जन-जन के संत भाग - 9

जन-जन के संत  भाग - 9

क्षुल्लक दीक्षा

ब्रह्मचारी व्रत, आगम के कठोर नियम और मन मन्दिर में विराजमान जिनेन्द्र देव की देशना के कठिन मार्ग का लक्ष्य जैसे इसी अनुकूल समय का इंतजार कर रहा हो। मुहल्ले में एक परिवार था, जहां अक्सर परिवार के सदस्यों में विवाद होता था, आर्थिक संपन्नता के बावजूद सारे सदस्यों के मन में एक दूसरे के लिए विषाद था, ऐसी सांसारिक विषमता जानकर ब्रह्मचारी कमलेश भैया का मन संसार से बिल्कुल पृथक हो गया। नदी जैसे स्वतः सागर की और मुड़ने लगती है, उसी तरह ब्रह्मचारी कमलेश भैया ने ज्ञान सिंधु गुरु विराग सागर की धर्म अनुराग रूपी डोर में बंधकर सुपथ पर कदम बढ़ा दिये।

गोमटेश्वर बाहुबली में महामस्तिकाभिषेक के दौरान ब्रह्मचारी कमलेश भैया ब्रह्मचारी सोनू भैया के साथ आचार्य श्री के पास गए और संघ के दर्शन किये। तभी गुरुदेव ने कहा कि कमलेश आपको दीक्षा लेनी है क्या? यह सुनकर ब्रह्मचारी कमलेश भैया ने कहा - गुरुदेव 10 वर्ष बाद दीक्षा लूंगा। अभी साधना और अध्ययन करना है। यह सुनकर गुरुदेव ने आशीष दिया और कहा - ठीक है।

दूसरे दिन सुबह-सुबह ब्रह्मचारी कमलेश भैया भगवान बाहुबली के दर्शन करने हाथ में हरा नारियल लिए पहाड़ पर गए। पर्वत पर विराजित भगवान बाहुबली की विशाल मूर्ति देख अनायास ही उनके अंतर्मन से आवाज आई - मुझे ऐसा ही बनना है। और वह नारियल भगवान के चरणों की जगह निकट दर्शन कर रहे आचार्य गुरुदेव विरागसागर जी के चरणों मे अर्पित कर दृढ़ प्रतिज्ञ स्वर में कहा - गुरुदेव मुझे दीक्षा दे दीजिये, अब तन पर इन वस्त्रों का बोझ सहन नहीं हो रहा।

यह सुन गुरुदेव मुस्कराते हुये बोले - अरे! कल तो तुम मना कर रहे थे, आज क्या हो गया अचानक? ब्रह्मचारी कमलेश भैया ने गंभीर होते हुए हाथ जोड़कर कहा - गुरुदेव, जीवन में कब वैराग्य उत्पन्न हो जाये, यह कह नहीं सकते। बस मेरे भाव आज ही परिपक्व हुए हैं। मेरी आत्मा का कल्याण करो गुरुदेव। कृपा करो-कृपा करो गुरुवर।

और गोमटेश्वर बाहुबली कर्नाटक में 13 फरवरी 2006 के दिन 220 साधुओं के संघ के बीच में 35 दीक्षायें संपन्न हुईं जिसमें ब्रह्मचारी कमलेश भैया हो गए क्षुल्लक 'विरंजन सागर'।

13 फरवरी 2006 वह पुनीत दिवस है, जिस दिन पूरे देश में 95 दीक्षायें प्रदान की गईं। कुंडलपुर में संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव 108 विद्यासागर जी महाराज ने इसी दिन 58 आर्यिका दीक्षा संस्कार संपन्न किये।

तन पर सिर्फ लंगोट, एक दुपट्टा और हाथ में पिच्छी कमंडल लिये, घर, परिवार, जायदाद, रिश्ते, नाते सब छोड़ भौतिक साधनों के आनंद से परे एक अलग अनोखी आनंद यात्रा की और निकल पड़ा एक भव्य जीव....

क्षुल्लक दीक्षा के 10 दिन बाद ही आचार्य गुरुदेव ने आपको आदेश दिया कि आपको मुनि विकर्ष सागर जी के साथ दिल्ली जाना है और धर्म प्रभावना करनी है। यह आपके लिए आचार्य गुरुदेव द्वारा एक परीक्षा भी थी और आपके लिए एक अवसर भी कि आप आचार्य गुरुदेव की अपेक्षाओं पर खरे उतर पाएं।

आपने बेहद सहजता से आचार्य श्री के आदेश को अध्यादेश मानकर गुरु आज्ञा का पालन करते हुए देश की राजधानी दिल्ली की तरफ विहार किया, और जुट गए संत के आभामंडल से पिच्छी और कमंडल थामे हुए संतत्व की नवीन शुरुआत करने ।।

भैया जी पर जब पड़ी, गोमटेश की छाँव

बोले पिच्छी दीजिये, पकड़ गुरु के पाँव।

 लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद

सागर (म.प्र.)

मो. 91 93009 34766

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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