जन-जन के संत भाग - 3

जन-जन के संत  भाग - 3

ग्राम सदगुवां धन्य है

12 दिसम्बर वर्ष 1981, सर्दी के मौसम में रात्रि का समय था। माँ गर्भावस्था में पूरा-पूरा पेट लिये सो रही थी। अचानक उसे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे किसी दिव्य पुंज ने अँधेरे के द्वार पर दस्तक दी हो, जैसे दशों दिशायें अथाह पुण्य के उदय की बेला के स्वागत को तैयार हो गई हों। चंद ऐसे शुभ संकेतों के मध्य अंततः प्रकृति के नियमानुसार एक घोर पीड़ा के पश्चात् ममतामयी माँ श्रीमती शीलाबाई जैन की कोख से एक स्वस्थ और मनहर बालक ने जन्म लिया।

जन्म से पूर्व माँ को तीन महीने पूर्व स्वप्न आने लगे थे कि तीर्थंकर स्वरूप कोई बालक उनकी कोख से जन्म लेने वाला है और यह बालक आगे चलकर कोई ऋद्धिधारी मुनिराज बनने वाला है।

स्थान था ग्राम सदगुंवा, जिला दमोह। एक छोटी-सी बस्ती। मात्र एक जैन परिवार। बस्ती में एक छोटा-सा मंदिर जिसमें पूजा अर्चना अभिषेक इसी मनहर बालक के परिवार द्वारा किया जाता था।

दादा स्वर्गीय श्री बाबूलाल जी जैन एवं दादी स्वर्गीय श्रीमती इन्द्राणी जैन और माँ शीला बाई और पिता सेठ कन्छेदी लाल जैन जी की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। जन्म के 7 दिवस पूर्व से गाँव में बिजली नहीं थी। ग्रामवासी बिजली के अभाव में अँधेरे से परेशान थे। बालक के जन्म के तुरन्त बाद अचानक पूरे गाँव में बिजली आ गई। चमत्कार जैसा हुआ, जैसे प्रकाश ने स्वयं स्वागत किया हो महान भविष्य का।

नन्हा शिशु रूप रंग और आकर्षक स्वरूप लिए ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी दिव्य-आत्मा ने मानव रूप में अवतार लिया हो। यही विलक्षण बालक आगे चलकर निर्ग्रन्थ अवस्था को धारण कर जनसंत विरंजन सागर के रूप में ख्यातिलब्ध हुआ।

माता शीला को हुआ, इक तेजस्वी लाल।

ग्राम सदगुवां धन्य है, धन्य कन्छेदीलाल।

लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद

सागर (म.प्र.)

मो. 91 93009 34766

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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