वैराग्य
वैराग्य
(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)
आज उत्तम तप का दिन है। तप से ही मुक्ति के द्वार खुलते हैं। सत्य व्रत को संयम से सुरक्षा मिली, पर सत्य में निखार आता है तप से।
हीरा प्राप्त कर लिया, सुरक्षित भी रख लिया, लेकिन हीरे में चमक लाने के लिए, उसे चमकदार बनाने के लिए तराशना पड़ता है। इस तराशने का नाम ही तपस चरण है। मनुष्य पर्याय में जन्म मिल गया, संयम रूपी हीरा भी मिल गया, सुरक्षा भी मिल गई, लेकिन अभी उसमें राग-मोह से मुक्ति रूपी चमक नहीं आई।
उस चमक को लाने के लिए तपश्चरण रूपी अग्नि पर तपाने की आवश्यकता है। आधुनिक विज्ञान ने विषय भोग की इतनी सुख-सुविधाएँ उपलब्ध करा दी हैं कि हम शरीर की सुख-सुविधाओं में ही लीन हो गए। वहाँ से ध्यान हटेगा, तभी तो आत्मा की ओर ध्यान जाएगा।
बाहरी आकर्षण से विमुख होंगे, तभी तो आत्मा की ओर मुख करेंगे। सारा संसार विषयों में आसक्त हो रहा है। विषयों में आसक्ति के मधुर विष ने आत्मा में अनुरक्ति की मिठास को ही भुला दिया है। इसीलिए राग-रंग में डूबे इस संसार में वैराग्य का अमृत पाना कठिन प्रतीत होता है।
वैराग्य भावना की प्राप्ति के लिए तन व मन के तपश्चरण की आवश्यकता है। तप से ही आत्मा को अष्ट कर्मों के दोषों से छुटकारा दिलाकर मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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धन्यवाद।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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