जन-जन के संत भाग - 39
जन-जन के संत भाग - 39
गुरुकृपा से खत्म हुआ भक्त और भगवान का वनवास
सालों से श्री जी के बन्द पट खुल गए
हीरों की नगरी पन्ना में अजयगढ़ एक स्थान है। जहाँ कुछ दिन आपकी प्रभावना हुई थी। वहाँ 14 साल से कुछ कारणों से चिन्तामणि भगवान पार्श्वनाथ जी के पट बन्द थे। दर्शनार्थियों को दुर्भाग्यवश 14 सालों से प्रभु के दर्शन नहीं हो पा रहे थे। शासन प्रशासन और प्रबुद्ध लोगों द्वारा सारे प्रयास किये गए, किन्तु असफलता मिली। तभी समाज के लोग आपके पास गए और पूरी व्यथा सुनाई। आपने आशीष देकर 3 दिवस रुकने को कहा। पूरे 3 दिवस बाद 14 वर्ष से बन्द प्रभु पार्श्वनाथ जी के पट खोले गए और सबको प्रभु के मनोरम स्वरूप के दर्शन का लाभ मिला। यह है गुरु के तप का असर।
जय जय गुरुदेव।
इस चमत्कार के प्रत्यक्षदर्शी गुरुभक्त मयंक जैन जी बताते हैं कि 7 वर्ष पूर्व आचार्य विरागसागर जी अजयगढ़ पधारे थे, तब समाज के लोगों ने यह परेशानी आचार्य श्री के सामने रखी थी। आचार्य श्री ने मुस्कुराकर कहा - चिन्ता न करो, आज से 6 वर्ष बाद मेरा एक शिष्य आयेगा और वह मन्दिर के दरवाजे खुलवायेगा।
मयंक जी कहते हैं कि कुछ तथाकथित लोग नहीं चाह रहे थे कि मंदिर जी के पट खुलें। उन्होंने कानूनी प्रपंच करके मन्दिर जी को खुलने से रोक रखा था।
किन्तु 6 वर्ष पश्चात गुरुदेव विरंजनसागर जी महाराज उस स्थान पर आये और उन्होंने व्यवधान के निराकरण का आश्वासन दिया।
तथाकथित लोगों ने उनका विरोध भी किया पर गुरुदेव का चमत्कार ही कहें कि जो लोग विरोध के स्वर में चिल्ला रहे थे, उनकी बुद्धि ऐसी पलटी कि वो स्वतः गुरु के बताये मार्ग पर चलकर प्रभु के दर्शन को आगे आने लगे।
स्थानीय लोगों के लिए यह बड़ा चमत्कार था। दूरभाष पर इस सम्पूर्ण घटना को बताते हुए मयंक जी की आँखें भर आती हैं और वे कहते हैं, विरंजनसागर जी जैसा कोई नहीं।
चौदह वर्षों से पड़े, बन्द प्रभु के द्वार
तीन दिवस में खुल गये, अतिशय हुआ अपार।
लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद
सागर (म.प्र.)
मो. 91 93009 34766
क्रमशः
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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