अब होंगे सपने साकार भाग -13
अब होंगे सपने साकार भाग -13
मन की शांति जीवन का मूल
मन की शांति जीवन की सबसे बड़ी दौलत है वह समृद्धि व्यर्थ है जिसमें शांति का अमृत न हो।
अगर आपकी भूलने की आदत है तो इसका सही उपयोग कीजिए और उन बातों को अवश्य भूल जाइए जो आपके मन को अशांत कर रही है।
अशांत मन भूखे तालाब की तरह है जिसमें पानी तो सूख जाता है, पर पीछे मिट्टी की दरारें रह जाती हैं। अपने मन को प्रसन्न रखिये उसमें प्रेम का पानी डालते रहिए, ताकि अंतर्मन का खेत हरा भरा रहे।
सफलता चाहिये तो जो पसंद है उसे हासिल कीजिए पर शांति चाहिए तो जो हासिल है उसी को पसंद करना शुरू कर दीजिए।
व्यर्थ की चिंता का त्याग कीजिए। विश्वास रखिए जो चोंच देता है वह चुग्गा भी देता है। जो कल देगा वह कल के जीने की व्यवस्था में भी स्वतः सहयोगी बनेगा।
दिन की शुरुआत में लगता है जिंदगी में पैसा जरूरी है, पर रात को सोते समय लगता है, जिंदगी में मन की शांति जरूरी है।
जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति कीजिए पर तृष्णा के मायाजाल में मत उलझिये अति तृष्णा इंसान को अशांति का अनुयायी बना देती है।
हमारा स्वास्थ्य हमारे मन की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है, बुरा मन, बुरे विचार, बुरा शरीर, बुरा बीमार जीवन। अच्छा मन, अच्छे विचार, अच्छा शरीर निरोगी जीवन।
अपने आपको गैस का सिलेण्डर न बनाएँ, जो हर समय भभकता रहे, खुद को सदा शरबत का प्याला बनाएँ, जिससे सबके दिल में मिठास घुलती रहे।
जीवन में सदा प्रसन्न रहें। कुछ भी हाथ से चले जाने पर खेद मत कीजिए। इस मंत्र को याद करके सदा शांत रहिए - 'जो मेरा है वो जायेगा नहीं और जो चला गया वो मेरा था ही नहीं।'
रचयिता - परम पूज्य जनसंत उपाध्याय श्री 108 विरंजन सागर जी महाराज
क्रमशः
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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