जन-जन के संत भाग - 7
जन-जन के संत भाग - 7
सरागी से विरागी
एक दिवस की बात है, गाँव की सीमा से एक मुनिराज का संघ विहार करते हुए निकला, तो पिता और माता बालक बल्लू को साथ लेते हुए मुनि संघ के दर्शन को पहुँचे। बालक बल्लू ने बहुत ही भक्तिभाव के साथ मुनि संघ के दर्शन किये। मुनिराज ने बालक के चपल मन को पढ़ा और माथा देखते ही माता-पिता से कहा - यह सामान्य बालक नहीं है, अधिक मोह में नहीं पड़ो, किशोर अवस्था में ही इसे घर से निकल कर जिनेन्द्र देव की देशना करनी है। सुनकर माता-पिता का लाड़-दुलार और ममता जैसे निश्चेष्ट हो गई हो! पर कहते हैं न कि विधि का विधान अटल है।
किशोर अवस्था की प्रथम सीढ़ी पर कदम रखते ही बालक बल्लू एक नई दिशा तलाशने लगा था। परिवार की चर्चाओं के मध्य उसकी गहन जिज्ञासाऐं और गंभीर प्रश्न, जिनका उत्तर माता-पिता के पास भी नहीं था, उसे विशिष्ट बना रहे थे। सखा गिल्ली डंडा, कबड्डी और अन्य खेल खेलने बालक को बुलाते थे, पर बालक का मन कहीं और दूर संसार की अनंत यात्रा से पृथक एक अनकहे लक्ष्य को साधे हुए था।
इसी बीच पिता कन्छेदीलाल जी पूरे परिवार के साथ जबलपुर नगर में स्थानांतरित हो गए और उन्होंने वहीं मेडिकल कॉलेज के सामने अपना व्यवसाय प्रारंभ किया। किंतु अध्यात्म नगर में बसने वाले को महानगर कहाँ भाने वाला था।
गाँव की तुलना में शहर में संसाधन बहुत थे। भरा पूरा परिवार था। माता पिता ने सोचा कि शहर के माहौल और संगत से शायद पुत्र का मन पलट जाए और वह उच्च शिक्षा या संसारिक सुखों के संसाधनों में रुचि लेकर एक नई यात्रा शुरू करे, पर कुछ आत्मायें अपना लक्ष्य लेकर ही अवतरित होती हैं। लोगों की भीड़ और चमक दमक भरे भौतिक संसाधन बल्लू को रास नहीं आये।
पिसनहारी की मढ़िया नजदीक ही थी। घंटों विद्वत जनों के संग बैठक, पूजा पाठ और स्वाध्याय प्रतिदिन की चर्या का भाग बन गया। आलू, प्याज, रात्रि-भोज पहले ही परिवार में निषिद्ध था। पलंग और गद्दे का त्याग भी कर दिया। जीन्स टी शर्ट पहनने की उम्र में सफेद कुर्ता-पायजामा को अपना परिधान बना लिया।
एक दिवस माता पिता ने आपस में तय किया और बालक बल्लू से पूछ ही लिया - बेटा !तुम्हारी क्या अभिलाषा है? पुत्र ने मुस्कुराते हुए कहा - मैं अपना जीवन धन्य करना चाहता हूँ। माँ मैं आपकी कोख का अहसान तो कभी नहीं चुका पाऊँगा। माँ की ममता, पिता का त्याग संसार में सबसे अनमोल हैं, किन्तु मुझे हम सभी की एक और माँ जिनवाणी माता की देशना करनी है। मुझे किसी आचार्य महाराज जी के पास ले चलो।
पुत्र की लगन और प्रगाढ़ अभिरुचि को देख माता-पिता ने त्वरित निर्णय लिया और भिलाई में चातुर्मास कर रहे आचार्य विराग सागर जी के पास ले आये। आचार्य विराग सागर जी ने बालक बल्लू को देखा, तो रहस्यमय मुस्कान उनके अधरों पर नाचने लगी। उन्होंने कुछ प्रश्न किये, जिनके उत्तर सुनकर आचार्य गुरुदेव ने माता-पिता की सहमति के साथ पुत्र को कुछ नियम देकर ब्रह्मचर्य व्रत प्रदान कर दिया।
गुरु को शिष्य मिला वहीं, शिष्य को मिले गुरु
बालक बल्लू का हुआ, नव अध्याय शुरू॥
लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद
सागर (म.प्र.)
मो. 91 93009 34766
क्रमशः
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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