मनः स्थिति के दो रूप; सुख और दुःख
मनः स्थिति के दो रूप; सुख और दुःख
(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)
कुछ लोगों की ऐसी आदत होती है कि जब भी वे किसी से मिलते हैं चाहे वह उससे कोई भी संबंध रखता हो या नहीं, उसके सामने अपनी परेशानियों, अपनी चिंताओं का पिटारा खोल कर बैठ जाते हैं। क्या बताऊँ? मेरी जान को बस मुसीबतें ही मुसीबतें हैं, एक समस्या हल नहीं होती कि दूसरी खड़ी हो जाती है। मैं बहुत दुःखी हूँ। न जाने अब क्या होगा?..... आदि-आदि निराशापूर्ण बातें करने लगते हैं।
आखिर यह दुःख, ये चिंताएं क्या हैं? क्यों कोई व्यक्ति दुःखी होता है और परेशानियों में घिरा रहता है। क्या आपने कभी इन सवालों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया है? क्या ये दुःख, परेशानियां भाग्य के खेल हैं? क्या हम इन पर नियंत्रण पा सकते हैं?
हम कुछ दिन तो प्रसन्न रहते हैं, लेकिन उसके बाद दुःखी और परेशान रहने लगते हैं। संसार का हर प्राणी दुःखी है। कोई तन से दुःखी, कोई मन से दुःखी और कोई धन से दुःखी। वह किसी न किसी प्रकार से जीवन में दुःखी ही रहता है। हम यह नहीं जानते कि सुख-दुःख तो केवल मनोभावनाएं मात्र हैं। ये हमारी मनःस्थिति के ही दो रूप हैं।
हमें अपनी मनोदशा को बदलने की आवश्यकता है। मनोदशा ख़राब हो, तभी हमें दुःख मिलता है। ये सुख-दुःख हमारे किए गए कार्यकलापों से ही उत्पन्न होते हैं। इसका कारण यह है कि हमारे अन्दर आत्मनिर्भरता नहीं है। आत्मनिर्भर न होना ही हमारे दुःख और परेशानियों का कारण है।
आनंदमयी जीवन की प्राप्ति के लिए आत्मविश्वास का होना अत्यन्त आवश्यक है। यदि आप शांति चाहते हैं, तो मन की शक्ति आवश्यक है। यदि हम स्थाई आनंद चाहते हैं, तो हमें ऐसी वस्तुओं का मोह त्यागना होगा, जो किसी भी समय हम से विलग हो सकती हैं। जब तक मनुष्य अपने अंदर के आधार को नहीं पहचानता, जिस पर वह टिका हुआ है, जिसके द्वारा वह सुख और शांति प्राप्त करता है, तब तक वह सच्चे अर्थों में जीना आरंभ नहीं कर सकता। यदि व्यक्ति चंचल और अस्थिर वस्तुओं व व्यक्तियों पर विश्वास रखता है, तो वह स्वयं अस्थिर हो जाएगा।
यदि व्यक्ति पदार्थ में ही सुख मान बैठा है तो फिर उसे सच्चा सुख नहीं मिल सकता। मनुष्य को सदैव आत्मनिर्भर होना चाहिए, स्वयं पर विश्वास करना चाहिए। सामान्य व्यक्ति जीवन में कम्बल ओढ़ कर सोता है क्योंकि उसमें आत्म-बल की कमी है और संत कम्बल नहीं ओढ़ते क्योंकि उनके अंदर आत्म-बल मजबूत है। कम्बल अर्थात कम है जिनके अंदर बल। जिनमें बल की कमी है, वे सच्चा सुख प्राप्त नहीं कर सकते। सुख और दुःख दोनों हमारे हाथ में हैं। हम स्वयं सोचें कि हमें क्या-क्या चाहिए और क्यों चाहिए? यदि इस बात का सही निर्णय ले लिया तो सभी दुःखों से दूर होकर अनंत सुख प्राप्त हो जाएगा। बस! जरूरत है तो आत्मबल की, आत्मविश्वास की और आत्मनिर्भर होने की।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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