जन-जन के संत भाग - 5
जन-जन के संत भाग - 5
बालक बल्लू का बल्ले से कमाल
बालक बल्लू (कमलेश) बचपन से क्रिकेट के बहुत शौकीन थे। गाँव में सखाओं के संग मैदान में खूब क्रिकेट खेला करते थे। बल्लेबाजी गेंदबाजी दोनों में निपुण बल्लू, बल्ले से लंबे-लंबे शॉट खेलने में माहिर थे। बचपन के मित्र साथी बताते हैं कि जब बल्लू मैदान में क्रीज पर होते थे, तो विपक्षी टीम तनाव में रहती थी कि किस घड़ी अपने प्रहार से मैच जिता ले जायें। अपनी क्रिकेट टीम के कप्तान रहने वाले बल्लू ने जहां अपने बल्ले से गेंद पर प्रहार करके बड़े बड़े चौके छक्के लगाए, वहीं अपने खेल से गाँव वासियों का दिल जीता।
किन्तु उस वक्त किसी को ज्ञान नहीं था कि यही बल्लू एक दिन क्रिकेट के मैदान का बल्ला छोड़ आध्यात्म के मैदान पर रत्नत्रय रूपी बल्ले से कर्म रूपी गेंदों पर प्रहार करके मोक्ष के मार्ग पर चैके छक्के लगाएंगे। विधि का विधान अटल है। भव्य आत्मा का शाश्वत स्वरूप सत्यता के मार्ग को खोज ही लेता है। मैदान के क्रिकेट से संन्यास लेकर जीवन और मरण के बीच की भागदौड़ से बचते हुए एक अनंत पैवेलियन की राह चुन ली बल्लू ने। वाकई वैराग्य का खेल भी अजीब है, बल्ला थामने वाला बालक कल कमंडल थामेगा, यह किसी को भान नहीं था।
बोल रहा है आज भी, बल्लू का बल्ला
बदल गया मैदान पर, खेल नहीं बदला।
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लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद
सागर (म.प्र.)
मो. 91 93009 34766
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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