जन-जन के संत भाग - 2

जन-जन के संत  भाग - 2 

गुरु परिचय

पूज्य गुरुदेव विरंजनसागर जी महाराज मेरे गृहस्थ जीवन के बड़े मामा के पुत्र हैं, और मेरे बाल सखा भी। बचपन में गाँव की गलियों में साथ दौड़ लगाई है। खेल-खिलौनों से खेलने वाले दो बालकों में से एक जन-जन का संत बनेगा, इस बात का उस समय किसी को भान नहीं था।

नियति, नियम और पूर्व जन्मों के पुण्य का असर गुरुदेव को उस दिशा में ले गया, जहां उनकी जीवन यात्रा को सार्थकता मिलनी थी और मैं विस्मित नेत्रों से इस पावन यात्रा को निहारता रहा। बचपन के दो भाई - दो मित्र, जिनमें से आज एक कृष्ण के समान है, तो दूसरा सुदामा-सम मैं, जो अपने कृष्ण की सतत भक्ति का अभिलाषी है।

विचार योग्य है, यह सुदामा उन्हें क्या दे सकता था, जिन्होंने सब कुछ त्याग कर महावीर मुद्रा धारण कर ली हो। कुछ भी तो नहीं था देने को मेरे पास। हमेशा दिया ही है गुरुदेव ने। आशीष, ज्ञान, सम्बल और सदमार्ग जो कि सतत गुरु वचनों से प्राप्त होता आ रहा है।

ऐसे में देने को मेरे हृदय के मधुर कोष में एकत्रित कुछ मधुर स्मृतियां शेष थीं, और कुछ टूटे फूटे से भाव, जिनको गुरुदेव का नाम लेकर गुरुदेव पर ही शब्दों में ढाल कर लिख डाला।

सच, बहुत मुश्किल था लिखना, किंतु गुरुकृपा से कुछ ही दिनों में मुश्किल आसान हो गई और यह कृति तैयार हो गई।

सागर चातुर्मास 2022, गुरुदेव के आगमन के साथ ही उनसे संवाद के दौरान अचानक मुँह से निकला - ‘गुरुदेव! आपकी जीवनी, व्यक्तित्व और उपलब्धियों पर पुस्तक लिखूँ क्या?’ सुनते ही पूज्य गुरुदेव की मंद मुस्कान में छिपे अनकहे मौन ने जैसे हरी झंडी दे दी हो। उसी दिन से जुट गया। यकीन मानिए व्हाट्सएप पटल पर ही अधिकतम 15 दिवसों में यह कृति तैयार हो गई।

शब्द जैसे उमड़-उमड़ कर बरस पड़े। स्मृतियों के आंगन के द्वार पर दीप जल उठे। अंतर्मन से आवाज़ आई कि लिखो, मानव लिखो, और शब्दों से लेखनी के साथ-साथ अपनी जीवन यात्रा को भी प्रासुक कर लो। सचमुच यह एक दुस्साहस जैसा ही था, किन्तु गुरु चरणों से जुड़ाव का लंबा अनुभव था। बाल्यकाल से वर्तमान तक की व्यवस्थित जानकारी भी थी और गुरु का आशीष भी, जिसने यह असंभव कार्य संभव करा दिया।

मन-आँगन में अंगद की तरह पैर जमाये बैठीं कुछ स्मृतियों को टटोला, गुरुदेव की कुछ उपलब्धियां सहेजी, कुछ लोगों से संवाद किया और पुस्तक तैयार हो गई। पूज्य गुरुदेव जनसंत विरंजन सागर जी महाराज का उद्देश्य जैन धर्म, जिनेन्द्र वाणी और अहिंसामयी धर्म को जन-जन तक प्रसारित करना है। उनकी सोच जन-जन के कल्याण और उत्थान की रही है। इसलिए वे जनसंत कहलाते हैं।

उनके समक्ष सभी जाति वर्गों के लोग आकर बैठते हैं और आशीष प्राप्त करते हैं। उनकी सहजता, सरलता, विनम्रता और असीम सुख देती मधुर मुस्कान भक्तों को आकर्षित करती है।

जनसंत होने के दीर्घ मायने थे - दीर्घ सकारात्मक सोच थी, जिसे मेरा कवि मन सर्व जन तक प्रस्तुत करना चाहता था।

बिना किसी अर्थ लाभ अथवा किसी भी तरह के यश-सम्मान की चाह के बिना, दिगम्बर मुद्रामय पिच्छी-कमंडल धारी पूज्य गुरुदेव जन-जन के संत जनसंत विरंजनसागर जी के मंगल आशीष से उनकी यह जीवनी तैयार है, उनके ही भक्तों के लिये।

बहुत छोटा-सा लेखक हूँ, किन्तु भक्त बड़ा हूँ। किसी भी तरह की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष त्रुटियों के लिए पूर्व में ही क्षमा याचना करता हूँ। आशा है इस पुस्तक को पढ़कर आप सभी की अपने गुरु के प्रति श्रद्धा और भक्ति में गुणात्मक अभिवृद्धि होगी। निवेदन है कि पुस्तक के किसी अंश में दृष्टिगत त्रुटियों को आप मुझे व्यक्तिगत तौर पर उपलब्ध कराएंगे, जिससे अपरिहार्य सुधार हो सके।

लगाया बीज अंतस में, तो चंदन हो गया कोई

कोई तप से हुआ पारस, तो कुन्दन हो गया कोई

पथरिया-सद्गुवां की भूमि ने, दो रत्न उगले हैं

विरागी हो गया कोई, विरंजन हो गया कोई ॥

लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद

सागर (म.प्र.)

मो. 91 93009 34766

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद


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