जन-जन के संत भाग - 8
जन-जन के संत भाग - 8
गुरु के प्रति भक्ति
बात उस समय की है जब आप ब्रह्मचारी अवस्था में पूज्य गुरुदेव विरागसागर जी के साथ आध्यात्म की पढ़ाई कर रहे थे। उस समय आचार्य श्री ससंघ भिंड में विराजमान थे। एक दिवस आचार्य महाराज का स्वास्थ्य थोड़ा ठीक नहीं था। आचार्य महाराज ऊपर के तल पर अपने कक्ष में विश्राम कर रहे थे। रात्रि करीब 1 बजे आपको लगा, गुरुदेव के कक्ष में जाकर देखें कि गुरुदेव का स्वास्थ्य कैसा है।
आचार्य महाराज के निकट जाकर देखा तो पाया कि कोई सफेद वस्त्र में उनकी वैयावृत्ति कर रहा है। आपने सोचा - ब्रह्मचारी संजय भैया जो गुरु सेवा के लिए गुरुदेव के कक्ष के निकट थे, शायद वो ही वैयावृत्ति कर रहे होंगे। यह देख आप नीचे उतर आए, जहां आपने अचानक देखा कि ब्रह्मचारी संजय भैया तो नीचे विश्राम कर रहे हैं। तुरंत दिमाग जैसे शून्य हो गया कि संजय भैया यदि नीचे हैं, तो ऊपर सफेद वस्त्र में कौन इतनी रात में वैया वृत्ति कर रहा है?
जो भी है, मेरे गुरुदेव ठीक हैं, स्वस्थ्य हैंय यह जानकर आप नीचे विश्राम करने चले गए। किन्तु यह प्रश्न रात से दिमाग में था। सुबह गुरुदेव के दर्शन को जब आप निकट पहुंचे, तो देखते ही रात की पूरी कहानी बताई और टकटकी लगाई निगाहों से गुरुदेव को निहारते हुए पूछा कि आचार्य भगवन! रात में कौन वैया वृत्ति कर रहा था?
गुरुदेव मुस्कराकर शांत रहे लेकिन जब आपके द्वारा पुनः यह प्रश्न पूछा गया, तो गुरुदेव धीरे से बोले - कमलेश! वैयावृत्ति सिर्फ उनके लिए ही नहीं है, जो दिखाई देते हैं। बाकी तुम समझदार हो। खैर! जाने दो, ऐसा होता रहता है। ब्रह्मचारी कमलेश के मन में यह सुनकर देखकर गुरु के प्रति सम्मान और समर्पण कितना बढ़ा होगा, इसकी कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं।
शिक्षक ईश्वर रूप, होय कृपा सब सुगम है।
शिष्य तरे भवकूप, गुरु की महिमा अगम है।
लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद
सागर (म.प्र.)
मो. 91 93009 34766
क्रमशः
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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