जन-जन के संत भाग - 11
जन-जन के संत भाग - 11
गुरु विराग सागर जी का शिष्य के प्रति अनुराग
बांसबाड़ा राजस्थान में आप अपने गुरु आचार्य विरागसागर जी के साथ साधना में जुटे थे। तभी आचार्य गुरुदेव ने आपकी चर्या, जन कल्याण की सोच और कार्य क्षमता देखकर संघ से पृथक होकर देश भर में धर्म प्रभावना का आदेश दिया। शिष्य के प्रति अनुराग रखते हुए आचार्य प्रवर ने गुरु मंत्र देकर कहा - विरंजन सागर जी, अब आपको तीर्थंकरों की मंगल वाणी को अलग-अलग जगहों पर प्रसारित करना है। धर्म और जन कल्याण के कार्य संपादित कराने हैं।
सदैव याद रखना कि समाज के मध्य जा रहे हो, गंभीरता और मर्यादा सदैव प्राथमिकता पर रहे।
गुरु ने अपने प्रिय शिष्य को आशीर्वाद देते हुए कहा कि जैसे किसी मंत्री और बड़े राजनेता के पास भीड़ लगती है, वैसे ही तुम्हारे पास भक्तों की भीड़ लगती रहे, तुम धर्म की इस यात्रा के कुशल सारथी बनो, ऐसा मेरा आशीर्वाद है।
गुरु विराग के अथाह स्नेह और वात्सल्य भरे आशीर्वाद को पाकर, गुरु चरणों की रज अपने माथे पर लगाकर आप श्री जिनवाणी की देशना को निकल पड़े। आज तक आप गुरु वचनों को मन मन्दिर में श्री जी की भांति स्थापित कर निरन्तर धर्म प्रभावना के सुपथ पर गतिमान है। आप एक श्रेष्ठतम गुरु के सुयोग्य शिष्य हैं। आपके संतत्व को बारम्बार नमन गुरुदेव।
गुरुवर के अनुराग की, किसने पाई थाह,
पा आशीष निकल पड़ा, शिष्य धर्म की राह।
लेखक कवि डॉ. अखिल जैन आनंद
सागर (म.प्र.)
मो. 91 93009 34766
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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