बताते हैं।

और तो और हम अपनी विरासत से मनाते आए त्याग के प्रतीक त्योहारों जैसे होली, दिवाली, दशहरा आदि की जगह वैलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे, रोज डे आदि को मनाना अपनी शान समझते हैं। इनको मनाने वाले शायद यह भी नहीं सोचते कि क्या ये बेहूदा त्यौहार कभी उनके माँ-बाप मनाते आए हैं? क्या तब सभी लोग प्यार से नहीं रहते थे या एक दूसरे का शुभ नहीं चाहते थे? क्या पश्चिम वासी हमारे त्योहारों जैसे दीपावली, दशहरा, होली आदि को मनाते हैं?

भूलकर होली के रंग,

हम दूजों के रंग में रंग रहे।

बनाया जिन्होंने गुलाम हमको, 

हम भक्त उनके बन गए।।

अरे! हमारी सभ्यता तो इतनी महान है कि यहां त्याग व बलिदान को महत्व दिया जाता है। यहां पति-पत्नी के रिश्ते को सात जन्मों का रिश्ता माना जाता है। यहां कृष्ण और सुदामा का सखा-प्रेम जगत-विख्यात है। फिर हमें वैलेंटाइन डे, रोज डे आदि को मनाने का औचित्य बिल्कुल समझ नहीं आता।

आज हमारे देश में गौशाला की जगह बूचड़खाने खुलते जा रहे हैं। जिस देश से अहिंसा व शांति का प्रसार होता था, वहां हमने हिंसा और अशांति को शरण दे रखी है। दरअसल आज हम जिस पेड़ की डाल पर बैठे हैं, उसे अपने हाथों से खुद ही काट रहे हैं, फिर हम दूसरों को दोष कैसे दे सकते हैं।

सच पूछो तो आज सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत विदेशी कर्ज में डूब गया है। यहाँ भ्रष्टाचार फल फूल रहा है। एक समस्या समाप्त नहीं हो पाती कि दूसरी खड़ी हो जाती है। देशप्रेम के स्थान पर मन में विद्रोह भर गया है। बढ़ती महंगाई और आतंकवाद ने देश की अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया है। आज हम विदेशी कर्ज़ के मोहताज हो गए हैं।

विदेशी एजेंसियों ने सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण को इस कदर प्रदूषित किया है कि हम अपनी संस्कृति खुद ही नष्ट करके पश्चिमी सभ्यता को ओढ़ कर बैठे हैं। भगवान ने हमें बुद्धि दी है, तो उस बुद्धि और विवेक का हमें इस्तेमाल करना होगा तथा पूरे भारतवासियों को जागरूक करना होगा। अभी भी उम्मीद की कोई किरण दिखाई नहीं दे रही।

कहते हैं कि रात जितनी गहरी होती है, सुबह उतनी ही रंगीन होती है। इतिहास के घूमते पहिए को समय चक्र में नहीं बांधा जा सकता। न मैं भारतीय सभ्यता का पक्षधर हूँ और न पश्चिमी सभ्यता का विरोधी हूँ। मैं विरोधी हूं तो हमारी विवेकहीनता का।

अतः पश्चिमी सभ्यता की बुराइयों को न देखकर उनकी कुछ अच्छाइयों को ग्रहण करो। हमें समय की पाबंदी, समाजवाद, अनुशासन आदि को अपनाना चाहिए तथा उनकी बुराइयों को छोड़ते हुए, भारतीय विरासत की संस्कृति व सभ्यता को संभाल कर रखते हुए भारत को अवनति के गर्त से बचाकर उन्नति के शिखर पर पहुंचाना चाहिए।

मैं बसाना चाहता हूँ स्वर्ग धरती।

आदमी जिसमें रहे बस आदमी बनकर।।

ओऽम् शांति सर्व शांति!!

विनम्र निवेदन

यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

धन्यवाद।

--

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

Comments

Popular posts from this blog

स्वतंत्रता दिवस

जीवन में गति है पर दिशा नहीं

प्रभु को प्राप्त करना है